By कमलेश पांडे | Oct 31, 2026
अमेरिका अपनी वैश्विक बादशाहत बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया को तृतीय विश्व युद्ध की आग में झोंकने वाला है! चाहे तेल का खेल हो या फिर मज़बूत सरकारों को अस्थिर करने का षड्यंत्र- अमेरिकी रणनीति हर मोर्चे पर पिटती हुई प्रतीत हुई। इसी की खीझ में अब वह खाड़ी और मध्य-पूर्व देशों, यूरोप और भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ नया गुल खिलाने वाला है क्योंकि उसके 'पालतू कुत्तों' के पांव भी अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं।
इस बात की चुगली पूरी दुनिया की वह गिनी चुनी सरकारें कर रही हैं, जो ऐसी चेतावनियाँ दे रही हैं, जैसी शायद आखिरी बार दूसरे विश्व युद्ध से पहले देखने को मिली थीं। जहां एक तरफ अमेरिका का पेंटागन अपने सभी मिलिट्री बेस को 'ऑपरेशन फोर्ट्रेस' के तहत तैयार कर रहा है, जिसके तहत अमेरिकी सैन्य ठिकानों को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वे बाहर से खाना, पानी या किसी भी तरह की सप्लाई मिले बिना पूरे 90 दिनों तक अपना काम चला सकें।
वहीं दूसरी तरफ, यूरोपीय देशों ब्रिटेन, नीदरलैंड और फ्रांस एवं एशियाई देश जापान ने अपने नागरिकों से कह दिया है कि वे कम से कम 72 घंटे तक काम आने वाला इमरजेंसी सामान अपने घर में जमा करके रखें। इसमें खाने-पीने की चीजें, पानी, दवाइयाँ और यहाँ तक कि नकद पैसे भी शामिल हैं, ताकि अगर बिजली, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएँ बंद हो जाएँ, तो लोग बिना किसी बाहरी मदद के कम से कम 72 घंटे तक अपना काम चला सकें। भले ही सरकारें इसकी आधिकारिक वजह खराब मौसम, एल नीनो, बिजली गुल होने और साइबर अटैक जैसी स्थितियों को बता रही हैं, लेकिन सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात ये है कि कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
अब सवाल ये है कि आखिर अचानक दुनिया भर में ऐसी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं? और अमेरिकी-यूरोपीय टारगेट पर आने वाले देश क्या तैयारियां कर रहे हैं? इसके पीछे सिर्फ दो संभावनाएँ हैं। पहली, ये सारी तैयारियाँ सिर्फ सुरक्षा के लिए की जा रही हैं और इनका किसी असली खतरे से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी, दुनिया की ये सारी सरकारें कुछ ऐसा जानती हैं, जिसके बारे में वे अभी हमें बता नहीं सकतीं या जानबूझकर बता नहीं रही हैं। और अगर दूसरी बात सही है, तो आखिर वो क्या है?
सबसे बड़ी आशंका ये है कि अमेरिका में मिडटर्म चुनावों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर से युद्ध शुरू हो सकता है। साथ ही, यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी और ज्यादा भड़क सकता है। इधर, भारत के खिलाफ पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश आग उगल सकते हैं।
इसलिए पहले मैं ईरान की बात करता हूँ। अगर इस बार दोबारा युद्ध शुरू होता है, तो इसकी शुरुआत सबसे ज्यादा संभावना के साथ बाब अल-मंदेब के पास हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच टकराव से हो सकती है। इसका मतलब ये है कि तेल की सप्लाई पर खतरा सिर्फ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाब अल-मंदेब के रास्ते पर भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। और धीरे-धीरे ये संकट स्वेज नहर तक फैल सकता है।
आपको बता दूँ कि स्वेज नहर दुनिया के व्यापार का एक बेहद अहम रास्ता है। दावा है कि दुनिया का लगभग 25% व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। अगर ये रास्ता बंद हो गया, तो यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के बीच व्यापार के रास्ते लगभग कटकर रह जाएँगे। दुनिया भर में सामान पहुँचाने में भारी रुकावट आएगी और तेल की सप्लाई पर भी बहुत बड़ा असर पड़ सकता है।
