By डॉ. हरीश अरोड़ा | Sep 09, 2026
नई दिल्ली। ‘अंग्रेजों ने भारत की एकता को विखंडित करने के लिए वर्नाक्युलर भाषाओं का विचार रख जिसने भरतिए भाषाओं को हीन और निचले स्तर की भाषाओं के रूप में स्थापित किया। दुर्भाग्यवश हम भारतीयों ने इसे स्वीकार कर लिया। एकीकृत राष्ट्र की संकल्पना के लिए आवश्यक है कि हम भारतीय भाषाओं को विभाजित परिवारों की भाषा से मुक्ति देते हुए भारतीय भाषा परिवार की संकल्पना को चरितार्थ करें। यह परिवार ही वर्षों से चली या रही औपनिवेशिकता से मुक्ति का आधार है।’
इस अवसर पर प्रो. अरोड़ा ने ‘भारतीय भाषा परिवार की संकल्पना और एकीकृत राष्ट्र’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय भाषाएँ एकीकृत सांस्कृतिक चिंतन-प्रक्रिया की पालना और संवाहक रही हैं। भारतीय भाषाएँ अपने अस्तित्व की पूरी यात्रा में परस्पर सहअस्तित्व में रही हैं और सामंजस्यपूर्ण रूप से साथ-साथ विकसित हुई हैं। उनका साहित्य शब्दावली में एक-दूसरे का पूरक है और विषयवस्तु तथा प्रेरणा के स्रोत में एक-दूसरे को समृद्ध करता है। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ अन्य देशों में भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम माना जाता है वहीं भारत में उसे दैवीय माना गया है। सभी भारतीय भाषाओं को वाक् के रूप में पूज्य माना जाता है और वाग्देवी या सरस्वती के रूप में आराधित किया जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में ‘विविधता में एकता’ की संकल्पना को माना जाता रहा है जबकि भारत में एकता विविधता से कहीं अधिक प्रबल आधार है। उनका मानना था कि विविधता सौंदर्य है, एकता शक्ति है। विविधता का सौंदर्य केवल एकता की शक्ति से ही टिक सकता है। उन्होंने अपने विचार को आरंभ करते हुए बताया कि भारत की गौरवशाली परंपरा से भारतीय समाज को हमेशा से दूर रखा गया है इसी कारण से भारतीय समाज की चेतना पराधीन होती गई। अंग्रेजों ने लोगों को बाँटने, देश को विभाजित करने, समाज को विभाजित करने और एक समुदाय को दूसरे के विरुद्ध भाषाई वैमनस्य के लिए उकसाने का कार्य किया गया। उन्होंने भारत की भाषाओं को भारोपीय, द्रविड, चीनी-तिब्बती और ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवारों में विभाजित कर दिया। इसीलिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस औपनिवेशिकता से मुक्ति के लिए भारतबोध के विचार को स्वीकार किया।
कार्यक्रम के आरम्भ में स्वागत वक्तव्य देते हुए डॉ. विनय कुमार ने कहा यादव ने कहा कि आज का विषय अत्यंत ही प्रासंगिक और नवीन है। इस विचार से निश्चित रूप से भारतीय भाषाओं में एकता के साथ भारत भी एकीकृत राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। कार्यक्रम में कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय कॉलेज हिन्दी प्राध्यापक संघ के संस्थापक डॉ. एस. मंजुनाथ ने संघ की कार्य प्रणाली और विभिन्न योजनाओं से परिचित कराया। इस अवसर पर कॉलेज की प्राचार्य डॉ. सुनीला कुमारी सहित देश भर से अनेक शिक्षाविद, शोधार्थी और विद्यार्थी कार्यक्रम में जुड़े।