80 के दशक के गैंगवार की कहानी, जब करीम लाला का बोलता था परचम

By अनुराग गुप्ता | Jan 16, 2020

मुंबई और अंडरवर्ल्ड की कहानी बहुत पुरानी है। आज के समय में जब अंडरवर्ल्ड का नाम आता है तो दाऊद इब्राहिम का चेहरा दिमाग में घूमने लगता है। लेकिन कहानी इससे भी पुरानी है। एक वक्त था जब 'हाजी मस्तान मिर्जा' की आवाज मुंबई की सड़कों में गूंजती थी मगर उससे भी पहले 'करीम लाला' का राज हुआ करता था।

शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत द्वारा किए गए दावे के बाद अचानक से करीम लाला का नाम सामने आ गया। राउत ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पुरान डॉन करीम लाला से मिलने मुंबई आती थीं। राउत के इस बयान के बाद से करीम लाला पर एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई।

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कौन है करीम लाला

करीब 30 के दशक में अफगानिस्तान के कुनाप से एक व्यक्ति बंबई (मुंबई) आया था। जिसका नाम अब्दुल करीम शेर खान था। ताकत, शोहरत हासिल करने की लालसा लिए अब्दुल करीम पहले पेशावर गया और फिर बंबई पहुंचा। 21 साल की उम्र में अब्दुल करीम ने एक घर किराए पर लिया और छोटे-मोटे काम शुरू किया। इसमें जुआ, उधारी जैसे कामकाज होते थे। उसने अपने अड्डे यानि की घर का नाम सोशल क्लब रख दिया। देखते ही देखते सोशल क्लब पूरी बंबई में फेमस हो गया। 

सोशल क्लब में कई जाने-माने सेठ और जौहरी जुआ खेलने आते थे। जिसकी वजह से अब्दुल करीम की अच्छी खासी पहचान हो गई। और बाद में अब्दुल करीम ने हीरे और जवाहरात की तस्करी का काम किया। धीरे-धीरे उसने अपनी पकड़ बना ली और तस्करी के काम में किंग के नाम से मशहूर हो गया।

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करीम लाला ने जब दाऊद इब्राहिम को धोया था

साल 1940 में बंबई में करीम लाला के अलावा दो और लोग थे। जो अपनी शानो शौकत को बढ़ाने में जुटे हुए थे। हाजी मस्तान और वरदाराजन मुदलियार भी अपना वर्चस्व स्थापित करने में जुट गए। और इनमें से कोई एक भी किसी से दबने के लिए तैयार नहीं था। फिर कुछ वक्त बाद तीनों ने बंबई को आपस में बांट लिया। अब तीनों अपने-अपने इलाकों और कामों पर ध्यान देते थे। इस दौर में सिर्फ यही तीन गैंगस्टर थे जिनका पत्ता बोलता था और ये लोग बिना किसी खूनखराबे के अपना-अपना काम देखा करते थे। 

फिर हाजी मस्तान की गैंग में एंट्री होती है अब के डॉन दाऊद इब्राहिम की। मुंबई पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल इब्राहिम कासकर के बेटे दाऊद इब्राहिम कासकर और शब्बीर इब्राहिम कासकर ने हाजी मस्तान की गैंग ज्वाइन कर ली। देखते ही देखते ये दोनों करीम लाला के इलाके में धंधा शुरू कर दिया। 

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जिसके करीम लाला परेशान हुआ। हालांकि बाद में दाऊद इब्राहिम करीम लाला की पकड़ में आ गया था और करीम लाला ने जमकर धोया था। ऐसा कहा जाता है कि दाऊद इब्राहिम को काफी चोटें आई थी और वह करीम लाला की पकड़ से जान बचाकर भागा था। कहा तो ये भी जाता है कि दाऊद फिर भी नहीं सुधरा था और एक बार और करीम लाला ने उसे पीटा था।

लाला और इब्राहिम के लोग मारे गए

1981 के समय में दाऊद इब्राहिम करीम लाला के इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा था, जिससे करीम लाला काफी परेशान था। दाऊद को सबक सिखाने के लिए करीम लाला की पठान गैंग ने शब्बीर कासकर की हत्या कर दी। इस हत्या के बाद गैंगवार शुरू हुआ। करीम लाला की तबीयत धीरे-धीरे खराब होने लगी और दाऊद इब्राहिम की पकड़ मजबूत होने लगी।

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1981 से 1985 के समय में आए दिन गैंगवार की खबरें सामने आती थी। शब्बीर कासकर की हत्या ने तो दाऊद को हिला दिया था। ठीक 5 साल बाद शब्बीर की हत्या का बदला दाऊद ने 1986 में करीम लाला के भाई रहीम खान को मारकर पूरा किया। 

इस गैंगवार के बाद बंबई में दाऊद की आवाज गूंजने लगी। करीम लाला धीरे-धीरे कमजोर होता गया और 19 फरवरी, 2002 को मुंबई में उसकी मौत हो गई।

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