Yes Milord: सब CJP में लगे थे, इधर कोर्ट में शिवसेना टूट की कहानी क्या पलटने वाली है?

By अभिनय आकाश | Aug 01, 2026

चुनाव लड़ो किसी और सिंबल पर... और सरकार बना लो किसी और के दम पर! अगर यही चलता रहा, तो इस देश के संसदीय लोकतंत्र का क्या होगा? यह तीखा और सीधा सवाल देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रिम कोर्ट में गूंजा है। सवाल उठाने वाले हैं देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल। मौका महाराष्ट्र की सियासत से जुड़े उस सबसे बड़े कानूनी संग्राम का, जिसकी आंच एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुँच चुकी है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इन सांसदों के विलय को आधिकारिक मान्यता दे दी थी, जिसे अब उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की विशेष पीठ कर रही है, जिसकी अगुवाई CJI सूर्यकांत कर रहे हैं और पीठ में जस्टिस जयमालिया बागची व जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं। हाल ही में शिवसेना उद्धव बाला साहेब ठाकरे के छह सांसद एकनाथ शिंद के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हुए हैं। बकायदे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने खुद इनके विलय को मान्यता दी। इस फैसले को उद्धव गुट ने चैलेंज किया है। सुप्रीम कोर्ट में तीन जजेस की बेंच सुनवाई कर रही है। सीजीआई सूर्यकांत, जस्टिस जयमालिया, बागची और जस्टिस वी मोहना। 30 जुलाई को सुनवाई के दौरान एडवोकेट कपिल सिब्बल ने शिवसेना पर दावेदारी, चुनाव सिंबल, अलॉटमेंट, तत्कालीन राज्यपाल और चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाए। इस पर सीजीआई ने क्या कहा है पूरी दलील समझते हैं। इंडिया टुडे टीवी के एसोसिएट एडिटर अनीषा माथुर की रिपोर्ट के मुताबिक कपिल सिब्बल ने आज कोर्ट में कहा कि साल 2012 में बाला साहेब का निधन हुआ। फिर उद्धव ठाकरे ने पार्टी संभाली। उनकी अगुवाई में 40 चुनाव लड़े गए। तब पार्टी में एकनाथ शिंद भी थे। 2018 में पार्टी में हमने चुनाव किया। सिब्बल ने यहां 2018 में हुए शिवसेना के ऑर्गेनाइजेशनल इलेक्शन का जिक्र किया। इसी के तहत उद्धव ठाकरे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। कपिल सिब्बल ने आगे कहा 2019 में एकनाथ शिंद शिक्षा मंत्री बने। एमएलसी चुनाव के दौरान कुछ विधायकों ने अपनी पार्टी से हटकर क्रॉस वोटिंग की। हमें शक हुआ कि एकनाथ शिंद का गुट पीछे से कुछ गड़बड़ कर रहा है। फिर अचानक एक दिन 31 विधायक गुवाहाटी चले गए। उन 31 विधायकों ने एक प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में उन्होंने पार्टी के व्हिप सुनील प्रभु को पद से हटा दिया और उनकी जगह भरत गोगावले को नया व्हिप बना दिया गया।  

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एक चुनाव चिह्न पर चुने गए, दूसरे का दावा कर रहे हैं

सिब्बल ने तर्क दिया कि यह मामला संविधान की दसवीं अनुसूची के मूल सिद्धांत पर चोट करता है, जो दल-बदल के आधार पर अयोग्यता तय करती है। उन्होंने कहा कि जो विधायक अपनी मर्ज़ी से उस पार्टी को छोड़ देते हैं जिसके चुनाव चिह्न पर वे चुने गए थे, उन्हें अयोग्य ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब ऐसा रोज़ हो रहा है। लोग 'A' चुनाव चिह्न पर चुने जाते हैं और बाद में दावा करते हैं कि वे 'B' चुनाव चिह्न वाले गुट से हैं। संसदीय लोकतंत्र के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि याचिकाएँ वर्षों से लंबित हैं और समय पर सुनवाई होने से महाराष्ट्र में राजनीतिक परिणाम बदल सकते थे। उन्होंने कहा यदि इस मामले की समय पर सुनवाई हो जाती, तो शिंदे सरकार का गठन नहीं हो पाता।

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अदालत ने विलंब संबंधी दलील पर सवाल उठाए

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने विलंब के संबंध में सिबल के तर्क पर सवाल उठाया और पूछा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं विभिन्न चरणों में स्थगन की मांग क्यों की। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने यह भी टिप्पणी की कि सरकार का गठन न होने का दावा दो मान्यताओं पर निर्भर करता है - कि मुकदमे की सुनवाई होगी और अंतिम फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आएगा। जवाब में सिबल ने कहा कि कानून स्पष्ट है। उन्होंने तर्क दिया फैसला हमारे पक्ष में ही आना चाहिए। दसवीं अनुसूची बिल्कुल स्पष्ट है। चुनाव जीतने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा निष्ठा बदलने की प्रवृत्ति को "संवैधानिक आत्महत्या" बताते हुए सिबल ने कहा कि प्रतिनिधि लोकतंत्र में विधायकों को उस राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करना आवश्यक है जिसका चिन्ह मतदाताओं ने मतपेटी में चुना हो।

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ECI के फ़ैसले को चुनौती

सिब्बल ने शिंदे गुट को असली शिवसेना के तौर पर मान्यता देने के चुनाव आयोग के फ़ैसले की भी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने पार्टी की संगठनात्मक संरचना को लेकर विवादों को नजरअंदाज कर दिया और प्रतिद्वंद्वी दावों पर फैसला करते समय मुख्य रूप से विधायी शक्ति पर भरोसा किया। सिबल ने पूछा कि चुनाव आयोग केवल विधायी विंग को देखकर यह निष्कर्ष कैसे निकाल सकता है कि वह पार्टी के बहुमत का प्रतिनिधित्व करता है?" उन्होंने आगे कहा कि इस फैसले के परिणामस्वरूप अंततः उद्धव गुट को शिवसेना का नाम और चिन्ह खोना पड़ा। अब इस मामले पर 4 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में फिर से सुनवाई होगी।

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