मुंबई पर्यटन पर जा रहे हैं तो अपने प्लान में अवश्य शामिल करें एलिफेंटा गुफाएँ

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Feb 28, 2020

वह दिन मेरे लिए यादगार बन गया जब हम गेट वे ऑफ इंडिया से बोट में सवार होकर अरब सागर में ग्यारह किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ों को काट कर बनाई गई एलिफेंटा की गुफाओं को देखने जा रहे थे। सागर की लहरों से खेलती बोट की यात्रा का आनन्द ही कुछ ओर था। कभी हम हिलोरे लेते सागर के पानी में हाथ डाल कर मज़ा लेते थे कभी बोट की छत पर चढ़ने का। करीब चालीस मिनट की इस रोमांचक समुद्री यात्रा पूरी कर हम इस द्वीप पर उतरे। गुफाओं तक एक छोटा सा रास्ता पार कर करीब 120 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। सीढ़ियों तक आने के लिए एक छोटी ट्रेन भी चलती है। सीढ़ियों के दोनों और खाने-पीने, सजावटी समान, फ़ोटो एलबम, खिलौनों आदि की दुकानें सजी थी। प्रकृति के बीच पूरा माहौल पर्यटकों की गहमागहमी और चहलपहल से आबाद था। गुफाओं से पूर्व भारतीय पुरात्तव विभाग का सूचनापट्ट लगा था जिस से ज्ञात होता है कि अब यह ऐतिहासिक स्थल इस विभाग के अधीन संरक्षित है।

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पहली गुफा के एक बड़े मुख्य हाल में शिव की विभिन्न मुद्राओं में 9 मूर्तियां अलग-अलग कक्षों में चट्टानों को काट ही बनाई गई हैं। इस हाल के 26 स्तम्भों पर भगवान शिव के विविध स्वरूपों का शिल्पांकन देखते ही बनता है। यहीं पर भगवान शिव के विविध रूपों में महायोगी, नटेश्वर, भैरव, पार्वती-परिणय, अर्धनारीश्वर, पार्वतीमान, कैलाशधारी रावण, महेशमूर्ति शिव तथा त्रिमूर्ति यहां की प्रमुख मूर्तियां हैं। गुफा के केंद्र में बनी करीब 17 फ़ीट ऊंची त्रिमूर्ति तो वास्तव में भगवान शिव के ही 3 विविध रूपों का प्रतीक है जिसे सदाशिव भी कहा जाता है। एक मूर्ति में शिव को धरती पर गंगा लाते हुए दर्शाया गया है। भैरव अवतार में शिव को चंद्र एवं नागदेवता शीश पर गले में एक हार पहने हुए आक्रामक मुद्रा में कूंच करते हुए दिखाया गया है। दांये हाथ में तलवार एवं बांये हाथ में अन्धक राक्षस की देह दिखाई देती है। एक प्रतिमा में शिव एवं पार्वती को कैलाश पर्वत पर बैठे चौपड़ खेलते दिखाया गया है। एक अन्य मूर्ति में कैलाश पर्वत पर विराजित शिव पार्वती अन्य देवताओं से घिरे हैं। उनके चरणों के पास में संत भृंगी का अस्थि कंकाल है एवं दांये कोने में गणेश जी हैं। लहास नृत्य करते नटराज की मनोरम प्रतिमा देखते ही बनती है। इस प्रकार यहां भगवान शंकर के कई लीलारूपों की मूर्तिकला, एलोरा और अजंता की मूर्तिकला के समान ही है। गुफाओं में अनेक हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिर भी दर्शनीय हैं। कभी यहां हिंदुओं का पूजा स्थल था अब यह पर्यटक स्थल बन गया है। केवल महाशिवरात्रि पर सरकार में पूजा अर्चना की अनुमति प्रदान की है।

यहां कुल सात गुफाएं हैं जिनमें पांच बड़ी हिन्दू गुफाएं एक हिस्से में हैं और दो छोटी बुद्ध गुफाएं दूसरे हिस्से में बनी हैं। पहली गुफा को ग्रेट गुफा के नाम से, गुफा 2 से 5 को कैनन हिल के नाम से, गुफा 6 एवं 7 को स्तूप हिल के नाम से जाना जाता है। गुफा 6 को सीताबाई गुफा भी कहा जाता है। गुफा सात के आगे बने सूखे तालाब को बौद्ध तालाब कहा जाता है। ये गुफाएँ करीब 60 हज़ार वर्ग फ़ीट क्षेत्रफल में बनाई गई हैं जिनका निर्माण काल 5वीं से 11वीं शदी का माना जाता हैं। इन गुफाओं के महत्व का अंदाजा इसी से आंका जा सकता हैं कि इन्हें 1987 ई. में यूनेस्को की विश्व विरासत धरोहर घोषित किया गया।

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जैसा कि हमें बताया गया इस स्थान का प्राचीन नाम धारपुरी था। पुर्तगालियों ने गुफाओं पर बने हाथियों की आकृतियों की वजह से इसका नामकरण एलिफेंटा कर दिया। उन्होंने इनका महत्व नहीं समझा एवं इनका उपयोग पशुओं के बांधने में किया। कुछ मूर्तियाँ उनके समय टूट गई। जो भी बची हैं दर्शनीय हैं। भारत सरकार ने त्रिमूर्ति पर एक डाक टिकट भी जारी किया है। करीब 4 धंटे का समय इस महान कला धरोहर के बीच गुजार कर हम वापस लौटे तो बोट के लिए लंबी लाइन में इंतजार का भी अपना अलग मजा रहा। इन्हें देखने के लिए अपोलो बन्दर से सुबह 9 बजे से दोपहर तक ही बोट में जा सकते हैं, इसके बाद लौटने के लिए ही बोट उपलब्ध रहती है। मुम्बई वालों के लिए वीकएड पर समय व्यतीत करने का अच्छा पिकनिक स्पॉट है। आप अगर मुंबई पर्यटन का प्लान बना रहे हैं तो एलिफेंटा को अवश्य ही अपने प्लान में शामिल करें।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार

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