By नीरज कुमार दुबे | Jan 16, 2026
आख़िरकार वह क्षण आ ही गया, जिसका जिक्र अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वर्षों से अपने भाषणों और समर्थकों के बीच करते रहे हैं। जी हाँ, वह क्षण था नोबेल शांति पुरस्कार को प्राप्त करना। हालांकि नोबेल शांति पुरस्कार उन्हें औपचारिक रूप से भले ही न मिला हो, लेकिन वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचाडो द्वारा अपना नोबेल पदक उन्हें भेंट किया जाना, एक तरह से उस अधूरी इच्छा की प्रतीकात्मक पूर्ति जैसा है। वैसे यह घटना जितनी नाटकीय है, उतनी ही राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों से भरी हुई भी है।
देखा जाये तो नोबेल शांति पुरस्कार किसी व्यक्ति की निजी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक मूल्यों यानि शांति, लोकतंत्र, मानवाधिकार और नैतिक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में उसका इस तरह प्रतीकात्मक रूप से “सौंपा जाना” यह सवाल खड़ा करता है कि क्या नैतिक सम्मान को राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बनाया जाना उचित है। नोबेल समिति पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यह पुरस्कार न तो स्थानांतरित किया जा सकता है और न साझा, लेकिन राजनीति में अक्सर औपचारिक नियमों से ज़्यादा महत्व प्रतीकों और संकेतों का होता है।
मारिया कोरिना माचाडो के दृष्टिकोण से यह कदम अस्वाभाविक नहीं है। वर्षों से तानाशाही, दमन और चुनावी अनियमितताओं से जूझ रहे वेनेज़ुएला के लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए अमेरिकी समर्थन निर्णायक रहा है। ऐसे में नोबेल पदक भेंट करना केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है कि वेनेज़ुएला का विपक्ष अब वाशिंगटन की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है।
लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ आदर्श और यथार्थ टकराते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप एक ओर इसको सम्मान और मित्रता का प्रतीक बताते हैं, तो दूसरी ओर माचाडो को देश का नेतृत्व करने में अक्षम ठहराते हैं। यह विरोधाभास दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समर्थन मूल्यों से अधिक हितों पर आधारित होता है। लोकतंत्र का समर्थन तब तक सार्थक है, जब तक वह बड़े शक्ति संतुलन के अनुकूल बैठता है।
यह पूरा घटनाक्रम एक और बुनियादी सवाल उठाता है कि क्या किसी देश का लोकतांत्रिक भविष्य बाहरी सैन्य हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय दबाव से तय होना चाहिए, या फिर आंतरिक जनसमर्थन और संस्थागत वैधता से? वेनेज़ुएला का हालिया अनुभव बताता है कि सत्ता परिवर्तन भले संभव हो जाए, लेकिन स्थायी स्थिरता और विश्वास केवल जनता की स्वीकृति से ही आता है। यह “अप्रत्यक्ष नोबेल” हमें यही सिखाता है कि प्रतीकों का उपयोग बेहद सावधानी से होना चाहिए।
जहां तक पूरे घटनाक्रम की बात है तो आपको बता दें कि मारिया कोरिना मचाडो ने गुरुवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना नोबेल शांति पुरस्कार पदक भेंट किया और इस दौरान ट्रंप की खुशी देखते बन रही थी। हम आपको यह भी बता दें कि मचाडो ने इससे पहले भी कई मौकों पर कहा था कि वह अपना नोबेल पुरस्कार ट्रंप को दे देंगी। सोशल मीडिया पर जारी एक तस्वीर में मचाडो ‘ओवल ऑफिस’ (राष्ट्रपति का कार्यालय) में ट्रंप के साथ खड़ी नजर आ रही हैं और ट्रंप के हाथ में नोबेल शांति पुरस्कार पदक है। इस तस्वीर के ‘कैप्शन’ में लिखा है, ‘‘मारिया कोरिना मचाडो को प्रदान किया गया 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार पदक।’’ मचाडो ने पदक के साथ संदेश में लिखा, ‘‘राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप के लिए, शक्ति के माध्यम से शांति को बढ़ावा देने, कूटनीति को आगे बढ़ाने और स्वतंत्रता एवं समृद्धि की रक्षा करने में आपके असाधारण नेतृत्व के लिए कृतज्ञता के तौर पर।’’
