By ललित गर्ग | Feb 13, 2026
डिजिटल युग में सूचना की गति जितनी तीव्र हुई है, उतनी ही तेजी से भ्रम, छल और दुष्प्रचार की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि चेहरों, आवाजों और भाव-भंगिमाओं से भी झूठ को सच की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने डीपफेक और एआई जनित सामग्री के नियमन के लिए आईटी नियमों को सख्त करने का निर्णय लिया है। बीस फरवरी से लागू होने जा रहे नए प्रावधानों के अनुसार एआई द्वारा निर्मित सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा और किसी भी अवैध या भ्रामक सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना या ब्लॉक करना होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे थी। यह बदलाव केवल तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि डिजिटल नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में एक गंभीर हस्तक्षेप है।
पिछले कुछ वर्षों में डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग भयावह रूप से सामने आया है। राजनीतिक नेताओं के फर्जी वीडियो, अभिनेत्रियों की अश्लील रूप से परिवर्तित तस्वीरें, सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले ऑडियो क्लिप और आर्थिक धोखाधड़ी के लिए बनाए गए कृत्रिम संदेश-ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि तकनीक तटस्थ नहीं रहती, उसका उपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं। जब सत्य को जूता जा रहा हो और झूठ को परिष्कृत तकनीक के सहारे प्रमाणिकता का आवरण पहनाकर प्रस्तुत किया जा रहा हो, तब समाज में अविश्वास का वातावरण बनना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा नियंत्रण की पहल आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि यह केवल अभिव्यक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है।
नए नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से बढ़ाई गई है। अब उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उपयोगकर्ता को यह जानकारी मिले कि साझा की जा रही सामग्री एआई से निर्मित है या नहीं। इससे पारदर्शिता का एक न्यूनतम मानक स्थापित होगा। साथ ही, तीन घंटे की समयसीमा यह संकेत देती है कि सरकार डिजिटल अपराधों की गंभीरता को समझ रही है। डीपफेक वीडियो के वायरल होने के बाद उसका खंडन अक्सर प्रभावहीन हो जाता है, इसलिए त्वरित कार्रवाई ही नुकसान को सीमित कर सकती है। परंतु यह भी सच है कि इतनी कम समय सीमा में सामग्री की सत्यता की जांच करना तकनीकी और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत जटिल कार्य है। इससे प्लेटफॉर्मों पर निगरानी तंत्र को अत्यधिक सुदृढ़ करना पड़ेगा, जो लागत और संचालन दोनों के स्तर पर चुनौतीपूर्ण होगा।
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि “आपत्तिजनक” या “भ्रामक” सामग्री की परिभाषा कौन और किस आधार पर तय करेगा। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूलाधिकार है। यदि नियमन की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत नहीं होगी, तो इसके दुरुपयोग की आशंकाएँ जन्म लेंगी। अतीत में भी यह देखा गया है कि जब-जब सोशल मीडिया पर नियंत्रण के प्रयास हुए, तब कुछ वर्गों ने इसे सरकारी अतिक्रमण के रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए नियमन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियमों का प्रयोग असहमति को दबाने के लिए नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से दुष्प्रचार और अपराध को रोकने के लिए हो। इस दिशा में स्वतंत्र निगरानी तंत्र, न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली अनिवार्य घटक हो सकते हैं।
वैश्विक परिदृश्य भी इसी संकट की ओर संकेत करता है। ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु निर्धारित करने जैसे कदम उठाए हैं। अमेरिका में इंस्टाग्राम और यूट्यूब के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभावों की जांच के लिए ऐतिहासिक मुकदमे चल रहे हैं। वहाँ की बड़ी तकनीकी कंपनियों पर युवाओं को लत लगाने वाली संरचनाएँ विकसित करने के आरोप लगे हैं। विशेषज्ञों का मत है कि कई युवा जब अपने फोन से दूर किए जाते हैं तो वे मनोवैज्ञानिक ही नहीं, शारीरिक असहजता भी अनुभव करते हैं। यह स्थिति केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं, भारत सहित विकासशील देशों में भी सोशल मीडिया का अनियंत्रित विस्तार सामाजिक और मानसिक संकट का कारण बन रहा है।
एआई उद्योग स्वयं भी एक नैतिक दुविधा के दौर से गुजर रहा है। अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में कंपनियाँ तकनीकी श्रेष्ठता की दौड़ में लगी हैं। इस दौड़ में सुरक्षा और नैतिकता के प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाते हैं। हाल ही में एक प्रमुख कंपनी के सुरक्षा शोधकर्ता द्वारा विवादास्पद परियोजनाओं की अनियंत्रित गति पर असहमति जताते हुए त्यागपत्र देना इस तनाव का संकेत है। तकनीक की प्रगति जितनी तेज होगी, नियामक ढाँचे उतनी ही तेजी से अप्रासंगिक होते जाएँगे, यदि उन्हें समयानुकूल अद्यतन न किया जाए। इसलिए नियमन को केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि दूरदर्शी और सहभागी होना चाहिए।
भारत के संदर्भ में यह विषय और भी संवेदनशील है। यहाँ डिजिटल क्रांति ने अभूतपूर्व विस्तार पाया है। करोड़ों नए उपयोगकर्ता प्रतिवर्ष ऑनलाइन आ रहे हैं। ऐसे में यदि असली और नकली के बीच का फर्क स्पष्ट न रहे तो लोकतांत्रिक विमर्श ही संदिग्ध हो जाएगा। चुनावी प्रक्रिया, सामाजिक सद्भाव, आर्थिक लेन-देन और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा-सभी पर डीपफेक का खतरा मंडरा सकता है। इसलिए एआई जनित सामग्री पर लेबलिंग का प्रावधान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सूचना साक्षरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि लेबलिंग तभी प्रभावी होगी जब आम उपयोगकर्ता डिजिटल साक्षर हो। अन्यथा वह लेबल को समझे बिना ही सामग्री साझा करता रहेगा।
आगामी ई-समिट और भारत के ‘इंडिया एआई मिशन’ के संदर्भ में यह और भी प्रासंगिक हो जाता है कि तकनीक का विकास पारदर्शिता, शुद्धता और प्रमाणिकता के मूल्यों के साथ हो। यदि भारत वैश्विक एआई नेतृत्व का दावा करना चाहता है, तो उसे नैतिक मानकों की स्थापना में भी अग्रणी भूमिका निभानी होगी। केवल स्टार्टअप्स और नवाचार की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि एआई मानव गरिमा, गोपनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करे। नियमन का उद्देश्य तकनीकी प्रगति को रोकना नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायी बनाना होना चाहिए।
अंततः यह समझना होगा कि डीपफेक और एआई का संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। कानून आवश्यक है, परंतु पर्याप्त नहीं। डिजिटल कंपनियों की जवाबदेही, सरकार की पारदर्शिता, न्यायपालिका की सतर्कता और नागरिकों की जागरूकता-इन सबका समन्वय ही इस चुनौती का स्थायी समाधान दे सकता है। यदि नियमन संतुलित और निष्पक्ष होगा तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के बजाय उसे सुरक्षित करेगा, क्योंकि स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह सत्य और जिम्मेदारी के साथ जुड़ी हो। झूठ को सच में बदलने की तकनीकी क्षमता जितनी बढ़ रही है, उतनी ही दृढ़ता से सत्य की रक्षा के लिए सामूहिक संकल्प भी आवश्यक है। यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा है, और यही लोकतांत्रिक समाज की अगली कसौटी भी।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार