By एकता | Feb 11, 2026
रिश्ते की शुरुआत में आपका पार्टनर भले ही आपको दुनिया का सबसे बेहतरीन इंसान लगे, लेकिन उसकी असली हकीकत से सामना अक्सर वक्त के साथ ही होता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, इंसान का असली स्वभाव धीरे-धीरे सामने आने लगता है। ज्यादातर रिश्तों में कड़वाहट की शुरुआत भी यहीं से होती है, जब शुरुआती दिनों में हर कदम पर साथ देने वाला पार्टनर, समय के साथ आपको समझने के बजाय आपको कंट्रोल करने लगता है और आप भीतर ही भीतर घुटने लगते हैं। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? चलिए एक उदाहरण से इसे अच्छे से समझते हैं।
एक महिला ने बताया कि उनके तीन साल के रिश्ते की शुरुआत बेहद खूबसूरत थी और उनका पार्टनर तब बहुत समझदार और सहयोगी लगता था। लेकिन हाल के दिनों में हालात बदलने लगे हैं। अब उनका पार्टनर हर बात का हिसाब रखने लगा है, कौन ज्यादा योगदान दे रहा है, कौन ज्यादा समझौता कर रहा है और कौन ज्यादा मेहनत कर रहा है। उन्होंने कहा कि उनके रिश्ते में प्यार अब धीरे-धीरे तुलना में बदलता जा रहा है, जिससे उन्हें अजीब-सी बेचैनी और घुटन महसूस हो रही है। मदद मांगते हुए उन्होंने साफ कहा कि वह रिश्ते में किसी भी तरह का हिसाब-किताब नहीं चाहतीं और जानना चाहती हैं कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए।
नोएडा की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. जया सुकुल ने भास्कर से बातचीत में इस मुद्दे पर विस्तार से बात की और कुछ जरूरी एक्सपर्ट एडवाइस साझा की।
वह कहती हैं कि कई रिश्ते इसी मोड़ पर आकर उलझ जाते हैं। कुछ समय बाद प्यार धीरे-धीरे हिसाब-किताब में बदलने लगता है। आपने बताया कि तीन साल के इस रिश्ते में आप दोनों ने एक-दूसरे को जीरो से आगे बढ़ते देखा है, यह अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। रिश्तों में भावनात्मक निवेश जितना गहरा होता है, चोट भी उतनी ही गहरी लगती है। इसलिए जरूरी है कि पहले समझा जाए कि रिश्ते में असल में हो क्या रहा है और ऐसी स्थिति में सही कदम क्या हो सकता है।
डॉ. जया बताती हैं कि दुनिया में सिर्फ एक ही रिश्ता ऐसा होता है, जिसमें बिना किसी उम्मीद के सिर्फ दिया जाता है और वह है पेरेंटिंग। मां-बाप बच्चे को बिना किसी शर्त के प्यार, सुरक्षा, परवरिश और अपनापन देते हैं। लेकिन दो वयस्कों के रिश्ते इस तरह काम नहीं करते।
रिलेशनशिप में न कोई सिर्फ देने वाला होता है और न ही सिर्फ लेने वाला। यह एक साझेदारी होती है, जहां दोनों एक-दूसरे को प्यार और सपोर्ट देते भी हैं और पाते भी हैं। अगर आपका पार्टनर हर चीज गिनने लगा है, तो मुमकिन है कि वह इस म्यूचुअल शेयरिंग की भावना को भूलता जा रहा हो।
अक्सर लोग मान लेते हैं कि जहां हिसाब आया, वहां प्यार खत्म। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। डॉ. जया के मुताबिक, हिसाब दो तरह का होता है, एक हेल्दी और दूसरा टॉक्सिक। आपके सवाल से लगता है कि आप टॉक्सिक हिसाब से परेशान हैं। इसे समझना जरूरी है।
हेल्दी हिसाब का मतलब यह नहीं कि कोई डायरी खोलकर लिखा जाए, 'मैंने चार दिन झाड़ू लगाई, तुमने तीन दिन' या 'इस महीने मैंने ज्यादा खर्च किया'। हेल्दी हिसाब बहुत बुनियादी होता है, जैसे घर के काम, खर्च और जिम्मेदारियां मोटे तौर पर बराबर बंटी हुई हैं या नहीं। यह हिसाब रिश्ते को बचाने के लिए होता है, किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं। यह रिश्ते में बैलेंस बनाए रखता है, ठीक वैसे ही जैसे दोस्तों के बीच बिल शेयर करना।
