एनएसई घोटाला: एक अधिकारी किसी अदृश्य योगी की सलाह पर लेती रही फैसला और हो गया बड़ा घोटाला

By कमलेश पांडेय | Feb 15, 2022

भारत एक आस्था प्रधान देश है, लेकिन जब जब यहां के महत्वपूर्ण अधिकारी किसी साधु-संत या योगी के चक्कर में पड़कर महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए, आमलोगों को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का धीरेंद्र ब्रह्मचारी के प्रति आस्थावान होने की बात करें या पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव का चंद्रास्वामी के प्रति श्रद्धावनत रहने की बात करें, या फिर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चित्रा रामकृष्ण द्वारा एक तथाकथित हिमालयी योगी की सलाह पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने की बात करें, इनके पारस्परिक सम्बन्धों के चक्कर में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों से अक्सर आम आदमी ही प्रभावित हुआ है। 

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सवाल है कि क्या देश के अग्रणी स्टॉक एक्सचेंज एनएसई में घोटाला महज इसलिए हो गया कि आस्था प्रधान देश भारत का एक महत्वपूर्ण वित्तीय अधिकारी किसी अदृश्य योगी की सलाह पर अपने तमाम फैसले लिया करता था, जिसके लीक होते रहने से एक बड़ा घोटाला हो गया? इसलिए सेबी की पूछताछ में चौंकाने वाला खुलासा है कि आखिरकार हिमालय में शेयर बाजार पर किसका नियंत्रण था? क्या हिमालय में बैठा कोई सिद्ध व्यक्ति स्टॉक एक्सचेंज चला सकता है जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता है? यदि आप ऐसा पूछेंगे तो आपके मन में ही कई सवाल उठेंगे।  

वह इसलिए कि सेबी ने ही गत शुक्रवार को जारी अपने आदेश में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। साथ ही यह स्पष्ट भी कर दिया है कि यह निर्णय कथित योगी की सलाह पर चित्रा रामकृष्ण द्वारा लिया गया था। हालांकि, सेबी ने अपनी जांच में यह खुलासा नहीं किया कि घोटाले से एनएसई को कितना नुकसान हुआ है। इसने यह भी नहीं बताया है कि क्या कुछ व्यक्तियों ने देश के सबसे बड़े एक्सचेंज में शेयरों का व्यापार करके घोटाले से पैसा कमाया है। क्या इस घोटाले से देश के करोड़ों निवेशक प्रभावित हुए हैं? तथाकथित योगी से किसका ईमेल अकाउंट जुड़ा है? ऐसे कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।

बताया जाता है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चित्रा रामकृष्ण एक तथाकथित हिमालयी योगी की सलाह पर पिछले 20 वर्षों से अपने जीवन में महत्वपूर्ण निर्णय ले रही थीं। उनसे ही जुड़े एक व्यक्ति द्वारा हिमालयी योगी को शेयर बाजार से जुड़ी अहम जानकारियां भी भेजी जा रही थीं। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि वह अब तक इस योगी से कभी नहीं मिली हैं। वह इसके महज संपर्क में थीं, पर उन्होंने उन्हें कभी नहीं देखा। उनका दावा है कि ये योगी कहीं भी प्रकट हो सकते हैं।

सेबी ने अपनी जांच में पाया है कि एक उच्च प्रोफ़ाइल नियुक्ति कथित योगी की सिफारिश के साथ की गई थी, जो इस घोटाले की एक वजह समझा जा रहा है। वाकई अज्ञात योगी एक समूह संचालन अधिकारी और स्टॉक एक्सचेंज के सलाहकार आनंद सुब्रमण्यम की हाई-प्रोफाइल नियुक्ति में शामिल था। दरअसल, आनंद सुब्रमण्यम को एनएसई समूह के कार्यकारी अधिकारी और चित्रा रामकृष्ण के  सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। पर गौर करने वाली बात यह है कि निवेश जगत में सुब्रमण्यम को कोई जानता तक नहीं है। वहीं, इस घोटाले के सामने आने पर उन्होंने 2016 में इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद ही उनसे हुई पूछताछ में कई खास खुलासे हुए हैं।

