क्या नितिन गडकरी की E20 नीति की वजह से खराब हो रही हैं गाड़ियां?

By नीरज कुमार दुबे | Jul 04, 2026

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी पर इन दिनों चौतरफा हमले हो रहे हैं। कभी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में ई20 पेट्रोल को वाहनों की खराबी का कारण बताया जा रहा है, तो कभी सड़कों पर उतरने की चेतावनी देकर केंद्र सरकार की एथनॉल नीति के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, जो लंबे समय से एथनॉल मिश्रित ईंधन को भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बताते रहे हैं, अब उसी नीति को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में हैं।

देखा जाये तो मनीष कश्यप अकेले नहीं हैं। देशभर में हजारों वाहन मालिक माइलेज घटने, इंजन परफॉर्मेंस कम होने और वाहनों में तकनीकी समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं। कई वीडियो में गुलाबी रंग का पेट्रोल, टंकी में पानी जैसी परत और अन्य अशुद्धियां दिखाकर दावा किया जा रहा है कि पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा तय सीमा से अधिक है। हालांकि सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय इन दावों को खारिज कर रहे हैं।

इस विवाद ने अब राजनीतिक और सामाजिक रूप भी ले लिया है। राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला ने दिल्ली के जंतर मंतर पर ई20 नीति के खिलाफ प्रदर्शन का ऐलान किया है। "टीम भारत अगेंस्ट द एथनॉल स्कैम" के बैनर तले प्रस्तावित इस प्रदर्शन को एथनॉल नीति के खिलाफ पहला बड़ा सार्वजनिक आंदोलन बताया जा रहा है। पूनावाला का कहना है कि लोग एथनॉल नीति के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि इसकी जल्दबाजी में की गई क्रियान्वयन प्रक्रिया और उपभोक्ताओं को विकल्प न दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली तो कुछ लोग नितिन गडकरी के आवास के बाहर धरने पर बैठ सकते हैं।

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देखा जाये तो विवाद केवल वाहन खराबी तक सीमित नहीं है। एक उद्योगपति ने भी सरकार की ई20 नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई का हवाला देते हुए कहा कि सरकार जनता के सामने इस योजना को पूरी तरह सफल बता रही है, लेकिन अदालत में इसे अभी भी "चल रहा प्रयोग" बताया गया। हालांकि बाद में अटॉर्नी जनरल के कार्यालय ने इस दावे को गलत बताया। वहीं उक्त उद्योगपति का कहना है कि असली चिंता उन उद्योगों और निवेशकों की है जिन्होंने सरकार की नीति पर भरोसा करके एथनॉल संयंत्रों में अरबों रुपये का निवेश किया। यदि एथनॉल की खरीद और मांग ही निश्चित नहीं है, तो निवेशकों को किस भरोसे निवेश के लिए प्रेरित किया गया।

हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड और कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश से जुड़ा था, जिसमें एथनॉल आवंटन प्रक्रिया को दोबारा खोलने की बात कही गई थी। इस सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठा कि सरकार द्वारा एथनॉल खरीद की बाध्यता वास्तव में कितनी मजबूत है। आलोचकों का कहना है कि यदि खरीद केवल "सर्वश्रेष्ठ प्रयास" के आधार पर होगी तो उद्योगों की वित्तीय स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने एथनॉल नीति के आर्थिक और कृषि प्रभावों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ई20 कार्यक्रम भारत को विदेशी मक्के और उससे बने उत्पादों पर अधिक निर्भर बना सकता है। सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी आरोप लगाया है कि यह नीति अब किसान केंद्रित कम और आयात आधारित ढांचे जैसी अधिक दिखाई देने लगी है। उन्होंने सरकार से ई20 की अनिवार्यता पर पुनर्विचार कर ई5 या ई10 जैसे विकल्प फिर से उपलब्ध कराने की मांग की है।

वहीं देशी और विदेशी वाहन निर्माता कंपनियों ने ई20 पेट्रोल को लेकर मिश्रित लेकिन संतुलित रुख अपनाया है। मारुति सुजुकी, हुंडई, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, टोयोटा, होंडा और किआ जैसी कंपनियों ने कहा है कि अप्रैल 2023 के बाद बने अधिकांश नए वाहन ई20 अनुकूल बनाए जा चुके हैं और उनमें इस ईंधन के इस्तेमाल से कोई बड़ा सुरक्षा खतरा नहीं है। वाहन उद्योग संगठन सियाम ने भी माना है कि ई20 से माइलेज में लगभग 2 से 4 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, लेकिन इससे स्थायी इंजन क्षति का कोई प्रमाण नहीं मिला है। वहीं महिंद्रा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि ई20 सुरक्षित तो है, लेकिन इससे परफॉर्मेंस और माइलेज पर असर पड़ सकता है। टोयोटा सहित कई कंपनियों ने अपने नए पेट्रोल मॉडलों को ई20 अनुकूल घोषित किया है, जबकि कुछ विशेषज्ञों और कंपनियों ने पुराने वाहनों में सावधानी बरतने की सलाह दी है।

दूसरी ओर केंद्र सरकार लगातार इस योजना का बचाव कर रही है। सरकार का दावा है कि भारत ने निर्धारित समय से पहले दिसंबर 2025 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार इस कार्यक्रम से देश को 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत हुई, किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान हुआ और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भारी कमी आई। सरकार का कहना है कि इससे 310 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल का विकल्प तैयार हुआ। सरकार का यह भी कहना है कि वाहन कंपनियों और सियाम के साथ व्यापक चर्चा के बाद ही ई20 लागू किया गया और कई निर्माता वर्ष 2009 से ही ई20 अनुकूल इंजन विकसित कर रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी माइलेज घटने के दावों को मामूली बताया है। उनका कहना है कि एथनॉल मिश्रित ईंधन से इंजन की नॉकिंग कम होती है और वाहन की गति क्षमता बेहतर होती है। वहीं नितिन गडकरी ने एथनॉल विरोधी प्रचार को "पेड कैंपेन" करार दिया है। उनका आरोप है कि पेट्रोलियम लॉबी भारत की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होने से परेशान है और इसलिए दुष्प्रचार कर रही है। गडकरी ने यह चुनौती भी दी कि दुनिया में कोई एक उदाहरण दिखाया जाए जहां ई20 पेट्रोल से वाहन स्थायी रूप से खराब हुए हों।

बहरहाल, फिलहाल एथनॉल मिश्रित पेट्रोल पर विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। एक ओर सरकार इसे किसानों, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी कदम बता रही है, तो दूसरी ओर उपभोक्ता, वाहन मालिक और कुछ उद्योग विशेषज्ञ इसके प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं। आने वाले समय में यह बहस केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सड़कों, अदालतों और राजनीतिक मंचों तक और तेज होती दिखाई दे सकती है।

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