Gyan Ganga: क्या आप जानते हैं कि श्रीराम जी के बाणों में दो विशेष गुण भी होते हैं

By सुखी भारती | Oct 14, 2021

जैसा कि हमने पिछले अंक में कहा था कि श्रीहनुमान जी जैसे ही पर्वत पर से छलाँग लगाते हैं, वह पर्वत पाताल में धँस जाता है। हमने यह भी स्पष्ट किया था कि उक्त घटना में न्यूटन के गुरुत्वाकर्ष्ण के सिद्धांत की झलक भी दिखाई पड़ी थी। यहाँ कुछ लोग मन में संशय को स्थान देने से परहेज नहीं करते कि भई उस काल खण्ड में भला विज्ञाान का ज्ञान किसे था? तब के लोग तो अनपढ़ थे। और वैसे भी वनवासियों को क्या पता कि विज्ञान क्या बला होती है? तो ऐसे अँध जिज्ञासुयों के लिए बताते चलें कि वास्तविक वैज्ञानिक तो हमारे महापुरुष ही थे। आप वेदों का अध्ययन करके देखेंगे, तो आप के आश्चर्य की सीमा नहीं रहेगी। कारण कि वेदों में विज्ञान के ऐेसे ऐसे सूत्र वर्णित हैं, जिन्हें आधुनिक वैज्ञानिकों को भी सोचने पर विवश कर दिया है। जर्मनी के वैज्ञानिको ने तो बकायदा भारत से संस्कृत के विद्वानों को बुला, वेदों को अपनी स्थानीय भाषा में अनुवाद कराया। और कितने ही वैज्ञानिक सूत्रें को उन्होंने आत्मसात किया। रावण के बारे में हमारे धार्मिक शास्त्रें में वर्णन है, कि जब वह माता सीता जी का अपहरण करने आया था, तो वह पुष्पक विमान पर स्वार होकर आया था। आधुनिक वैज्ञानिक तो समय में विमान की कल्पना मक नहीं कर सकते। कारण कि आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार तो पहला विमान बनाने व उड़ाने का श्रेय तो ऑरविल व विलबर नाम के अमेरिकी राइट बंधुओं को जाता है। जिनके बनाये जहाज ने पहली सफल उड़ान 17 दिसंबर 1903 को भरी। यद्यपि हमारे वैदिक काल में तो विमान उडाना बड़ी आम-सी बात थी। विमान भी इतनी खास तकनीकों से सराबोर होते थे, कि हम तो सोच कर दाँतों तले अँगुली दबा लेंगे।

ऐसी एक नहीं, अपितु असंख्य उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। और ऐसा भी नहीं कि वनों में रहने वाले यह वानर कोई अनपढ़ या गंवार थे। कारण कि श्रीहनुमान जी जिस समय प्रथम बार श्रीराम जी से भेंट करते हैं। तो वे संस्कृत में ही बात करते हैं, और वेदों सहित अनेकों शास्त्रें पर श्रीराम जी से वार्ता करते हैं। कहने का तात्पर्य कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि हमारे महापुरुष कोई साधारण व्यक्तित्व के मालिक थे। अपितु संसार की समस्त विद्यायों के वे ही एक मात्र पुरोधा थे। इसलिए किसी का यह सोचना कि श्रीरामचरितमानस अथवा अन्य हमारे वैदिक ग्रंथ सत्यता से परे हैं, तो ऐसा किचिंत भी नहीं है। खैर! श्रीहनुमान जी उड़ान भरते हैं। जिसमें उनके लिए श्री तुलसी दास जी ने लिखा कि श्रीहनुमान जी यूँ चले जैसे श्रीराम जी का बाण चलता है-

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‘जिमि अमाघ रघुपति कर बाना।

एही भाँति चलेउ हनुमाना।।’

इसमें भी गोस्वामी तुलसीदास जी एक विशेष बात कहना चाह रहे हैं। वह यह कि श्रीराम जी के बाण की एक विशेषता थी कि प्रभु के बाण को जिस भी लक्ष्य का भेदन करने के लिए छोड़ दिया जाता, वह बाण अपना लक्ष्य भेदन करके ही दम लेता। उसमें भी श्रीराम जी के बाण में दो बातें विशेष गुण धारण किए रहती हैं। पहली यह कि अन्य बाणों की भाँति श्रीराम जी का बाण केवल सीधा ही नहीं चलता था। अपितु अगर उसे टेढ़ा मेढ़ा भी चलना पड़ता, तो राम बाण अपनी दिशा भी बदल लेता था। जो कि संसार का अन्य कोई भी बाण, यह करने में सर्वदा असमर्थ होता है। श्रीराम जी के बाण की दूसरी विशेषता यह कि अन्य साधारण बाण तो एक बार अपने लक्ष्य पर पहुँच जायें, तो वहीं धँसकर रह जाते हैं। लेकित श्रीराम जी के बाण के साथ नहीं था। श्रीराम जी के बाण ने जब अपना लक्ष्य भेद लिया, तो वह बाण पुनः वापिस श्रीराम जी के तुनीर में आकर प्रभु की पीठ पर सज जाता। गोस्वामी जी कहना चाह रहे हैं, कि श्रीहनुमान जी भी मानों ऐसे ही थे। एक तो वे अपने लक्ष्य पर पहुँचेंगे ही पहुँचेंगे, साथ में ऐसा नहीं कि वे कहीं फँसकर रह जायें। अपितु वे प्रभु का कार्य संपन्न करके पुनः श्रीराम जी के पास वापिस लौट आयेंगे। श्रीहनुमान जी ने उड़ान भरी ही थी कि उनके सामने कोई आन खड़ा हुआ। वह मित्र था या शत्रु, हितकारी था या अहितकारी? जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम...!

-सुखी भारती

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