By कमलेश पांडे | Aug 24, 2026
नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शन स्थल "जंतर-मंतर" (वोट क्लब के बाद) पर 21 अगस्त 2026 को हुआ ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलन वास्तव में आरक्षण सुधार मुहिम बनकर रह गया। हालांकि इसके सामाजिक मिजाज और जनहितकारी तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के लिए महज एक और धरना नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति है जो सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में अवसरों को लेकर सामान्य वर्ग के एक प्रतिभाशाली हिस्से, खासकर जेन-जी युवाओं में दिखाई दे रहा है। साथ ही प्रौढ़ और बुजुर्ग समाजसेवियों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है।
इससे सामान्य वर्ग के आन्दोलनकारियों, जो मोदी सरकार के प्रबल समर्थक लोगों में शुमार किये जाते हैं, को यूजीसी मुहिम के बाद आरक्षण सुधार मुहिम के रूप में दूसरा बड़ा धक्का लगा। वस्तुतः, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग थी कि सरकारी सहायता और आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक वंचना को अधिक महत्व दे। लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है, वह यह कि-
पहला यह कि, जब अपनी सरकार से आरक्षण पर सवाल पूछना अपराध नहीं है तो फिर दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर अनुमति क्यों नहीं दी? फिर शांतिपूर्ण लोगों पर बल प्रयोग और गिरफ्तारी क्यों की गई? इस जनप्रदर्शन का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षण पर असहमति को अपने-आप सामाजिक न्याय-विरोधी मानने के बजाय इसे सार्वजनिक नीति की बहस के रूप में देखने की गुंजाइश दिखाई देती है। यह distinction महत्वपूर्ण है।
जैसे आरक्षण की आलोचना करना और वंचित वर्गों के अधिकारों का विरोध करना एक ही बात नहीं है। उसी तरह, आरक्षण का समर्थन करना और आरक्षण व्यवस्था के हर वर्तमान प्रावधान को सही मानना भी एक ही बात नहीं है। यही वह बीच का क्षेत्र है जहां गंभीर पत्रकारिता और नीति-विमर्श होना चाहिए। यद्यपि जंतर-मंतर के आंदोलनों और पत्रकारों से जुड़े घटनाक्रम पर अलग से कतिपय कार्यक्रम भी सामने आया है। इससे उनका व्यापक दृष्टिकोण समझने में मदद मिलती है कि वे आंदोलन को केवल तत्काल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि उसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखते हैं।
दूसरा यह कि आंदोलन की सबसे मजबूत दलील क्या है? आंदोलनकारियों का सबसे मजबूत प्रश्न है: अगर गरीबी सभी जातियों में मौजूद है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद केवल उसकी जाति देखकर क्यों तय हो? यह सवाल भावनात्मक होने के साथ-साथ नीतिगत भी है।
प्रदर्शन में मेरिट, आर्थिक आधार और आरक्षण नीति पर श्वेत पत्र (White Paper) की मांग उठी। यह मांग सरकार को असहज कर सकती है क्योंकि इससे बहस सीधे आंकड़ों पर आ जाएगी: आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिला? किन परिवारों को पीढ़ियों से लाभ मिल रहा है? कौन से समुदाय अभी भी प्रतिनिधित्व से बाहर हैं? आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर हैं या नहीं? सरकारी नौकरियां इतनी हैं भी या नहीं कि आरक्षण की पूरी बहस को केवल कोटे के प्रश्न तक सीमित किया जा सके? इसलिए White Paper की मांग को केवल आरक्षण-विरोधी नारा मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा।
तीसरा यह कि, लेकिन आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी भी यहीं है! सिर्फ गरीबी सामाजिक पिछड़ेपन का पूरा मापदंड नहीं है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदल सकती है, लेकिन सामाजिक पहचान और उससे जुड़े भेदभाव के अनुभव हमेशा उसी गति से नहीं बदलते।
यही आरक्षण समर्थक पक्ष की मूल दलील है। इसलिए यदि आंदोलन यह मान ले कि गरीबी = पिछड़ापन तो उसका तर्क अधूरा रह जाएगा। भारत में आरक्षण केवल गरीबी हटाने की योजना नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को संस्थागत अवसर देने से भी है। इसीलिए आर्थिक सहायता और आरक्षण को पूरी तरह समानार्थी मानना संवैधानिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से समस्या पैदा करता है।
