By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 24, 2026
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देशभर में कथित साइबर धोखाधड़ी और ‘डिजिटल अरेस्ट’ से जुड़े धनशोधन मामले की जांच के तहत दो लोगों को गिरफ्तार किया है। सूत्रों ने सोमवार को यह जानकारी दी। इस मामले में करीब 30,000 करोड़ रुपये के लेनदेन का संदेह है।
एजेंसी दोनों को सोमवार को पणजी की एक विशेष अदालत में पेश कर उनकी हिरासत का अनुरोध कर सकती है ताकि वह उनसे पूछताछ कर सके। सूत्रों के अनुसार, ईडी ने यह जांच उस घटना के बाद शुरू की थी जिसमें साइबर जालसाजों ने गोवा की एक महिला को कथित तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ कर मई से जून 2025 के बीच 2.60 करोड़ रुपये कुछ कथित ‘‘सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट’’ में अंतरित करने के लिए उसे मजबूर किया। ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी का एक तरीका है, जिसमें जालसाज खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल के जरिए व्यक्ति को डराते-धमकाते हैं और उससे धन ऐंठते हैं।
जांच के दौरान एजेंसी को पता चला कि पीड़िता से ठगी गई रकम 400 बैंक खातों में जमा कराई गई, फिर उसे नकद निकाला गया और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से लाइसेंस प्राप्त मुद्रा परिवर्तकों के जरिए विदेशी मुद्रा में बदला गया। एजेंसी के अधिकारियों ने बताया कि मामले में धन के लेन-देन की कड़ियां जिंसों के कारोबार, व्यापार, यात्रा और विदेशी मुद्रा से जुड़ी आपस में संबद्ध कंपनियों के एक नेटवर्क तक पहुंचीं जिनके जरिए 27,850 करोड़ रुपये से अधिक के बैंक लेन-देन किए गए। इस नेटवर्क के माध्यम से 2,904 करोड़ रुपये जमा किए गए, जिसमें देश के विभिन्न स्थानों पर 61,448 बार नोट मशीनों के जरिए जमा किए गए 584.70 करोड़ रुपये भी शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि इन संस्थाओं के बैंक खातों की पहचान 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस तथा अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा दर्ज साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी 300 शिकायतों और 163 प्राथमिकी में हुई है। इन मामलों में पीड़ितों से की गई कथित धोखाधड़ी की कुल रकम 417.49 करोड़ रुपये आंकी गई है। सूत्रों ने बताया कि ईडी ने इस मामले में गोवा और मुंबई में दो चरण में तलाश अभियान चलाया।
पहला अभियान जुलाई में और दूसरा 21 अगस्त को चलाया गया। इन कार्रवाइयों के दौरान करीब 3.25 करोड़ रुपये जब्त किए गए। सूत्रों के अनुसार, धन के लेनदेन की जांच में पता चला कि इस नेटवर्क से जुड़ी मुखौटा या फर्जी कंपनियों में चालकों और छोटे कर्मचारियों को निदेशक बनाया गया था, जिनमें से कई एक कमरे के मकानों में रहते थे।
उन्होंने बताया कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में आम तौर पर इस तरह का तौर-तरीका अपनाया जाता है।