मचाडो द्वारा हस्ताक्षरित और 15 जनवरी 2026 को जारी संदेश में कहा गया है, ‘‘यह राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा स्वतंत्र वेनेजुएला को सुरक्षित करने के लिए उठाए गए सैद्धांतिक और निर्णायक कदमों के प्रति कृतज्ञता के व्यक्तिगत प्रतीक के रूप में वेनेजुएला के लोगों की ओर से प्रस्तुत किया गया है। अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप के साहस को वेनेजुएला के लोग कभी नहीं भूलेंगे।’’ मचाडो ने इस मुलाकात के बाद ‘संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैंने अमेरिका के राष्ट्रपति को अपना नोबेल शांति पुरस्कार पदक भेंट किया।’’ मचाडो ने कहा कि उन्होंने ऐसा ‘‘हमारी आजादी के प्रति उनकी अनूठी प्रतिबद्धता को सम्मान देने के लिए’’ किया।
ट्रंप ने बाद में सोशल मीडिया पर पुष्टि की कि मचाडो ने यह पदक उन्हें दिया है। उन्होंने कहा कि मचाडो से मिलना उनके लिए सम्मान की बात है। ट्रंप ने अपने पोस्ट में कहा, ‘‘वह एक बेहतरीन महिला हैं जिन्होंने बहुत कुछ झेला है। मारिया ने मेरे किए गए काम के लिए मुझे अपना नोबेल शांति पुरस्कार दिया। यह आपसी सम्मान का कितना अद्भुत भाव है। धन्यवाद मारिया।’’ हम आपको याद दिला दें कि ट्रंप की लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की चाहत रही है। यह सम्मान पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को उनके राष्ट्रपति पद संभालने के कुछ ही महीनों के भीतर 2009 में प्रदान किया गया था। ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में आठ युद्धों को समाप्त कराने का दावा किया है।
उन्होंने कहा है कि जिन आठ युद्धों को उन्होंने समाप्त कराया है, उनमें से प्रत्येक के लिए वह नोबेल शांति पुरस्कार के पात्र हैं। ट्रंप ने यह भी सवाल उठाया कि ओबामा को नोबेल पुरस्कार क्यों दिया गया। उनका कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे वे इसके हकदार बनें।
दूसरी ओर, नोबेल संस्थान ने कहा है कि मचाडो अपना पुरस्कार ट्रंप को नहीं दे सकतीं। उसने कहा, ‘‘नोबेल पुरस्कार की घोषणा हो जाने के बाद इसे रद्द नहीं किया जा सकता, न ही इसे साझा किया जा सकता है तथा न ही किसी और को हस्तांतरित किया जा सकता है। यह निर्णय अंतिम है और हमेशा के लिए मान्य रहता है।’’
वैसे, भले ही नोबेल पुरस्कार ट्रंप को देने का मचाडो का यह कदम पूरी तरह प्रतीकात्मक ही हो, लेकिन यह घटनाक्रम असाधारण है क्योंकि ट्रंप ने लंबे समय से वेनेजुएला में प्रतिरोध का चेहरा रहीं मचाडो को प्रभावी रूप से हाशिये पर कर दिया है। ट्रंप ने वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रीगेज के साथ काम करने की अपनी इच्छा जताई है जो मादुरो की अहम सहयोगी रही थीं। हालांकि मचाडो ने संकेत दिया कि इस बारे में चर्चा के दौरान ट्रंप ने कुछ विशिष्ट बातें कही हैं। वैसे उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या बातचीत हुई। बंद कमरे में हुई बैठक के बाद मचाडो ने ‘व्हाइट हाउस’ के द्वार के पास उनका इंतजार कर रहे दर्जनों उत्साहित समर्थकों का अभिवादन किया और कई लोगों से गले मिलीं। उन्होंने विस्तार से कोई बात बताए बिना कहा, ‘‘हम राष्ट्रपति ट्रंप पर भरोसा कर सकते हैं,’’ जिस पर कुछ लोगों ने ‘‘धन्यवाद, ट्रंप’’ का नारा लगाया।
हम आपको बता दें कि ट्रंप कह चुके हैं कि मचाडो के लिए वेनेजुएला का नेतृत्व करना मुश्किल होगा क्योंकि ‘‘उन्हें देश के भीतर समर्थन या सम्मान प्राप्त नहीं है।’’ ‘व्हाइट हाउस’ की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी मचाडो को ‘‘एक उल्लेखनीय और साहसी आवाज’’ बताया, लेकिन साथ ही कहा कि इस बैठक का मतलब यह नहीं है कि मचाडो को लेकर ट्रंप की राय बदल गई है।
बहरहाल, नोबेल पदक की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्रतीकों का उपयोग सावधानी से होना चाहिए। सम्मान यदि राजनीतिक सौदेबाज़ी का माध्यम बन जाए, तो उसका नैतिक वजन कम हो जाता है। लोकतंत्र के संघर्ष में अंतरराष्ट्रीय समर्थन ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है कि उस संघर्ष की आत्मा यानि जनता की इच्छा, नैतिकता और आत्मनिर्भरता, कमज़ोर न पड़े।