तंत्र में लोक को प्रतिष्ठित कीजिए

By उमेश चतुर्वेदी | Feb 13, 2026

हमने जिस प्रशासनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है, उसमें तंत्र की जवाबदेही लोक के प्रति है। हम चाहे जितना भी गर्व करें, लेकिन तंत्र की जवाबदेही के केंद्र में लोक की बजाय अभिजात्य है। यही वजह है कि संकट के क्षणों में हमारे तंत्र को लोक के प्रति जैसी त्वरित भूमिका निभानी चाहिए, वह निभाता नहीं दिखता। लेकिन यदि इसी तंत्र को पता चले कि लोक के बीच कोई अभिजात्य पहचान, महत्वपूर्ण नेता, उद्योगपति, सेलिब्रिटी आदि भी संकटग्रस्त है, हमारे तंत्र की प्रतिक्रिया त्वरित और गहन होती है। तंत्र की सोच की यह खोट ही है कि संकटग्रस्त आम आदमी के लिए त्वरित प्रतिक्रियाएं अपवादस्वरूप ही दिखती हैं। ऑर्ट ऑफ द स्टेट सिटी के रूप में विकसित हो रहे नोएडा में इंजीनियर युवराज के लापरवाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मेल से खोदे गए गहरे गड्ढे में डूबने से हुई मौत हो या फिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ठीक बीच में जलनिगम के गड्ढे में गिरने से हुई कमल की मौत, भ्रष्टाचार और लापरवाही ही नहीं, तंत्र की सोच को भी जाहिर करती है। 

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कमल के गड्ढे में गिरने की जानकारी एक राहगीर ने पास ही स्थित एक कैफे के सुरक्षा गार्ड को दी थी, सुरक्षा गार्ड ने जलबोर्ड कर्मी योगेश को जानकारी दी, योगेश ने ठेकेदार राजेश प्रजापति को फोन कर इसकी जानकारी दी। राजेश घटनास्थल पर आया, लेकिन पुलिस को किसी ने जानकारी नहीं दी। कैफै का गार्ड हो या फिर जलबोर्ड का कर्मी या फिर ठेकेदार, उन्होंने इस घटना को सामान्य तौर पर लिया। संजीदगी किसी ने नहीं दिखाई। सिर्फ इसलिए कि उनके चेतन-अवचेतन में कहीं न कहीं यह बात बैठी हुई है कि गिरने वाला कोई वीआईपी थोड़े ही है कि कुछ होगा। सभी ने सोचा कि देर रात हो गई है, चलो सो जाते हैं। नागरिक हो या कर्मचारी या फिर तंत्र का जिम्मेदार तबका, उनकी ऐसी सोच हमारी सामाजिक और शासन व्यवस्था का कड़वा सच है। सवाल यह है कि क्या हमने लोकतंत्र की जो कल्पना की थी, उसके तहत ऐसी घटनाओं और ऐसी सोच की परिणति की कल्पना की थी?