चौथा यह कि, चिराग पासवान जैसों की प्रतिक्रिया क्यों महत्वपूर्ण है? गत 22 अगस्त को चिराग पासवान ने आरक्षण को खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि यह किसी आंदोलन के कहने मात्र से समाप्त नहीं हो सकता। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि एक ओर सामान्य वर्ग के युवाओं में असंतोष बढ़ता है, तो दूसरी ओर SC/ST/OBC राजनीतिक समूहों के लिए आरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न है। इसलिए कोई भी राष्ट्रीय दल सीधे तौर पर एक पक्ष चुनकर दूसरे को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता। यही वजह है कि भाजपा सहित सभी दलों के सामने आने वाले समय में कठिन सामाजिक-संतुलन की चुनौती होगी। जबकि वास्तविकता यह है कि इसी आरक्षण की आड़ में कतिपय दलित/आदिवासी परिवार फल फूल रहे हैं और अपने ही वर्ग के वंचित लोगों की हकमारी कर रहे हैं। चूंकि संसद और सुप्रीम कोर्ट अबतक इनके पक्ष में है, इसलिए ये वास्तविक दलितों/आदिवासियों को फलने फूलने के मौके नहीं दिए और इसके लिए मनुवादियों यानी सामान्य वर्ग के लोगों को जिम्मेदार ठहराकर अपना सियासी हित साधते आए हैं। मौजूदा आंदोलन से यह स्थिति भी बदलेगी।
पांचवां यह कि, ब्रजेश पाठक का हस्तक्षेप भी राजनीतिक संकेत है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलनकारी छात्रों के नेता हर्ष दूबे से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को आगे पहुंचाने और केंद्रीय मंत्री से बातचीत कराने का आश्वासन दिया। यह छोटा घटनाक्रम नहीं है। इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सरकार के भीतर भी यह समझ है कि आंदोलन को केवल ‘आरक्षण विरोध’ कहकर नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक रूप से पर्याप्त रणनीति नहीं होगी। संवाद शुरू होना ही इस आंदोलन की पहली राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन संवाद का अर्थ मांगों को स्वीकार करना नहीं है।
छठा यह कि, संविधान बनाम आंदोलन: असली सीमा कहां है? यहां सबसे जरूरी सावधानी है। आरक्षण व्यवस्था संविधान, संसद और सुप्रीम कोर्ट के विकसित होते न्यायशास्त्र से जुड़ी हुई है। इसलिए इसे केवल सड़क के आंदोलन से समाप्त या पूरी तरह पुनर्गठित नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ लोकतंत्र में किसी नीति की आलोचना करने के लिए संविधान-विरोधी होना आवश्यक नहीं। यही लोकतांत्रिक संतुलन है: आरक्षण का संवैधानिक अस्तित्व सुरक्षित रहे, लेकिन आरक्षण की नीतियों पर लोकतांत्रिक समीक्षा का अधिकार भी सुरक्षित रहे। इसलिए ‘आरक्षण पर चर्चा ही नहीं हो सकती’ और ‘आरक्षण तुरंत खत्म कर दो’—दोनों अतियां हैं।
सातवां यह कि, SC/ST Act को आरक्षण बहस में जोड़ना आंदोलन को कमजोर कर सकता है। जंतर-मंतर के कुछ प्रदर्शनकारियों ने SC/ST Act को समाप्त करने की मांग भी उठाई। राजनीतिक दृष्टि से यह आंदोलन के लिए जोखिम है। क्यों? क्योंकि आरक्षण की समीक्षा पर आर्थिक, प्रशासनिक और प्रतिनिधित्व आधारित बहस हो सकती है।
लेकिन SC/ST Act का विषय मुख्यतः अत्याचार, भेदभाव और कानूनी संरक्षण से जुड़ा है। दोनों को एक ही मुद्दा बना देने से आंदोलन का मुख्य प्रश्न—आरक्षण सुधार—एक अलग और अधिक विवादास्पद राजनीतिक लड़ाई में बदल सकता है। यदि आंदोलन व्यापक सामाजिक समर्थन चाहता है तो उसे अपने एजेंडे में स्पष्ट प्राथमिकता रखनी होगी।
आठवां यह कि, ‘मेरिट’ की बहस को भी अधिक वैज्ञानिक बनाने की जरूरत है। ‘मेरिट बचाओ’ एक प्रभावी नारा है। लेकिन मेरिट केवल परीक्षा में मिले अंकों का नाम नहीं है। एक गरीब सरकारी स्कूल का विद्यार्थी, जिसके पास महंगी कोचिंग, अंग्रेजी माध्यम, डिजिटल संसाधन और शिक्षित पारिवारिक वातावरण नहीं है, और दूसरी ओर अत्यधिक संसाधन वाले परिवार का विद्यार्थी—दोनों की परीक्षा-तैयारी की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। इसलिए भारत को ऐसी नीति चाहिए जो प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बचाए और अवसर की असमानता भी कम करे। यही वास्तविक meritocracy होगी।