यही वजह है कि आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति के मामले में सेबी ने गत शुक्रवार को ही बड़ी कार्रवाई की। उसने चित्रा रामकृष्ण और रवि नारायण सहित कुछ लोगों को सुरक्षा अनुबंध नियम के उल्लंघन का दोषी पाया है। चित्रा रामकृष्ण और अन्य के खिलाफ शुक्रवार को पारित अपने अंतिम आदेश में सेबी ने यह खुलासा किया है। सेबी ने रामकृष्ण एवं अन्य पर जुर्माना भी लगाया। यह जुर्माना सुब्रमण्यन की नियुक्ति में प्रतिभूति अनुबंध नियमों के उल्लंघन को लेकर लगाया गया। नियामक ने यह कदम समूह के परिचालन अधिकारी और प्रबंध निदेशक (एमडी) के सलाहकार के रूप में आनंद सुब्रमण्यन की नियुक्ति में प्रतिभूति अनुबंध नियमों के उल्लंघन को लेकर लगाया है।

सेबी ने अपने 190 पन्नों के आदेश में पाया कि योगी ने उन्हें सुब्रमण्यम को नियुक्त करने के लिए निर्देशित किया। इस मामले में कार्रवाई करते हुए सेबी ने रामकृष्ण और सुब्रमण्यन के साथ ही एनएसई और उसके पूर्व प्रबंध निदेशक तथा मुख्य कार्यपालक अधिकारी रवि नारायण तथा अन्य पर भी जुर्माना लगाया। नियामक ने रामकृष्ण पर तीन करोड़ रुपये, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई), नारायण और सुब्रमण्यन पर दो-दो करोड़ रुपये तथा वी आर नरसिम्हन पर छह लाख रुपये का जुर्माना लगाया। इसके साथ ही नियामक ने एनएसई को कोई भी नया उत्पाद पेश करने से छह महीने के लिये रोक दिया। बता दें कि नरसिम्हन एनएसई के मुख्य नियामक अधिकारी और मुख्य अनुपालन अधिकारी थे।

इसके अलावा, रामकृष्ण और सुब्रमण्यन को तीन साल की अवधि के लिए किसी भी बाजार ढांचागत संस्थान या सेबी के साथ पंजीकृत किसी भी मध्यस्थ के साथ जुड़ने को लेकर रोक लगायी गयी है। जबकि नारायण के लिये यह पाबंदी दो साल के लिये है। सेबी ने इसके अलावा एनएसई को रामकृष्ण के अतिरिक्त अवकाश के बदले भुगतान किये गये 1.54 करोड़ रुपये और 2.83 करोड़ रुपये के बोनस (डेफर्ड बोनस) को जब्त करने का भी निर्देश दिया।

सेबी ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि चित्रा रामकृष्ण के अनुसार वह एक गुमनाम व्यक्ति जो एक आध्यात्मिक शक्ति थी, के सम्पर्क में थीं। वह जहां चाहे वहां हाजिर हो सकती है। उसका कोई निश्चित पता या ठिकाना नहीं था। वह मनुष्य मुख्य रूप से हिमालय में साधनारत रहता था। उसी के प्रभाव वश वह पूरी तरह से सुब्रमण्यम पर निर्भर थीं। वहीं, सेबी ने भी यह कहा है कि सुब्रमण्यम योगी का साथी था, जो महत्वपूर्ण निर्णय लेने में चित्रा रामकृष्ण को प्रभावित करता था। इसलिए समूह संचालन अधिकारी और एमडी के सलाहकार का पद उनके लिए बिल्कुल उपयुक्त था। सेबी के आदेश पर उसके पूर्णकालिक सदस्य अनंत बरुआ के हस्ताक्षर हैं। आदेश में यह भी कहा गया है कि योगी के आदेश पर हर साल सुब्रमण्यम को मोटी रकम का भुगतान किया जा रहा था। दूसरी ओर, सुब्रमण्यम ने 12 सितंबर, 2018 को अपने एक बयान में कबूल किया है कि वह पिछले 22 वर्षों से अज्ञात योगी को जानता था। सेबी के अनुसार, हर साल सुब्रमण्यम के लिए एनएसई के खजाने से कम से कम 5 करोड़ रुपये निकल रहे थे। क्योंकि चित्रा रामकृष्ण पूरी तरह से सुब्रमण्यम पर निर्भर थीं और उनके बिना वह कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकती थी।

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सेबी के आदेश के मुताबिक, रामकृष्ण ने योगी को सेबी के फैसले, कर्मचारियों से जुड़ी नीतियों और संगठन के ढांचे से जुड़ी अहम जानकारियां लीक की थीं। यह जानकारी 2014 से 2016 के बीच लीक हुई थी। सेबी ने इसके लिए इस्तेमाल किए गए ईमेल का भी खुलासा किया है। इसलिए सवाल उठ रहा है कि इस पूरे झोल मोल में निवेशकों को कितना नुकसान हुआ? क्योंकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की पूर्व एमडी एंड सीईओ हिमालय के एक योगी की सलाह पर लेती थी फैसला, यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है।