और ये सब उस समय हो रहा है, जब अमेरिका का तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर 'थियोडोर रूजवेल्ट' मिडिल ईस्ट पहुँचने वाला है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने अपने दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को भी मिडिल ईस्ट से निकलने के लिए कहा है। यानी अमेरिका वही तैयारियाँ दोबारा करता हुआ दिखाई दे रहा है, जैसी उसने इस साल 28 फरवरी को हुए हमले से पहले की थीं।
और अब यूरोप की तरफ आइए। ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि अमेरिका यूरोप में तैनात अपने नाटो सैनिकों में से लगभग एक-तिहाई सैनिकों को वापस बुला सकता है। इससे पहले अमेरिका दक्षिण कोरिया से अपना थाड (THAAD) एयर डिफेंस सिस्टम भी हटा चुका है। अब इस बात को समझिए कि दक्षिण कोरिया से थाड हटने के बाद उत्तर कोरिया से आने वाले संभावित मिसाइल हमलों से बचाव की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। ठीक उसी तरह, अगर अमेरिका यूरोप से अपने सैनिकों को वापस बुला लेता है, तो रूस के सामने यूरोप की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। और रूस के राष्ट्रपति पुतिन इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं।
यही वजह है कि यूरोप के देश अपनी सेना और रक्षा पर खर्च लगातार बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आम लोगों के लिए जरूरी सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च कम किया जा रहा है। यानी आम जनता की सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन सेना और हथियारों पर खर्च बढ़ाने का सिलसिला रुक नहीं रहा है। यूरोप के देशों में इसी बात को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं कि सरकारें आम लोगों की जरूरतों पर खर्च कम कर रही हैं, जबकि सेना और रक्षा पर लगातार ज्यादा पैसा लगा रही हैं।
इसके बावजूद कोई भी देश अपनी रक्षा तैयारियों को धीमा करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। यूरोपीय देश सेना और रक्षा पर अब उतना पैसा खर्च कर रहे हैं, जितना दूसरे विश्व युद्ध के बाद से किसी भी समय नहीं किया गया था। खासकर जर्मनी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि उसके अस्पतालों को तैयार रहना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे एक ही रात में कम से कम 1,000 मरीजों का इलाज कर सकें।
अब इन सारी बातों को एक साथ जोड़कर देखिए तो आभास होता है कि दुनिया की सरकारें अपने नागरिकों से इमरजेंसी सामान जमा करने को कह रही हैं। अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बिना बाहरी सप्लाई के चलने के लिए तैयार कर रहा है। मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को हटाया जा रहा है और दुनिया के सबसे अहम तेल और व्यापारिक रास्तों पर खतरा मंडरा रहा है।
दूसरी तरफ, अमेरिका के यूरोप से सैनिक वापस बुलाने की खबरों के बीच यूरोपीय देश अपनी सेना और हथियारों पर रिकॉर्ड स्तर पर पैसा खर्च कर रहे हैं। जर्मनी के अस्पतालों को एक ही रात में 1,000 मरीजों को संभालने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। यानी दुनिया की तमाम बड़ी ताकतें एक ही समय पर ऐसी तैयारियाँ कर रही हैं, जो युद्ध जैसी किसी बड़ी स्थिति में काम आ सकती हैं, लेकिन कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है!
अब आप खुद सोचिए कि जब अलग-अलग देशों की सरकारें एक साथ इस तरह की तैयारियाँ कर रही हैं, तो आखिर उन्हें किस चीज का डर है? क्या ये सब सिर्फ सामान्य सुरक्षा तैयारियाँ हैं, या फिर सरकारें किसी ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रही हैं, जिसके बारे में आम लोगों को अभी बताया नहीं जा रहा है? ब्रिक्स देशों को भी अब सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि देर सबेर ये गाज उन्हीं पर गिरने वाली है। शुरुआत भले ही ईरान व रूस से हो, लेकिन देर सबेर भारत और चीन दोनों को लपेटा जाना तय है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जी-2 और जी-3 की आड़ में खुद के वर्चस्व को कायम रखना चाहा, लेकिन जब बात नहीं बन पाई तो दुष्परिणाम कभी भी दिखाई पड़ सकता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक