कोरोना में सब बंद है (व्यंग्य)

कोरोना में सब बंद है (व्यंग्य)

इतनी बंदियों के बीच यदि कुछ बंद नहीं है तो वह है महिलाओं का काम और कान-- बल्कि उनका काम और उनके कानों का काम और बढ़ गया है। छ: बजे के स्थान पर उनकी सुबह पाँच बजे होने लगी है और बिस्तर पर जाने का समय भी आगे खिसक गया है।

कोरोना में सब बंद है। बाजार बंद है, माल बंद है, होटल बंद है, चाट और फास्टफूड के ठेले बंद है, रेलें-बसें बंद हैं, लोगों का आना-जाना बंद है, पार्क बंद है, पार्क के अंधेरे कोने में आलिंगन करने को लालायित प्रेमियों का मिलना-जुलना बंद है, पान की दूकानें बंद है, चाय की गुमठी बंद है, गप्पबाजी बंद है, आफिस बंद है, स्कूल बंद है, क्लब बंद है, जिम बंद है, पार्टियाँ बंद है, अहाते बंद हैं, झूमना-लड़खड़ाना बंद है, मॉर्निंग-ईवनिंग वॉक बंद है कामवाली बाइयों की सोसायटी में इंट्री बंद है। दरवाजे-खिडकियाँ बंद है। उसका छज्जे पर आना बंद है फलत: मनचलों की आँख सिंकाई बंद है। आमने-सामने रहने वालों की बोलचाल बंद है। पड़ोसन की कैंची सी चलनेवाली जुबान बंद है। नजरें मिलने पर मुस्कराना बंद है। पति-बच्चे घर में बंद है। 

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इतनी बंदियों के बीच यदि कुछ बंद नहीं है तो वह है महिलाओं का काम और कान-- बल्कि उनका काम और उनके कानों का काम और बढ़ गया है। छ: बजे के स्थान पर उनकी सुबह पाँच बजे होने लगी है और बिस्तर पर जाने का समय भी आगे खिसक गया है। कानों में बच्चों की पल-पल फरमाइश और पति देव की कभी तल्ख तो कभी मनुहार मिश्रित आवाज गूँजती रहती है। वे न तो अपना पसंदीदा "नागिन" सीरियल देख पा रही हैं और न ही "ये हैं चाहतें" की ड्रामेबाजी का लुत्फ उठा पा रही हैं। नायरा अगला हंगामा क्या करेगी समझ नहीं पा रहीं है और गुड्डन से अब कुछ हो पाएगा या नहीं, सोचने की फुरसत नहीं मिल रही है।

कारवाँ पर गीत सुनकर शुरु होने वाली सुबह बर्तन माँजने से शुरु हो रही है और नींद कमर में वोलिनी मलने के बाद ही आ रही है। इनके बीच में झाड़ू-पोंछा, चाय, सब्जी, दाल, रोटी, पराठे, मैगी, मंगोडे बनाने और न जाने ऐसी कितनी ही फरमाइशों के बीच पिसते हुए जिंदगी से सामंजस्य बिठाना पड़ रहा है। बिना उफ्फ किए अपना कर्तव्य समझ कर किए जा रहीं है सब काम। न थकान न झुंझलाहट। न बहानेबाजी न ऊब। पति को निरोग रखना है। बाबू जी को हर चीज उनके कमरे में मिल जाए ध्यान रखना है। बच्चे दरवाजा खोलकर बाहर न भाग लें चौकस रहना है।

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यह तो उनकी दिनचर्या ही है.. कोरोना की देन नहीं है ये दिनचर्या। सोच कर देखें तो बदले में क्या मिलता है उनको.. जरा सी देर होने पर डाँट, उलाहना और झिडकी.. सब काम अच्छी तरह से होने के बाद भी अनदेखी का दंश।

हाल ही में हमने कोरोना काल में सेवाएँ देने वाले लोगों के प्रति कृतज्ञता जाहिर की है। क्या हमें महिलाओं के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करनी चाहिए? सोचता हूँ कब आएगा वह दिन जब उनकी कर्तव्य परायणता और निस्वार्थ सेवा के लिए बालकनी में खड़े होकर एक शाम उनके सम्मान में भी थाली बजाएँगे लोग। आप भी सोचिए इस बारे में और एक दिन इसके लिए भी मुकर्रर कीजिए। मैंने तो आज की शाम मुकर्रर कर ली है।

अरुण अर्णव खरे