# जानिए, क्या है एनएसई घोटाला और किन किन लोगों ने किस तरह से इसे दिया अंजाम

बता दें कि 2014-15 में एक मुखबिर ने सेबी से शिकायत की थी कि कुछ ब्रोकरों ने एनएसई के कुछ शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ मिलीभगत से को-लोकेशन फैसिलिटी का दुरुपयोग किया। इसके मुतल्लिक ही पूंजी बाजार नियामक सिक्यॉरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी सेबी ने नैशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई को एक खास जगह पर स्थापित एक्सचेंज के कुछ सर्वर को कारोबार में कथित रूप से वरीयता देने यानी को-लोकेशन के मामले में 687 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इसके अलावा, कंपनी के दो पूर्व प्रमुखों पर भी कार्रवाई की गई है। 

समझा जाता है कि एनएसई की को-लोकेशन सुविधा के माध्यम से हाई फ्रिक्वेंसी वाले कारोबार में अनियमितता के आरोपों की जांच के बाद सेबी ने यह आदेश दिया था, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि एनएसई को 624.89 करोड़ रुपये और उसके साथ उस पर 1 अप्रैल 2014 से 12 प्रतिशत सालाना ब्याज दर सहित पूरी राशि सेबी द्वारा स्थापित निवेशक सुरक्षा एवं शिक्षा कोष (आईपीईएफ) में भरनी होगी।

सवाल है कि आखिर को-लोकेशन क्या है और कैसे काम करता है? तो जवाब होगा कि को-लोकेशन के कारण ब्रोकर सर्वर के ज्यादा नजदीक होकर काम कर सकते हैं। इस सुविधा के लिए ब्रोकरों को अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ता है। इस सुविधा का इस्तेमाल करने वाले ब्रोकरों को दूसरे ब्रोकरों पर बढ़त मिल जाती है क्योंकि एक्सचेंज सर्वर से ज्यादा नजदीकी के कारण उन्हें दूसरों के मुकाबले कम वक्त में डेटा ट्रांसमिशन का लाभ मिल जाता है। यह सुविधा लेने वाले ब्रोकरों के ऑर्डर्स एक्सचेंज सर्वर उन ब्रोकरों के मुकाबले जल्दी पहुंच जाते हैं जिन्होंने यह सुविधा नहीं ले रखी है।

सवाल है कि इसमें क्या घोटाला हुआ? तो जवाब होगा कि 2014-15 में एक मुखबिर ने सेबी से शिकायत की थी कि कुछ ब्रोकरों ने एनएसई के कुछ शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ मिलीभगत से कोलोकेशन फसिलिटी का दुरुपयोग किया। तब एनएसई के सदस्यों के बीच आंकड़े प्रसारित करने के लिए तथाकथित टिक-बाय-टिक (टीबीटी) सर्वर प्रोटोकॉल का इस्तेमाल हुआ करता था। इस सिस्टम की प्रमुख विशेषता सूचना भेजने का इसका तरीका थी। सामान्य डेट प्रॉकोकॉल्स में नेटवर्क से जुड़े सभी यूजर्स को एक वक्त में ही डेटा भेजे जाते हैं। लेकिन, टीबीटी में ऑर्ड्स प्राप्त करने के क्रम में ही डेटा भेजे जाते हैं। कुछ ब्रोकरों ने एनएसई अधिकारियों और ऑम्नेसिस टेक्नॉलजीज, जो एनएसई को टेक्नॉलजी मुहैया कराने वाली कंपनी है, की मिलीभगत से एनएसई सर्वर को सबसे पहले एक्सेस किया करते थे।

सवाल है कि सेबी को क्या मिला? तो जवाब होगा कि सेबी ने ओपीजी सिक्यॉरिटीज, जीकेएन सिक्यॉरिटीज और वेकटुवेल्थ के साथ-साथ इंटरनेट सेवा प्रदाता संपर्क इन्फोटेनमेंट को अनुचित व्यापारिक कार्यप्रणाली यानी अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस का दोषी पाया। ये ब्रोकर्स लगातार एनएसई सर्वर्स का इस्तेमाल दूसरों से पहले करते रहे।

