भारत की आर्थिक प्रगति में समाज से अपेक्षा

By प्रह्लाद सबनानी | Nov 06, 2024

विश्व के लगभग समस्त देशों में पूंजीवादी मॉडल को अपनाकर आर्थिक विकास को गति देने का प्रयास पिछले 100 वर्षों से भी अधिक समय से हो रहा है। पूंजीवाद की यह विशेषता है कि व्यक्ति केवल अपनी प्रगति के बारे में ही विचार करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के एहसास को भूल जाता है। जिससे, विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के चलते समाज में असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विनिर्माण इकाईयों में मशीनों के अधिक उपयोग से उत्पादन में तो वृद्धि होती है परंतु रोजगार के पर्याप्त अवसर निर्मित नहीं हो पाते हैं। रोजगार की उपलब्धता में कमी के चलते समाज में कई प्रकार की बुराईयां जन्म लेने लगती  हैं क्योंकि यदि किसी नागरिक के पास रोजगार ही नहीं होगा तो वह अपनी भूख मिटाने के लिए चोरी चकारी एवं  हिंसा जैसी गतिविधियों में लिप्त होने लगता है। पूंजीवाद की नीतियों के अनुपालन के चलते वर्तमान में विश्व के कई देशों में सामाजिक तानाबाना छिन्न भिन्न हो रहा है। परंतु, प्राचीनकाल में भारत में उपयोग में लाए जा रहे आर्थिक मॉडल को अपनाए जाने के कारण भारत में प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध रहता था। भारत में अतिप्राचीन काल से ग्रामीण क्षेत्र ही विकास के केंद्र रहते आए हैं। भारत का कृषि क्षेत्र तो विकसित था ही, साथ में, कुटीर उद्योग भी अपने चरम पर था। पीढ़ी दर पीढ़ी व्यवसाय को आगे बढ़ाया जाता था। नौकरी शब्द तो शायद उपयोग में था ही नहीं क्योंकि परिवार के सदस्य ही अपने पुरखों के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में रुचि लेते थे अतः भारत के प्राचीन काल में नागरिक उद्यमी थे। नौकरी को तो निकृष्ट कार्य की श्रेणी में रखा जाता था।

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भारत में आर्थिक प्रगति के चलते सम्पत्ति के निर्माण की गति भी तेज हुई है। वित्तीय वर्ष 2023 के अंत में आयकर विभाग में जमा की गई विवरणियों के अनुसार, 230,000 नागरिकों ने अपनी कर योग्य आय को एक करोड़ रुपए से अधिक की बताया है। यह संख्या पिछले 10 वर्षों के दौरान 5 गुणा बढ़ी है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में 44,078 नागरिकों ने अपनी कर योग्य आय को एक करोड़ रुपए से अधिक की घोषित किया था। उक्त आंकड़ों में वेतन पाने वाले नागरिकों का प्रतिशत वित्तीय वर्ष 2022-23 में 52 प्रतिशत रहा है, वित्तीय वर्ष 2021-22 में यह 49.2 प्रतिशत था तथा वित्तीय वर्ष 2012-13 में यह प्रतिशत 51 प्रतिशत था। इस प्रकार एक करोड़ रुपए से अधिक का वेतन पाने वाले नागरिकों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है। जबकि व्यवसाय करने वाले नागरिकों की आय और अधिक तेज गति से बढ़ी है। 500 करोड़ रुपए से अधिक की कर योग्य आय घोषित करने वाले नागरिकों में समस्त करदाता व्यवसायी हैं। 100 करोड़ रुपए से 500 करोड़ रुपए की कर योग्य आय घोषित करने वाले नागरिकों में 262 व्यवसायी हैं एवं केवल 19 वेतन पाने वाले नागरिक हैं। भारत के एक प्रतिशत नागरिकों के पास देश की 40 प्रतिशत से अधिक की सम्पत्ति है। अतः देश में आय की असमानता स्पष्टतः दिखाई दे रही है।   

एक अनुमान के अनुसार यदि उच्चवर्गीय एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवार की आय में 100 रुपए की वृद्धि होती है तो वह केवल 10 रुपए का खर्च करता है एवं 90 रुपए की बचत करता है जबकि एक गरीब परिवार की आय में यदि 100 रुपए की वृद्धि होती है तो वह 90 रुपए का खर्च करता है एवं केवल 10 रुपए की बचत करता है। इस प्रकार किसी भी देश को यदि उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि करना है तो गरीब वर्ग के हाथों में अधिक धनराशि उपलब्ध करानी होगी। जबकि विकसित देशों एवं अन्य देशों में इसके ठीक विपरीत हो रहा है, उच्चवर्गीय एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आय में तेज गति से वृद्धि हो रही है जिसके चलते कई विकसित देशों में आज उत्पादों की मांग बढ़ने के स्थान पर कम हो रही है और इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर बहुत कम हो गई है तथा इन देशों की अर्थव्यवस्था में आज मंदी का खतरा मंडरा रहा है।

