महिलाओं को लेकर डॉ कलाम का सपना अधूरा

By योगेंद्र योगी | Mar 24, 2026

देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन के नाम मशहूर रहे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि महिलाओं का सशक्तिकरण एक अच्छे परिवार, अच्छे समाज और अंततः एक अच्छे राष्ट्र के विकास की ओर ले जाता है। जब महिला सुखी होती है, तो घर सुखी होता है। जब घर सुखी होता है, तो समाज सुखी होता है, और जब समाज सुखी होता है, तो राज्य सुखी होता है, और जब राज्य सुखी होता है, तो देश में शांति होती है और उसका विकास अधिक गति से होता है। देश महिलाओं की मौजूदा हालात को देखते हुए लगता यही है डॉ कलाम का यह सपना पूरा नहीं हुआ है। इस सपने को पूरा करने के लिए अभी शायद दशकों तक इंतजार करना पड़ेगा।

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देश में महिलाएं अभी तक लिंगभेद का शिकार हैं। महिलाओं के साथ होने वाले शोषण और अपराधों के ग्राफ बताते हैं कि उनकी तरक्की उूंट के मुंह में जीरे से ज्यादा नहीं है। साल 2023 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 2023 में महिलाओं के खिलाफ 13,366 मामले दर्ज हुए, जो मुंबई में 6,025 और बेंगलुरु में 4,870 से कहीं ज्यादा हैं। हालांकि साल 2022 के मुकाबले महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 5.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। देश में 2021 से 2023 के बीच महिलाओं के खिलाफ कुल 13,21,745 अपराध दर्ज हुए। औसतन हर तीन मिनट में एक महिला किसी न किसी अपराध का शिकार हुई। गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने राज्यसभा में पेश आंकड़ों के बताया कि ने घरेलू हिंसा, अपहरण, यौन अपराध और बाल शोषण जैसी घटनाओं में लगातार तीन वर्षों में बढ़ोतरी देखी गई।

उत्तर प्रदेश इन तीन वर्षों में सबसे आगे रहा, जहां 1,88,207 मामले दर्ज हुए। इसके बाद महाराष्ट्र में 1,31,958, राजस्थान 1,31,246, बंगाल 1,05,313 और मध्य प्रदेश में 95,780 मामलों ने स्थिति की गंभीरता को उजागर किया है। महिलाओं के खिलाफ प्रमुख अपराधों में शामिल रहे पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 4,09,929 मामले तो वहीं अपहरण के 2,49,284 मामले सामने आए। गृह राज्य मंत्री बंदी ने बताया था कि अपराधों के ये रुझान सामाजिक और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर करते हैं। विभिन्न राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और बच्चों से जुड़े अपराधों की संख्या चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है।

आर्थिक भागीदारी में भारत में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों (82%) की तुलना में केवल 18% है, जो काफी कम है। कामकाजी महिलाओं में से केवल 40-42% ही अपने पति के बराबर या उससे अधिक कमाती हैं। साक्षरता दर में 2010-2021 के बीच 14.4% की वृद्धि हुई है। हालाँकि, केवल 10% महिलाएं अपने स्वास्थ्य संबंधी निर्णय खुद ले पाती हैं। संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। 2024 में 800 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। फिर भी, वैश्विक स्तर पर यह भागीदारी अभी भी कम है।

लोकनीति-सीएसडीएस के 2019 के 'महिलाएं और राजनीति' सर्वेक्षण के मुताबिक अधिकतर महिलाओं को रैलियों में जाने, उम्मीदवार से मिलने या चुनाव प्रचार करने के लिए परिवार की मंज़ूरी लेनी पड़ती है। 58 प्रतिशत महिलाओं का मानना था कि राजनीतिक परिवार से आने वाली महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश आसान होता है। जबकि 57 प्रतिशत का मानना था कि आर्थिक रूप से मज़बूत परिवारों की महिलाओं को बढ़त मिलती है। अपने सर्वोच्च स्तर पर भी पहुंचकर भी महिलाओं का लोकसभा में हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत ही रहा, जबकि मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है। 1952 में पहली लोकसभा में सिर्फ़ 22 महिलाएं चुनी गई थीं। 1977 में तो यह संख्या घटकर 19 ही रह गई। एक बड़ा बदलाव 21वीं सदी में दिखा। साल 2009 में 59 महिलाएं सांसद बनीं, 2014 में यह संख्या बढ़कर 62 हो गई, और 2019 में यह ऐतिहासिक रूप से बढ़कर 78 तक पहुंच गई। 2024 में यह थोड़ा घटकर 74 रह गई।

राजनीतिक दल अक्सर कम टिकट देने को यह कहकर सही ठहराते हैं कि महिलाओं के जीतने की 'संभावनाएं' कमज़ोर होती हैं। लेकिन सफलता का आंकड़ा इस दावे को सवालों के घेरे में डाल देता है। 1957 में 49 प्रतिशत महिला उम्मीदवार जीतीं, जबकि पुरुषों में जीत का प्रतिशत सिर्फ़ 33 प्रतिशत था। 1962 में महिलाओं की सफलता दर 47 प्रतिशत थी जबकि पुरुषों की सिर्फ़ 25 प्रतिशत। हाल के चुनावों में भी महिलाओं की सफलता दर बराबर या थोड़ा बेहतर ही रही। वर्ष 2019 में 11 प्रतिशत जीतीं, जबकि पुरुषों में यह दर 6 प्रतिशत थी। 2024 में महिलाओं की सफलता दर 9 प्रतिशत और पुरुषों की 6 प्रतिशत रही।

इन आंकड़ों से साफ़ है कि जब महिलाओं को टिकट मिलता है तो वे चुनाव जीत सकती हैं। चाहे महिलाएं अब वोटिंग में लगभग बराबरी पर हों, लेकिन असली राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व अब भी सीमित है। महिला आरक्षण बिल का पारित होना इस अंतर को कम करने का एक संरचनात्मक रास्ता ज़रूर खोलता है। आज भी 23% युवा महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है, जो ग्रामीण और गरीब घरों में अधिक आम है। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पंचायत प्रतिनिधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 46% है, “ हालांकि, उनकी प्रभावी भागीदारी कम बनी हुई है, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान जैसे उत्तरी राज्यों में, जहां अक्सर पुरुष रिश्तेदार निर्णय लेने में हावी रहते हैं।” इस प्रथा को उजागर करने और इसकी निंदा करने के लिए ‘प्रधान पति’ शब्द राजनीतिक शब्दावली में शामिल हो गया है। 

यह दर्शाता है कि किस प्रकार गहरी जड़ें जमा चुके लैंगिक मानदंड प्रगतिशील कानूनों को कमजोर कर सकते हैं – परिवार और समुदाय सत्ता में महिलाओं को देखकर असहज महसूस कर सकते हैं, इसलिए वे पुरुषों को पर्दे के पीछे रखकर पुराने मानदंडों को लागू करते हैं। महिलाएं अब सेना, अंतरिक्ष, खेल और व्यावसायिक नेतृत्व में नए मानदंड स्थापित कर रही हैं। स्व-सहायता समूह, डिजिटल साक्षरता और शिक्षा में सुधार के लिए सरकारी प्रयासों से बदलाव आ रहा है। इस गति को बढ़ाने की जरूरत है।

- योगेन्द्र योगी

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