सवाल है कि ओपीजी और दूसरों ने कैसे किया खेल? तो जवाब होगा कि ओपीजी ने एनएसई के बैकअप सर्वरों तक पहुंच बना ली। एक्सचेंज इसका रखरखाव मेन सर्वर में तकनीकी गड़बड़ियां आने की स्थिति में ट्रेडिंग ऑपरेशन को अबाध गति से जारी रखने के लिए करता है। इन सर्वरों पर बेहद कम या तो बिल्कुल भी ट्रैफिक नहीं होती है, क्योंकि ये सिर्फ बैकअप के लिए होते हैं। आम दिनों में जब मेन सर्वर काम करते हैं, तब बैकअप सर्वर से लॉगइन करने वाले को बहुत तेजी से डेटा मिल जाता है। सेबी के मुातबिक, ओपीजी और दूसरों ने इसी का फायदा उठाया।

सवाल है कि क्या एनएसई ने कानून तोड़ा था? तो जवाब होगा कि एनएसई ने ओपीजी और दूसरों को बैक-अप सर्वर का ऐक्सेस दिया। इन ब्रोकरों को तेजी से डेटा मिलने से ऑर्डर पूरा करने में दूसरों पर बढ़त मिल रही थी। एनएसई ने यह तथ्य भी नजरअंदाज किया कि संपर्क इन्फोटेनमेंट के पास टेलिकॉम डिपार्टमेंट का वैध लाइसेंस भी नहीं है ताकि वह कुछ ब्रोकरों को डार्क फाइबर कनेक्टविटी दे सके। 

वहीं, सेबी ने ब्रोकरों के साथ-साथ एनएसई के कुछ अधिकारियों पर भी जुर्माना लगाया। इनमें एनएसई की पूर्व सीईओ चित्रा रामकृष्णन, पूर्व एमडी रवि नारायण, एनएसई में कोलो डिपार्टमेंट के पूर्व प्रमुख देवी प्रसाद सिंह, मौजूदा बिजनस डिवेलपमेंट हेड रवि वाराणसी और सीटीओ उमेश जैन समेत कुछ अन्य लोग शामिल हैं। सेबी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि प्रमुख पदाधिकारियों ने उचित नियमों का पालन नहीं किया। एनएसई पर 687 करोड़ रुपये और ब्याज का जुर्माना लगाया गया।

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सवाल है कि डार्क फाइबर क्या है? तो जवाब होगा कि डार्क फाइबर से मिले कनेक्शन में ज्यादा बैंडविड्थ होता है और इससे मिलने वाले आंकड़ों में बहुत कम गड़बड़ी पाई जाती है। यानी, इसके जरिए सर्वरों तक तेज और सटीक पहुंच मिलती है।

सवाल है कि सेबी के आदेश पर एनएसई पर क्या असर होगा? तो जवाब होगा कि सेबी ने एनएसई को 687 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही, एनएसई को अगले छह महीने तक कैपिटल मार्केट्स की पहुंच से रोक दिया है। इसके आईपीओ इस वर्ष के आखिर तक टल जाएंगे, लेकिन इसका एनएसई या इसके वैल्युएशन पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। क्योंकि जुर्माना चुकाने के लिए एनएसई के पास पर्याप्त रकम है। और जुर्माना भरने के बाद भी उसकी आर्थिक स्थिति पर मजबूत ही रहेगी।

सवाल है कि क्या सामान्य परिचालन प्रभावित होंगे? तो जवाब होगा कि नहीं। सेबी के आदेश से एक्सचेंज पर होने वाले सामान्य कारोबार निष्प्रभावी रहेंगे।

बता दें कि एक बार मद्रास उच्च न्यायालय ने भी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के करोड़ों रुपये के को-लोकेशन घोटाले में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और तीन अन्य एजेंसियों को नोटिस जारी किया था। उसने चेन्नई फाइनेंशियल मार्केट्स एंड अकाउंटैबिलिटी (सीएफएमए) की जनहित याचिका पर अदालत ने नोटिस जारी किया था। सीएफएमए ने अपनी याचिका में कहा था कि इस चार साल पुराने घोटाले में सीबीआई जांच की गति काफी धीमी है। उसने कहा कि यह परेशान करने वाला है कि सेबी ने एनएसई और उसके अधिकारियों को सेबी (प्रतिभूति बाजार से संबंधित धोखाधड़ी और और अनुचित व्यवहार प्रतिबंध कानून) नियमन, 2003 के तहत सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। तब न्यायमूर्ति एम सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एन शेषासायी की खंडपीठ ने एनएसई, सेबी, सीबीआई, ईडी और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) और वित्तीय आसूचना इकाई (एफआईयू) को नोटिस जारी किया था।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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