उक्त परिस्थितियों के बीच वैश्विक पटल पर भारत आज एक दैदीप्यमान सितारे के रूप में चमक रहा है। भारत में आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत के आसपास आ गई है और इसे यदि 10 प्रतिशत के ऊपर ले जाना है तो भारत में ही उत्पादों की आंतरिक मांग उत्पन्न करनी होगी इसके लिए गरीब वर्ग की आय में वृद्धि करने सम्बंधी उपाय करने होंगे तथा रोजगार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित करने होंगे। प्राचीनकाल में भारत में उपयोग किए जा रहे आर्थिक दर्शन को एक बार पुनः देश में लागू किए जाने की आवश्यकता है। आज भारत में शहरों को केंद्र में रखकर विकास की विभिन्न योजनाएं (स्मार्ट सिटी, आदि) बनाई जा रही है, जबकि, आज भी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण इलाकों में ही निवास करती है। इसलिए भारत को पुनः ग्रामों की ओर रूख करना होगा। न केवल कृषि क्षेत्र बल्कि ग्रामीण इलाकों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए जिससे रोजगार के पर्याप्त अवसर ग्रामीण इलाकों में ही निर्मित हों और इन स्थानों पर उत्पादित की जा रही वस्तुओं के लिए बाजार भी ग्रामीण इलाकों में ही विकसित हो सकें। लगभग 50 गावों के क्लस्टर विकसित किए जा सकते हैं, इन इलाकों में निर्मित उत्पादों को इस क्लस्टर में ही बेचा जा सकता है और यदि इन इलाकों के स्थित कुटीर एवं लघु उद्योगों में उत्पादन बढ़ता है तो उसे आस पास के अन्य क्लस्टर एवं शहरों में बेचा जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर ही उत्पादों की मांग को बढ़ावा मिलेगा एवं रोजगार के अवसर निर्मित होने से ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे परिवारों के शहरों की ओर पलायन को भी रोका जा सकेगा। अंततः इससे शहरों के बुनियादी ढांचे पर लगातार बढ़ रहे दबाव को भी कम किया जा सकेगा। 

भारत में हिंदू सनातन संस्कृति की यह विशेषता रही है कि समाज में निवास कर रहे गरीब वर्ग के नागरिकों की सहायता के लिए सक्षम समाज हमेशा से ही आगे रहता आया है। यह सेवा कार्य विभिन्न मंदिरों, मट्ठ, सामाजिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संस्थाओं एवं न्यासों द्वारा सफलता पूर्वक किया जाता रहा हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ नागरिकों के लिए अन्न क्षेत्रों में भोजन प्रसादी उपलब्ध कराई जाती है। इसी प्रकार कई सामाजिक, सांस्कृतिक एवं न्यासों द्वारा अस्पताल चलाए जाते हैं, जहां मुफ्त अथवा बहुत ही कम कीमत पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कुछ संस्थानों द्वारा स्कूल भी चलाए जाते हैं जहां गरीब वर्ग के बच्चों को शिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है। इस प्रकार समाज के गरीब वर्ग को यदि भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएं मुफ्त अथवा कम कीमत पर उपलब्ध हो सकती हैं तो उनके द्वारा अर्जित की जा रही आय को अन्य उत्पादों को खरीदने में उपयोग किया जा सकता है जिससे अंततः विभिन्न उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होती है। यह मॉडल भी केवल भारत में ही दिखाई देता है। वरना, अन्य विकसित देशों में तो कुछ भी मुफ्त नहीं है। विकसित देशों में नागरिकों को केवल अपनी प्रगति की चिंता है, समाज में गरीब वर्ग के अन्य नागरिकों के लिए कोई चिंता का भाव दिखाई ही नहीं देता है। अतः भारत में समाज के नागरिकों द्वारा गरीब वर्ग के सहायतार्थ चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को गति देने के प्रयास करने चाहिए, जिससे देश के विकास को और अधिक गति मिल सके।         

- प्रहलाद सबनानी 

सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक 

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर- 474 009

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