नौवां यह कि, आंदोलन यदि सफल होना चाहता है तो उसे ‘आरक्षण हटाओ’ से आगे जाना होगा और 'आरक्षण सुधारो' की बात करनी होगी। यही सबसे निर्णायक राजनीतिक बिंदु है। यदि आंदोलन का संदेश केवल “आरक्षण समाप्त करो” रहता है, तो इसका सामाजिक आधार सीमित रहेगा। लेकिन यदि इसका एजेंडा बनता है आरक्षण सुधारो और “समान अवसर + पारदर्शी आरक्षण + वास्तविक वंचित तक लाभ + आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए मजबूत सहायता + गुणवत्तापूर्ण शिक्षा + सरकारी भर्ती में पारदर्शिता” तो इसका प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है। तब यह किसी एक जाति के खिलाफ आंदोलन नहीं बल्कि नीति-सुधार आंदोलन बन सकता है।
दसवां यह कि, राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारतीय राजनीति ने लंबे समय से जातीय समूहों को चुनावी गणित की इकाइयों के रूप में देखा है। यह आंदोलन उस गणित में एक नया प्रश्न जोड़ रहा है: क्या आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन गैर-आरक्षित युवा भी एक स्वतंत्र राजनीतिक दबाव समूह बन सकता है? यदि उत्तर हां है, तो राजनीतिक दलों को केवल जातीय समीकरणों के आधार पर घोषणापत्र तैयार करना कठिन होगा। उन्हें रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, छात्रवृत्ति, कोचिंग, आर्थिक सहायता और आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों पर ठोस नीति देनी पड़ेगी।
ग्यारहवां यह कि, क्या आरक्षण समर्थन या आरक्षण विरोध के बीच आरक्षण सुधार की वास्तविक राजनीतिक उपयोगिता सिद्ध की जाएगी। क्योंकि इस दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे बहस को एक सरल binary से बाहर निकालने की संभावना पैदा होगी। आरक्षण समर्थक बनाम आरक्षण विरोधी के बजाय बहस हो कि सामाजिक न्याय कैसे अधिक न्यायपूर्ण बने? यह प्रश्न ज्यादा कठिन है, लेकिन ज्यादा लोकतांत्रिक भी। क्योंकि संभव है कि वर्तमान व्यवस्था में कुछ ऐसे लोग हों जिन्हें सहायता की जरूरत है लेकिन वे उससे बाहर हैं। और यह भी संभव है कि कुछ ऐसे लोग हों जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय से आते हैं और आज भी सामाजिक भेदभाव तथा प्रतिनिधित्व की कमी का सामना करते हैं। लिहाजा एक न्यायपूर्ण नीति को दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की बहस होनी चाहिए? जंतर-मंतर का आंदोलन अभी इतना बड़ा नहीं हो गया है कि इसे तत्काल राष्ट्रीय राजनीतिक परिवर्तन का संकेत कहा जाए। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल होगी। 21–22 अगस्त की भीड़, सोशल मीडिया से जुटाव, हिरासत, मेरिट और आर्थिक आधार की मांग, White Paper की मांग और राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि आरक्षण पर एक नया विमर्श आकार ले रहा है।
असल सवाल शायद यह नहीं है कि “आरक्षण रहे या खत्म हो?” बल्कि यह है कि क्या भारत ऐसा सामाजिक न्याय मॉडल बना सकता है जिसमें ऐतिहासिक सामाजिक वंचना का समाधान भी हो, वास्तविक गरीब को उसकी जाति से परे अवसर भी मिले, मेरिट और प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बनी रहे और आरक्षण का लाभ सबसे वंचित व्यक्ति तक पारदर्शी तरीके से पहुंचे?” यदि इस प्रश्न पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होती है, तो जंतर-मंतर का यह आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक क्षणिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आरक्षण नीति की अगली पीढ़ी पर बहस की शुरुआत साबित हो सकता है।
और, सरकार के लिए सबसे समझदार रास्ता होगा—न आंदोलन को दबाना, न उसकी हर मांग स्वीकार करना; बल्कि आंकड़ों के साथ White Paper, विशेषज्ञ संवाद और व्यापक सामाजिक परामर्श शुरू करना। यही लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता है। पहले भी यहीं पर कांग्रेसी और समाजवादी सरकारें चूक कीं हैं, और जनाधार बचाने के चक्कर में उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी है। आज भाजपा भी इसी दुविधा में है, और अगर यही हाल रहा तो बांकीपुर और दतिया उपचुनाव परिणाम की तरह उसकी आने वाली सरकारें भी विफलता प्राप्त करेंगी, क्योंकि जब मूल जनाधार छिटकेगा, तब नीतिगत रूप से हासिल जनाधार की मरूभूमि वाली मृगमरीचिका का पता चलेगा। तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाइए।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक