भारत ने बिछाई बड़ी कूटनीतिक बिसात तो सौदेबाजी की मेज पर भागता हुआ आया अमेरिका

By नीरज कुमार दुबे | Feb 02, 2026

विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अमेरिका यात्रा ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा और व्यापारिक खींचतान एक दूसरे में उलझ चुकी हैं। जयशंकर की यह यात्रा आपूर्ति शृंखला, दुर्लभ खनिज, रक्षा सहयोग और व्यापार समझौते पर नए संतुलन की तलाश है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की पहल पर आयोजित महत्वपूर्ण खनिज मंत्री स्तरीय बैठक में जयशंकर की भागीदारी इस बात का संकेत है कि आने वाले दशक की शक्ति राजनीति खनिज, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा के इर्द गिर्द घूमेगी।

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जयशंकर की यह यात्रा सात महीने बाद उनकी पहली द्विपक्षीय अमेरिका यात्रा है। पिछली यात्रा उस समय हुई थी जब अमेरिका ने भारत पर कड़े शुल्क नहीं लगाए थे। इन महीनों में बहुत कुछ बदल गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद शुल्क को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क और रूस से तेल खरीद पर दंडात्मक शुल्क ने संबंधों में कड़वाहट घोली। अब संकेत मिल रहे हैं कि वाशिंगटन नरमी दिखा सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि रूस से तेल खरीद घटने पर अतिरिक्त शुल्क हटाने का रास्ता है। साथ ही वेनेजुएला से तेल खरीद फिर शुरू करने की अनुमति का संदेश भी दिया गया है। यह सब केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर सौदेबाजी के पत्ते हैं।

दिलचस्प यह है कि इसी बीच भारत ने 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता पूरा कर लिया। इसने अमेरिका को यह संदेश दिया कि नई दिल्ली विकल्प तलाशने में सक्षम है। अटलांटिक परिषद से जुड़े विशेषज्ञ मार्क लिंस्काट का आकलन है कि भारत यूरोप समझौता अमेरिका भारत व्यापार वार्ता को तेज कर सकता है। साफ है कि वाशिंगटन भारत को खोना नहीं चाहता। वैसे भी भारत और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व की हालिया बातचीत और सार्वजनिक बयानों से यह आभास भी मजबूत हो रहा है कि दोनों देश लंबित व्यापार समझौते को अब अधिक देर तक टालना नहीं चाहते। पिछले महीनों में फोन पर हुई वार्ताओं, मंत्रिस्तरीय संपर्क और समान हितों पर दिए गए जोर से यह संकेत मिलते हैं कि माहौल को जानबूझकर सकारात्मक बनाया जा रहा है। ऐसे में जयशंकर की अमेरिका यात्रा को केवल खनिज या सामरिक चर्चा तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे संभावित व्यापार समझौते की राह साफ करने वाली पहल के रूप में भी समझा जा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में यह धारणा बन रही है कि यदि इस यात्रा में मुख्य अड़चनों पर सहमति का रास्ता निकलता है तो यह आगे की औपचारिक वार्ता के लिए हरी झंडी जैसा होगा, जिसके बाद मोदी सरकार अंतिम राजनीतिक स्वीकृति देकर समझौते पर मुहर लगा सकती है। यानी यह दौरा भविष्य के बड़े आर्थिक फैसले की भूमिका भी लिख सकता है।

हम आपको यह भी बता दें कि अपनी यात्रा से पहले जयशंकर ने भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की। उनके साथ अमेरिकी संसद के सदस्य जिमी पैट्रोनिस, माइक रोजर्स और एडम स्मिथ भी मौजूद रहे। बातचीत में व्यापार, रक्षा सहयोग, महत्वपूर्ण खनिज, हिंद प्रशांत क्षेत्र और यूक्रेन संघर्ष जैसे विषय शामिल रहे। यह केवल शिष्टाचार भेंट नहीं बल्कि जमीन तैयार करने वाली बातचीत थी। गोर ने भारत को अमेरिका का अहम भागीदार बताया और साझा सामरिक हितों पर जोर दिया। साथ ही अमेरिकी संसदीय दल की जनवरी में नई दिल्ली यात्रा भी रक्षा तकनीक सहयोग, सह उत्पादन और सह विकास पर केंद्रित रही। संदेश साफ है कि रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग संबंधों की रीढ़ बन सकता है।

अब इस पूरे घटनाक्रम को भारत के केंद्रीय बजट की घोषणाओं से जोड़कर देखिये। मोदी सरकार ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे खनिज संपन्न राज्यों में दुर्लभ खनिज गलियारे बनाने का प्रस्ताव रखा है। खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और निर्माण को बढ़ावा देने की योजना सीधे उसी दिशा में जाती है जिस पर अमेरिका और उसके सहयोगी काम कर रहे हैं। सेमीकंडक्टर अभियान के लिए ये खनिज अनिवार्य हैं। बैटरी भंडारण के लिए लिथियम आयन कोश निर्माण, सौर कांच के लिए सोडियम एंटिमोनेट, परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आयातित सामान पर मूल शुल्क छूट, मिश्रित सीएनजी पर उत्पाद शुल्क गणना से जैव गैस को बाहर रखना और बैटरी भंडारण परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अंतर सहायता को पांच गुना बढ़ाना दिखाता है कि भारत ऊर्जा और प्रौद्योगिकी की नई दौड़ के लिए तैयारी कर रहा है। 2030 तक पांच सौ गीगावाट गैर जीवाश्म ऊर्जा और 2047 तक सौ गीगावाट परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य भारत की नई सामरिक दिशा है। निजी भागीदारी खोलने वाला परमाणु ऊर्जा कानून भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

सच यह है कि दुनिया नए शीत युद्ध जैसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां गोलियों से ज्यादा खनिज, चिप और ऊर्जा की आपूर्ति शृंखला ताकत तय करेगी। जयशंकर की यात्रा को केवल कूटनीतिक दौरा समझना भूल होगी। यह भारत की बहुस्तरीय चाल है। एक ओर अमेरिका से तनाव घटाना, दूसरी ओर अपने हितों पर अडिग रहना, और साथ साथ यूरोप, रूस तथा अन्य साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना आसान नहीं। पर भारत अब रक्षात्मक नहीं, सौदेबाज की मुद्रा में दिख रहा है।

अमेरिका को भी समझना होगा कि शुल्क की लाठी से साझेदारी नहीं चलती। यदि वह भारत को सचमुच चीन का विकल्प बनाना चाहता है तो भरोसा, प्रौद्योगिकी साझेदारी और बाजार पहुंच देनी होगी। भारत के लिए भी संदेश साफ है कि आत्मनिर्भर खनिज और सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र बनाए बिना कोई सामरिक स्वायत्तता संभव नहीं।

बहरहाल, जयशंकर की कूटनीति की खासियत यही है कि वे मुस्कान के साथ कठोर संदेश देते हैं। अब देखना यह है कि वाशिंगटन इस संकेत को कितना समझता है। अभी जो तस्वीर उभर रही है वह बताती है कि नई दिल्ली ने खेल समझ लिया है और चाल चल दी है।

-नीरज कुमार दुबे

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