उदारीकरण के बाद हमने आर्थिक चमक-दमक को बढ़ाने के साथ ही शहरीकरण पर जोर दिया है। शहरीकरण ने आर्थिक लाभ-हानि की बुनियाद पर ही आगे बढ़ने वाली हमारी सोच को विकसित किया है। ग्रामीण सभ्यता वाले अपने देश को हम पूरी तरह शहरीकृत करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। शहर माने सभ्यता का पाठ हमने पढ़ लिया है और उसे ही हकीकत बनाने पर तुले हुए हैं। आधुनिक लोकतंत्र को अगर शहरीकृत लोकतंत्र कहें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। शहरीकृत लोकतंत्र की अवधारणा को जाने-अनजाने हमारे मीडिया ने भी बढ़ावा दिया है। व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानने की बजाय हमने उसकी पृष्ठभूमि को अहम मान लिया है। मीडिया भी शहरों में होने वाली दुर्घटनाओं और घटनाओं को जब रिपोर्ट करता है तो वह हैरतअंगेज अंदाज में दिखाने की कोशिश करता है कि शहर में ऐसा हो गया तो बाकी देश का क्या हाल होगा। लोकतंत्र में वोट चाहे शहर के वोटर का हो या गांव के वोटर का, उसकी कीमत एक बराबर है। लेकिन जब यही लोकतांत्रिक व्यवस्था व्यक्तियों के साथ ट्रीटमेंट करने लगती है तो वह इस बराबरी की अवधारणा को भूल जाती है और फिर शहरी नागरिक को ग्रामीण लोक की तुलना में ज्यादा तरजीह देने लगती है। ऐसा करते वक्त उसे भान नहीं रहता कि भारत का समूचा इतिहास, चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो या फिर सांस्कृतिक, ग्रामीण व्यवस्था केंद्रित रहा है। ऐसा नहीं कि गांवों में दुश्मनियां नहीं रहीं, लेकिन गांवों के सोच की बुनियाद आधुनिक शहर केंद्रित सोच की तुलना में हमेशा ज्यादा उदार रही। यह उदारता आधुनिक दौर में भी दिखती है। जब किसी गांव की नहर में कोई कार गिर जाती है तो पूरा गांव उस कार को निकालने दौड़ पड़ता है। जब नदी में कोई महिला आत्महत्या के लिए कूद जाती है तो वहां का लोक उसे बचाने के लिए अपने जान की बाजी लगा देता है। कभी आग लग जाती है तो लोग वहां फायर ब्रिगेड का इंतजार नहीं करते, अपनी बाल्टी, कटोरे से ही आग बुझाने में जुट जाते हैं। गांधी भारतीय गांवों की इस गहन सोच को समझते थे, इसीलिए उन्होंने अपने संविधान में व्यक्ति की बजाय गांवों को मूल इकाई बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन चाहे बाबा साहब अंबेडकर हों या पंडित जवाहर लाल नेहरू, उन्होंने इसे दकियानुसी और पिछड़ी सोच बताते हुए खारिज कर दिया था। संविधान ने भारतीय नागरिक को व्यवस्था की मूल इकाई माना है। लेकिन इस इकाई का महत्व सिर्फ वोट हासिल करने के लिए होता है, जब ट्रीटमेंट का सवाल उठता है तो हमेशा लोक और आम पर वीआईपी, ग्रामीण पर शहरी को तरजीह दी जाती है। इसीलिए संकट के क्षणों में तंत्र की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। जैसे ही तंत्र को पता चलता है कि संकट में वीआईपी है तो वह बिजली की गति से सक्रिय हो जाता है। सिर्फ राहत के लिए ही नहीं, वीआईपी की सहूलियत के लिए भी, लेकिन संकट ग्रस्त लोक होता है तो उसकी कई बार वह अनदेखी करता है, तो कई बार उस पर मिट्टी भी डाल देता है। 

नोएडा की घटना हो या दिल्ली का हादसा, उसने एक बार फिर तंत्र की इसी खामी की ओर इशारा दिलाया है। ऐसे हादसों की जांच होगी, ऐसी घटना ना हो, इसके लिए तंत्र की ओर कदम भी उठाए जाएंगे। दोषी और जवाबदेह लोगों को दंडित करने की बात भी होगी, लेकिन यहां भी पृष्ठभूमि का असर दिखेगा। अधिकारी बच जाएंगे और लीपापोती करने के लिए एकाध निचले तबके के कर्मचारी को दंडित कर दिया जाएगा। फिर इसे भुला दिया जाएगा, फिर तंत्र उसी ढर्रे पर काम करेगा, आने वाले कुछ दिनों में फिर वैसा हादसा होगा और फिर पुराने ढर्रे की तरह तंत्र काम करेगा। जब तक हम अपने तंत्र की सोच से वीआईपी को इरेज नहीं करेंगे, जब तक हम लोक को सही मायने में प्रतिष्ठित नहीं करेंगे, जब तक नौकरशाही को लोक के प्रति जवाबदेह बनाने की सोच के साथ प्रशिक्षित नहीं करेंगे, तंत्र में बुनियाद बदलाव संभव नहीं। आजादी की अस्सीवीं सालगिरह नजदीक आ रही है। इस मौके पर हमें पीछे मुड़कर देखना होगा और अपने तंत्र की सोच में मौजूद खामियों की ओर ध्यान देना होगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हम इस तरह सोचने और खामियों को दूर करके तंत्र में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार हैं?

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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