By अनुराग गुप्ता | Dec 09, 2021
नयी दिल्ली। भारत के महानतम राष्ट्रपतियों में से एक प्रणब मुखर्जी का जन्म सामान्य से ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के सक्रिय सदस्य थे और आजादी की लड़ाई में उन्होंने अपना योगदान दिया था। इसके अलावा पिता कामदा किंकर मुखर्जी पश्चिम बंगाल विधान परिषद में 1952 से 1964 तक सदस्य रहे थे। केंद्र में यूपीए की सरकार जाने के बाद साल 2014 में एनडीए ने सरकार का गठन किया और अभी भी एनडीए ही सरकार में मौजूद है। ऐसे समय में भारत रत्न से सम्मानित 'प्रणब मुखर्जी' के रिश्ते सभी दलों के साथ बेहतरीन थे। सबसे पहले भारत की आयरन लेडी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की नजर प्रणब मुखर्जी पर पड़ी थी और उन्होंने ही उन्हें उच्च सदन का सदस्य बनवाया था।
कांग्रेसियों ने ही प्रणब 'दा' को बढ़ने से रोका था
प्रणब मुखर्जी पर सबसे ज्यादा भरोसा करने वाली इंदिरा गांधी के निधन के बाद एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया था। दरअसल, लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी के समर्थकों ने प्रणब मुखर्जी के खिलाफ मोर्चेबंदी कर उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने दिया था और फिर कुछ वक्त बाद पार्टी से भी निकाल दिया गया। उत्तर भारत में एक कहावत बहुत आम है और अक्सर सुनाई भी देती है... कहते हैं- जहां चाह, वहां राह... प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया। हालांकि बाद में प्रणब मुखर्जी का राजीव गांधी के साथ समझौता हो गया और ससम्मान उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ।31 अगस्त, 2020 को आखिरी सांस लेने वाले प्रणब मुखर्जी को यूपीए ने जून 2012 को राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया था। उनके सामने पूर्व लोकसभा स्पीकर पीए संगमा थे। 19 जुलाई को राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हुए और 22 जुलाई को परिणाम सामने आया था। जिसमें प्रणब मुखर्जी 7,13,763 वोट हासिल हुए और पीए संगमा को 3,15,987 वोट मिले। प्रणब मुखर्जी को भारत का 12वां राष्ट्रपति चुन लिया गया और 25 जुलाई को उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने शपथ दिलाई।