द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत से घर में आती है सुख-समृद्धि

By प्रज्ञा पाण्डेय | Feb 12, 2020

पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। फाल्गुन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, तो आइए हम आपको द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा, व्रत तथा महत्व के बारे में बताते हैं। 

संकट हरने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस साल द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 12 फरवरी को पड़ रही है। इस गणेश भगवान के 32 स्वरूपों में से छठें रूप की पूजा होती है। इसमें गणेश भगवान के चार सिर तथा चार भुजाएं होती है। गणेश जी इस रूप की आराधना से अच्छा स्वास्थ्य तथा सुख-समृद्धि मिलती है। साथ ही भगवान गणेश भक्त के सभी दुखों का अंत करते हैं। 

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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त

संकष्टी चतुर्थी प्रारम्भ हो रही है-12 फरवरी, बुधवार

संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथा 

संकष्टी चतुर्थी से सम्बन्धित पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में किसी शहर में एक साहूकार और उसकी पत्नी रहते थे। साहूकार दम्पत्ति को ईशवर में आस्था नहीं तथा वह निःसंतान थे। एक दिन साहूकार की पत्नी अपने पड़ोसी के घर गयी। उस समय पड़ोसी की पत्नी संकट चौथ की कथा कह रही थी। तब साहूकार की पत्नी ने उसे संकष्टी चतुर्थी के बारे में बताया। उसने कहा संकष्टी चौथ के व्रत से ईश्वर सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। तब साहूकार की पत्नी ने भी संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया तथा सवा सेर तिलकुट चढ़ाया। इसके बाद साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और उसे पुत्र पैदा हुआ। 

साहूकार का बेटा बड़ा हुआ तो उसने ईश्वर से कहा कि मेरे बेटे का विवाह तय हो जाए तो व्रत रखेगी और प्रसाद चढ़ाएगी। ईश्वर की कृपा से साहूकार के बेटे का विवाह तय हो गया लेकिन साहूकार की मां व्रत पूरा नहीं कर सकी। इससे भगवान नाराज हुए और उन्होंने शादी के समय दूल्हे को एक पीपल के पेड़ से बांध दिया। उसके बाद उस पीपल के पेड़ के पास वह लड़की गुजरी जिसकी शादी नहीं हो पायी थी। तब पीपल के पेड़ से आवाज ए अर्धब्याही ! यह बात लड़की ने अपनी मां से कहा। मां पीपल के पेड़ के पास आया और पूछा तो लड़के ने सारी कहानी बतायी। तब लड़की की मां साहूकारनी के पास गयी और सब बात बतायी। तब साहूकारनी ने भगवान से क्षमा मांगी और बेटा मिल जाने के बाद व्रत करने और प्रसाद चढ़ाने के लिए ईश्वर प्रार्थना की। इसके कुछ दिनों बाद साहूकारनी का बेटा उसे मिल गया और उसकी शादी हो गयी तभी से सभी गांव वाले संकष्टी चतुर्थी की व्रत करने लगे। 

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कैसे करें पूजा

द्विजप्रिय संकष्टी तिथि बहुत खास होती है। इसलिए इस दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करें। इस दिन सबसे पहले प्रातः उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहने और घर की साफ-सफाई करें। उसके बाद उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके गणेश भगवान को जल अर्पित करें। एक बात ध्यान रखें कि अर्घ्य देने से पहले जल में तिल अवश्य मिलाएं। दिन भर व्रत रखें तथा शाम को विधिवत गणेश जी की पूजा करें। साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि भगवान गणेश को दूब तथा तुलसी का पत्ता अर्पित न करें। ऐसा करने से भगवान गणेश नाराज होते हैं। इसके अलावा गणेश भगवान को शमी के पत्ते तथा बेलपत्र अर्पित करें। गणेश जी लड्डू पसंद हैं इसलिए उन्हें लड्डू का भोग लगाएं और आरती उतारें। रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें और लड्डू या तिल खाकर व्रत तोड़े। साथ ही द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन तिल का दान करना विशेष फलदायी होता है। 

प्रज्ञा पाण्डेय

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