यूरोप का हुआ बुरा हाल, रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले देश अब मास्को से मांग रहे गैस और तेल

By नीरज कुमार दुबे | Mar 11, 2026

जो यूरोप कल तक रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा रहा था और उससे गैस तथा तेल खरीदने वाले देशों पर पेनल्टी लगाने की मांग करते हुए यूक्रेन के साथ खड़ा नजर आ रहा था, वही यूरोप अब मध्य पूर्व में संकट गहराते ही फिर से रूस की ओर देखने लगा है। दरअसल अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष तथा फारस की खाड़ी में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में ऊर्जा संकट से जूझता यूरोप रूस से गैस और तेल की संभावित आपूर्ति को लेकर नई चर्चा कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों में रूस को अप्रत्याशित लाभ की स्थिति में ला खडा किया है।

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ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ रूस को मिल सकता है। रूस पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने उस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन अब ऊर्जा बाजार में उथल पुथल के कारण इन प्रतिबंधों का प्रभाव कम होता दिखाई दे रहा है। ऊंची कीमतों के कारण रूस को अपने तेल निर्यात से अधिक राजस्व मिलने की संभावना है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

अमेरिका ने भारत को भी कथित रूप से अस्थायी छूट देते हुए रूसी कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दी है। इस निर्णय के बाद रूस के तेल निर्यात में तेजी आई है। पहले जहां रूसी तेल लगभग पचास डॉलर प्रति बैरल के आसपास बिक रहा था, वहीं अब इसकी कीमत करीब नब्बे डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इससे रूस को राजस्व में भारी बढ़ोतरी मिल रही है।

ऊर्जा बाजार के आंकड़े बताते हैं कि समुद्र में टैंकरों पर जमा रूसी तेल का भंडार भी तेजी से कम हो रहा है, जिससे स्पष्ट है कि खरीदार देशों तक आपूर्ति तेजी से पहुंच रही है। फरवरी के अंत तक जहां टैंकरों में लगभग एक सौ बत्तीस मिलियन बैरल रूसी तेल जमा था, वहीं अब यह घटकर करीब एक सौ अठारह मिलियन बैरल रह गया है। इसका अर्थ है कि वैश्विक बाजार में रूसी तेल की मांग फिर बढ़ने लगी है।

यदि मध्य पूर्व में संघर्ष लंबा चलता है और खाड़ी क्षेत्र से तेल निर्यात बाधित होता है तो रूस को अरबों डॉलर का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऊंची कीमतों और आपूर्ति संकट के चलते रूस को आय में कई अरब डॉलर का अतिरिक्त लाभ हो सकता है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी संकेत दिया है कि यदि यूरोपीय देश राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर दीर्घकालिक सहयोग चाहते हैं तो रूस उन्हें फिर से तेल और गैस आपूर्ति करने को तैयार है। पुतिन का कहना है कि रूस ने कभी यूरोप के साथ ऊर्जा सहयोग से इंकार नहीं किया, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने स्वयं रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने का निर्णय लिया था।

हम आपको बता दें कि यूक्रेन युद्ध से पहले यूरोप अपनी गैस जरूरतों का चालीस प्रतिशत से अधिक हिस्सा रूस से खरीदता था। लेकिन प्रतिबंधों और वैकल्पिक स्रोतों की खोज के कारण यह हिस्सा घटकर वर्ष 2025 तक लगभग तेरह प्रतिशत रह गया। यूरोपीय संघ ने समुद्री मार्ग से आने वाले रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था और कई पाइपलाइन मार्ग भी बंद हो गए थे।

हालांकि मौजूदा संकट में स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। यूरोप ने अभी तक रूसी तरल प्राकृतिक गैस पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं किया है और प्रस्तावित योजना के अनुसार इसे 2027 तक धीरे धीरे समाप्त किया जाना है। इस कारण यूरोप के कुछ देश आपूर्ति संकट की स्थिति में फिर से रूसी गैस खरीदने पर विचार कर सकते हैं।

फिर भी रूस की क्षमता पूरी तरह असीमित नहीं है। वर्षों से लगे प्रतिबंधों और यूक्रेन से हुए हमलों के कारण उसकी ऊर्जा अवसंरचना के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा जहाजरानी और बीमा से जुड़ी बाधाएं भी रूसी निर्यात को सीमित करती हैं। वैसे रूस का अधिकांश तेल फिलहाल भारत और चीन जैसे सीमित खरीदारों को ही जा रहा है।

इसके बावजूद मौजूदा वैश्विक परिस्थिति का सामरिक महत्व बहुत बड़ा है। मध्य पूर्व में युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति पर नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना हुआ है। रूस के पास विशाल तेल और गैस भंडार हैं और संकट के समय यह उसे आर्थिक और कूटनीतिक दोनों तरह का प्रभाव प्रदान करते हैं।

दूसरी ओर यूरोप के सामने भी एक कठिन विकल्प खड़ा हो गया है। यदि मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो उसे अपने पुराने ऊर्जा स्रोत यानी रूस की ओर फिर से देखना पड़ सकता है। इस प्रकार मध्य पूर्व का युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा संतुलन और भू राजनीतिक शक्ति समीकरण को भी नए सिरे से आकार दे रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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