By अभिनय आकाश | Apr 29, 2026
दुबई से खबर आई है जो पूरे ग्लोबल एनर्जी मार्केट को हिला सकती है। यूनाइटेड अरब अमीरात ने ऐलान किया है कि वो ओपक छोड़ रहा है और सिर्फ ओपक नहीं ओपक प्लस भी छोड़ रहा है। यह कोई मामूली खबर नहीं है। यूईई 1967 से यानी 1976 से ओपक का मेंबर है। यानी लगभग 60 साल से वह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा तेल प्रोड्यूसर है। ओपक के अंदर सऊदी अरब इराक के बाद तीसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर माना जाता है यूएई। माना क्या जाता है? है यह सबसे बड़ा प्रोड्यूसर तीसरा। ऐसा देश अगर इस ग्रुप को छोड़ रहा है तो यह एक ऐसी दरार है जो सालों तक भरी नहीं जा सकेगी। यूएई के इस फैसले के बाद इंटरनेशनल ऑयल ट्रेड का क्या होगा? वो एक अलग सवाल है। लेकिन इस फैसले के पीछे कहानी सिर्फ तेल की नहीं है। इसमें ईरान के साथ चल रही जंग है, अमेरिका का दबाव है और साथ ही सऊदी अरब और यूएई के बीच की पुरानी खटास का भी योगदान है। लेकिन इन सब के बीच एक दिलचस्प बात ये है कि दो दिन पहले एनएसए अजीत डोभाल यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान से मिलकर आए थे। इसके साथ काफी चर्चा हो रही है। क्योंकि चर्चा भारत की यूएई के साथ एनर्जी सिक्योरिटी पर हुई थी। तो डेफिनेटली अगर यूएई इतना बड़ा फैसला लेने वाला होगा तो इस पर भी चर्चा हुई होगी और भारत की तरफ से भी कुछ ना कुछ तो जरूर इस पर कहा गया होगा।
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज। हिंदी में कहें तो तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन या समूह। इसकी जो शुरुआत थी वो हुई थी 1960 में बगदाद में जब पांच देशों ने मिलकर इसे बनाया था। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसमें शामिल थे। इन देशों का मकसद एक था तेल की कीमतें कैसे तय हो, कितना तेल निकाला जाए, कितना प्रोड्यूस किया जाए, यह फैसला अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के हाथ से वापस लेकर खुद करना। यूएई 1967 यानी 1976 में इसमें शामिल हुआ। आज ओपेक में 12 देश हैं और दुनिया का करीब 38% तेल यही ग्रुप प्रोड्यूस करता है।
2016 के आसपास ओपेक ने रूस जैसे कुछ बड़े गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ एक एक्सटेंडेड अलायंस बनाया था। इसी को कहा जाता है ओपेक प्लस। यह ग्रुप मिलकर तय करता है कि दुनिया में कितना तेल बेचा जाएगा ताकि कीमतें ना बहुत ज्यादा गिरे और ना बहुत ज्यादा चढ़े। यूएई ने अब इन देशों से नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है।
1. तेल कीमतों पर क्या असर?
ओपेक एक 'कार्टल' है जो सप्लाई घटाकर कीमतें ऊंची रखता है। ट्रम्प लंबे समय से ओपेक की आलोचना करते रहे हैं। उनका आरोप है कि यह संगठन तेल की कीमतों को जानबूझकर बढ़ाकर पूरी दुनिया को लूट रहा है। यूएई के बाहर आने से बाजार में सप्लाई बढ़ेगी, जिससे तेल की कीमतें $5 से $10 प्रति बैरल गिर सकती हैं।
2. भारत को कितना फायदा?
भारत सालाना करीब 140 अरब डॉलर का तेल खरीदता है। तेल की कीमत में $1 की कमी से भारत का आयात बिल करीब 10,000 करोड़ कम हो जाता है। यूएई के कदम से भारत सालाना 50,000 से 1 लाख करोड़ बचा सकता है। अगर यूएई ओपेक के कोटा सिस्टम से बाहर होकर तेल उत्पादन को बढ़ाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। इससे भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता हो सकता है।
3. तेल कंपनियों को क्या लाभ?
जब रिफाइनरियों को कच्चा तेल सस्ता मिलेगा, तो सरकार व तेल कंपनियों के पास कीमतों में कटौती करने की गुंजाइश बढ़ेगी।
4. क्या यूएई डिस्काउंट देगा?
ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई मर्जी का मालिक है। वह भारत जैसे 'रणनीतिक साझेदार' को लुभाने के लिए खास डिस्काउंट या लचीली भुगतान शर्तें दे सकता है।
5. होर्मुज बाधित हो तो क्या ?
होर्मुज मार्ग बाधित हो, तो अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन' अबू धाबी के रेगिस्तान से होते हुए सीधे फुजैरा बंदरगाह तक जाती है। फुजैरा ओमान की खाड़ी के तट पर है। यहां से तेल के टैंकर निकलते ही सीधे अरब सागर में प्रवेश करते हैं। जहाज को होर्मुज पार करने की जरूरत नहीं। फुजैरा से भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों की दूरी बहुत कम है, जिसे तय करने में टैंकरों को औसतन 3-4 दिन ही लगते हैं।
6. भारत का कोटा सुरक्षित है?
ओपेक में रहते हुए यूएई को अपना उत्पादन कम करना पड़ता था। अब यह बंदिश खत्म हो जाएगी।
7. सऊदी अरब और रूस पर हमारी निर्भरता का क्या होगा?
अभी भारत रूस और सऊदी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। यूएई से सप्लाई बढ़ने पर भारत के पास विकल्प बढ़ जाएंगे और वह किसी एक देश के दबाव में नहीं रहेगा।
8. ऐसा पहले क्यों नहीं किया?
पहले तेल बाजार अस्थिर था। ओपेक के साथ रहने से 'सुरक्षा कवच' मिलता था कि कीमतें बहुत ज्यादा नहीं गिरेंगी। अकेले बाहर निकलने पर 'प्राइस वार' का खतरा था। तब यूएई और सऊदी के रिश्ते गहरे थे। सऊदी के नेतृत्व वाले संगठन को छोड़ना दुश्मनी मोल लेने जैसा था।
9. अब क्या बदल गया?
पिछले 2-3 सालों से ओपेक की बैठकों में यूएई और सऊदी में तीखी बहस हो रही थी। यूएई लगातार अपना कोटा बढ़ाने की मांग कर रहा था, जिसे सऊदी अरब खारिज कर देता था। यूएई को ये भी लगा कि जब उस पर हमले हुए या सप्लाई रूट (होर्मुज) में संकट आया, तो ओपेक और खाड़ी के अन्य देशों ने उसका वैसा साथ नहीं दिया जैसा देना चाहिए था। उसे लगा कि संगठन केवल तेल की राजनीति कर रहा है, सुरक्षा पर गंभीरता नहीं।
10.यूएई और सऊदी अरब में मतभेद
ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। जनवरी 2026 की शुरुआत में, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हद्रा मौत प्रांत में यूएई समर्थित सदन ट्रांजिशनल काउंसिल के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। तब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में अलगाववादी समूहों को हथियारों की आपूर्ति करने और अपने देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था।