टॉक्सिक हिसाब तब शुरू होता है, जब हर बात में गिनती आने लगे और हर बहस में पुराने रिकॉर्ड खोल दिए जाएं। जब यह कहा जाने लगे, 'मैंने ज्यादा एफर्ट्स किए हैं, तुमने कम किए हैं।' समझौते की बात आते ही यह सवाल उठे कि मुझसे ज्यादा किसने समझौता किया है? तो यह प्यार नहीं, अविश्वास की निशानी है। ऐसा रवैया रिश्ते को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर देता है, क्योंकि इससे घुटन और अनकंफर्टेबल फीलिंग पैदा होती है। अगर यह लंबे समय तक चलता रहे, तो लोग रिश्ते से दूर भागने लगते हैं।
डॉ. जया बताती हैं कि जब भरोसा कमजोर पड़ता है, तो रिश्ता हिसाब-किताब में बदलने लगता है। मनोविज्ञान के अनुसार, जब कोई व्यक्ति रिश्ते में सुरक्षित महसूस नहीं करता, तो वह खुद को बचाने के लिए तुलना और कंट्रोल का सहारा लेने लगता है।
ऐसे में व्यक्ति चाहता है कि दोनों के एफर्ट्स बराबर-बराबर दिखाई दें। यही वजह है कि बार-बार भरोसा दिलाने की जरूरत महसूस होती है। यह स्थिति अंदर की असुरक्षा, ठुकराए जाने के डर और आत्मविश्वास की कमी से जुड़ी होती है। लंबे समय तक ऐसा चलने पर रिश्ता नजदीकी की जगह मुकाबले जैसा लगने लगता है।
एक्सपर्ट ने कहा कि हां, कुछ परिस्थितियों में हिसाब जरूरी भी हो सकता है, जैसे अगर एक ही व्यक्ति घर की सारी जिम्मेदारी उठा रहा हो, इमोशनल बोझ भी वही संभाल रहा हो और दूसरा सिर्फ डिमांड करता जा रहा हो, ऐसे में हिसाब करना गलत नहीं है।
लेकिन आपके सवाल में एक अहम बात है कि वह हर चीज गिनने लगा है। यह लाइन बहुत कुछ कहती है। यहां बात सिर्फ जिम्मेदारी की नहीं लगती, बल्कि तुलना और भावनात्मक दबाव की है और यह किसी भी रिलेशनशिप के लिए हेल्दी नहीं होता।
इस स्थिति में आपको खुद से ईमानदारी से कुछ सवाल पूछने होंगे कि क्या वाकई आप कुछ नहीं कर रही हैं? क्या आपके एफर्ट्स देखे नहीं जा रहे? क्या आप इमोशनल सपोर्ट देती हैं, जिसे गिना नहीं जा रहा?
कई बार ऐसा होता है कि एक पार्टनर का एफर्ट दिखता है और दूसरे का सिर्फ महसूस होता है। इमोशनल सपोर्ट, सुनना, साथ खड़ा रहना, ये सब नजर नहीं आते, लेकिन बेहद अहम होते हैं। तीन साल के रिश्ते में आपके एफर्ट्स शायद ऐसे ही इमोशनल रहे हों।
डॉ. जया के मुताबिक, यहां सबसे जरूरी चीज है कम्युनिकेशन। लड़ाई या आरोप लगाने से बचें। शांत होकर अपनी फीलिंग्स रखें, जैसे कि जब तुम हर चीज गिनते हो, तो मुझे लगता है कि मेरे प्यार को कम आंका जा रहा है। मुझे रिश्ते में स्कोरकार्ड जैसा फील होता है। मैं बराबरी चाहती हूं, हिसाब-किताब नहीं।
डॉ. जया ने बताया कि तुम हमेशा ऐसा करते हो कहने की बजाय यह कहें कि जब तुम कहते हो कि मैंने कम समझौता किया है, तो मुझे दुख होता है।
बात करने के बाद तीन बातों पर ध्यान दें, पहला, क्या वह आपकी बात समझने की कोशिश करता है? दूसरा, क्या वह अपने व्यवहार पर सोचता है? तीसरा, क्या वह बदलाव के लिए तैयार है? अगर जवाब हां है, तो रिश्ता संभल सकता है। आप दोनों मिलकर काउंसलिंग भी ले सकते हैं। लेकिन अगर वह आपकी फीलिंग्स को लगातार नजरअंदाज करता है, तो यह एक रेड फ्लैग है।
आखिर में सबसे जरूरी बात
रिलेशनशिप में बराबरी जरूरी है, अकाउंटिंग नहीं। देना-लेना चलता रहता है। कभी आप चार कदम आगे बढ़ते हैं, कभी वह। लेकिन अगर कोई बराबरी के नाम पर आपको छोटा महसूस करवाने लगे, तो वह प्यार नहीं, कंट्रोल है। प्यार कोई प्रतियोगिता नहीं है। न ही यह एक्सेल शीट में मैनेज होने वाला डेटा है। अगर कोई रिश्ता आपको सुरक्षित, सम्मानित और सुकून में रखता है, तो वह सही दिशा में है। और अगर उसी रिश्ते में रहकर आप खुद को दोषी, थका हुआ या कमतर महसूस करने लगें, तो सवाल उठाना बिल्कुल सही है। आप समझदार हैं, इन बातों को समझकर अपने रिश्ते का सही आकलन कर सकती हैं और अपने लिए बेहतर फैसला ले सकती हैं।