Ek Din Movie Review | जापान की हसीन वादियों में खोई कहानी, जुनैद खान और साई पल्लवी की केमिस्ट्री रही बेअसर

By रेनू तिवारी | May 06, 2026

किसी भी प्रेम कहानी की सफलता उसके किरदारों के बीच की 'स्पार्क' और केमिस्ट्री पर टिकी होती है। निर्देशक सुनील पांडे की फिल्म 'एक दिन' जापान की खूबसूरती और बर्फीले नज़ारों को कैमरे में कैद करने में तो सफल रही है, लेकिन जज़्बातों के मामले में यह फिल्म दर्शकों के दिल तक पहुँचने में नाकाम साबित होती है। जुनैद खान और साई पल्लवी जैसे कलाकारों के होने के बावजूद, फिल्म एक सुंदर लेकिन बेजान 'ट्रैवल ब्रोशर' बनकर रह जाती है।

फिल्म की कहानी दिनेश (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो नोएडा की एक आईटी कंपनी में काम करने वाला एक अंतर्मुखी (Introvert) युवक है। वह अपनी सहकर्मी मीरा (साई पल्लवी) से खामोश मोहब्बत करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब ऑफिस ट्रिप के दौरान जापान में मीरा को TGA (Transient Global Amnesia) नामक बीमारी का पता चलता है।

इस स्थिति में मीरा की याददाश्त एक दिन के बाद मिट जाती है। दिनेश जापानी देवताओं से मन्नत मांगता है कि मीरा को उससे प्यार हो जाए—भले ही सिर्फ एक दिन के लिए। उसकी मुराद पूरी तो होती है, लेकिन एक दर्दनाक शर्त के साथ कि अगली सुबह मीरा को कुछ भी याद नहीं रहेगा।

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एक दिन: परफॉर्मेंस

परफॉर्मेंस के मामले में, साई पल्लवी अपने हिंदी डेब्यू में पूरी ईमानदारी लाती हैं। शांत पलों में उनकी मासूमियत और जज़्बाती गहराई फिल्म के सबसे मज़बूत पहलुओं में से एक बनकर उभरती है। वह मीरा के किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें एक आज़ाद महिला के बजाय एक बेबस किरदार के तौर पर ज़्यादा दिखाती है।

जुनेद खान अपनी पिछली परफॉर्मेंस के मुकाबले ज़्यादा संयमित नज़र आते हैं। दिनेश के तौर पर उनकी सादगी साफ़ झलकती है, लेकिन एक एक्टर के तौर पर, उनमें अभी भी वह स्क्रीन प्रेज़ेंस नहीं है जो दर्शकों को पूरी तरह से बांधे रख सके। संयम असरदार हो सकता है, लेकिन यहाँ यह फिल्म की रफ़्तार धीमी कर देता है। कुणाल कपूर एक छोटे लेकिन असरदार कैमियो में नज़र आते हैं, हालाँकि उनके पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है।

फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी जुनेद और साई पल्लवी के बीच केमिस्ट्री की कमी है। किसी भी मोड़ पर दर्शकों को यह महसूस नहीं होता कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं। उनका जुड़ाव इतना फीका लगता है कि कभी-कभी वे रोमांटिक पार्टनर के बजाय दूर के जान-पहचान वाले ज़्यादा लगते हैं। उस चिंगारी के बिना, दर्शकों के लिए कहानी से जुड़ना मुश्किल हो जाता है।

एक दिन: डायरेक्शन और तकनीकी पहलू

सुनील पांडे का डायरेक्शन तकनीकी रूप से तो ठीक है, लेकिन जज़्बाती तौर पर कमज़ोर है। वह जापान की खूबसूरती को स्क्रीन पर दिखाने में कामयाब रहते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। होक्काइडो की बर्फ़ से ढकी सड़कें, सर्दियों की हल्की रोशनी और पोस्टकार्ड जैसे फ्रेम फिल्म को एक सिनेमाई अनुभव के बजाय एक ट्रैवल ब्रोशर जैसा ज़्यादा बनाते हैं।

संगीत की बात करें तो, अरिजीत सिंह का एक गाना है जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन फिल्म खत्म होते ही आसानी से भुला दिया जाता है। एडिटिंग भी खास असरदार नहीं है, और फिल्म की रफ़्तार कभी-कभी इतनी धीमी हो जाती है कि यह दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है। फिल्म की रिलीज़ का समय भी इसके खिलाफ जाता है; अप्रैल की गर्मी के बजाय यह सर्दियों या वैलेंटाइन डे के आस-पास रिलीज़ होती तो ज़्यादा सही रहता।

एक दिन: डायरेक्शन का नज़रिया

यह फिल्म थाई फिल्म 'वन डे' का ऑफिशियल रीमेक है, लेकिन यह कहानी को भारतीय sensibilities के हिसाब से पूरी तरह से ढाल नहीं पाती, जिससे यह ओरिजिनल न लगे। डायरेक्टर दिनेश को एक 'प्यारा nerd' बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह आखिर में अपनी ही दुनिया में खोया हुआ एक किरदार बनकर रह जाता है। फिल्म निस्वार्थ प्रेम का विचार पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन उस संदेश को मज़बूती देने के लिए ज़रूरी गहराई इसमें नदारद है।

एक दिन: फैसला

'एक दिन' एक ऐसी फिल्म है जिसके इरादे तो अच्छे हैं, लेकिन नतीजे उम्मीद से कमज़ोर हैं। यह बॉलीवुड के पुराने 'साफ़-सुथरे रोमांस' वाले अंदाज़ को वापस लाने की कोशिश करती है, जो आज के ज़्यादा गंभीर कंटेंट के बीच ताज़गी भरा हो सकता था, लेकिन इसमें जान की कमी है। जापान के खूबसूरत नज़ारों, साई पल्लवी के आकर्षण और ज़बरदस्त सिनेमैटोग्राफ़ी के बावजूद, यह फ़िल्म अपनी धीमी रफ़्तार और मुख्य किरदारों के बीच केमिस्ट्री की कमी की वजह से कमज़ोर पड़ जाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो बिना कोई गहरी छाप छोड़े आती है और चली जाती है—ठीक वैसे ही, जैसे फ़िल्म की हीरोइन, जो अगले ही दिन सब कुछ भूल जाती है।

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