वैश्विक स्तर पर भारत के विरुद्ध पुनः गढ़े जा रहे झूठे विमर्श

By प्रह्लाद सबनानी | Jun 18, 2025

वैश्विक स्तर पर आर्थिक जगत में भारत का उदय कुछ देशों को रास नहीं आ रहा है। विकसित देशों के बीच पूरे विश्व में भारत आज सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बना हुआ है। जापान, ब्रिटेन, फ्रांन्स, इटली आदि देशों से आगे निकलते हुए भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और शीघ्र ही लगभग एक वर्ष के बाद जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए भारत के विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के आसार भी अब स्पष्टत: दिखाई दे रहे हैं। भारत एक ओर अतिआधुनिक तकनीकि के आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स एवं डाटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में पूरे विश्व का नेतृत्व करता हुआ दिखाई दे रहा है तो दूसरी ओर वित्तीय क्षेत्र में ऑनलाइन व्यवहारों के मामले में भी भारत आज कई देशों का मार्गदर्शन करता हुआ दिखाई दे रहा है। कुल मिलाकर भारत आज लगभग प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनते हुए विश्व के अन्य देशों पर अपनी निर्भरता को कम करता जा रहा है। भारत के विकास की यह गति एवं राह कुछ देशों को बिलकुल उचित नहीं लग रही है एवं वे वैमनस्य का भाव पालते हुए भारत के विरुद्ध एक बार पुनः कुछ झूठे विमर्श गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। 

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बांग्लादेश की तुलना में भारत एक विशाल देश है एवं भारत के कई राज्यों यथा महाराष्ट्र, गुजरात एवं तमिलनाडु आदि का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद बांग्लादेश की तुलना में दुगने से तिगुने आकार का है। इसी प्रकार, भारत के राज्य अभी भी कुछ पिछड़े राज्यों की श्रेणी में शामिल है, जैसे, बिहार, झारखंड आदि। परंतु किसी भी देश के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का औसत निकालते समय देश के समस्त राज्यों के आंकड़ों को शामिल करना होता है। इस कारण से भी भारत में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का औसत कुछ कम हो जाता है।

हाल ही के समय में एक और कुतर्क दिया जा रहा है कि भारत में तेज गति से हो रही आर्थिक प्रगति के बीच भी बच्चों की जन्म-मृत्यु की दर अफ्रीकी देशों के समान बनी हुई है। इस प्रकार का झूठा विमर्श गढ़ते समय संभवत: वास्तविक स्थिति की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया है। रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया की एसआरएस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1,000 शिशुओं के जन्म के बीच शिशुओं की जन्म-मृत्यु दर केवल 26 है। जबकि अफ्रीकी देशों यथा नाईजीरिया में 67, कांगो में 62 एवं ईथियोपिया में 34 है। इन सभी अफ्रीकी देशों की तुलना में भारत में शिशुओं की जन्म-मृत्यु दर कम है। अतः भारत अब अफ्रीकी देशों से इस मामले में बहुत आगे निकल आया है। हां, इस संदर्भ में भारत की तुलना यदि विकसित देशों से की जाएगी यथा अमेरिका में 5 एवं जापान में 2, तब जरूर भारत में इस स्थिति को अभी और अधिक सुधारने की आवश्यकता है, जिसके लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार बहुत तेज गति से किया जा रहा है। जिला स्तर पर मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की जा रही है। भारत में इस संदर्भ में क्षेत्रीय विषमता भी दिखाई देती है। जैसे, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली जैसे विकसित राज्यों में शिशुओं के जन्म के बीच जन्म-मृत्यु दर 10-15 के बीच ही है, जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में यह 40-50 के बीच बनी हुई है। हालांकि धीमे धीमे इन राज्यों में भी तेजी से सुधार दृष्टिगोचर है। देश में संस्थागत प्रसव की दर में सुधार हुआ है, परंतु जननी सुरक्षा, पोषण एवं टीकाकरण के क्षेत्रों में विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में अभी भी प्रयासों को गति दी जा रही है। इसी प्रकार, ग्रामीण इलाकों में अति पिछड़े परिवारों (विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति के क्षेत्रो में) के बीच गंदे पानी का उपयोग, कुपोषण, प्रसव के पूर्व की देखभाल में कमी के चलते शिशुओं के जन्म के बीच जन्म-मृत्यु दर को अभी और कम किया जाना शेष है। भारत में हालांकि स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से सुधार हुआ है, पर कुछ राज्यों पर अभी भी विशेष ध्यान केंद्रित कर 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' नीति से स्वास्थ्य सेवाओं को संतुलित किया जा रहा है। 

एक तीसरा झूठा विमर्श और खड़ा किया जा रहा है कि जब भारत आर्थिक प्रगति के पथ पर तेज गति से दौड़ रहा है तो फिर 80 करोड़ नागरिकों को मुफ्त अनाज क्यों उपलब्ध कराया जा रहा है? तथ्यात्मक रूप से यह सही है कि भारत में “प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना” के अंतर्गत भारत में केंद्र सरकार द्वारा देश के 80 करोड़ नागरिकों को 5 किलो मुफ्त राशन प्रति माह उपलब्ध कराया जा रहा है। दरअसल, भारत में अभी भी गरीबी पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई है। सरकार का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध करवाए। कोरोना महामारी के खंडकाल में देश के नागरिकों पर आई प्राकृतिक आपदा के चलते करोड़ों की संख्या में नागरिकों ने अपने रोजगार खोए थे तथा इस गम्भीर समय में केंद्र सरकार ने अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए देश के गरीब नागरिकों को उक्त योजना के अंतर्गत खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना प्रारम्भ किया था, जो आज भी जारी है। दरअसल इसी योजना के चलते भारत में आज लाखों परिवार गरीबी रेखा से ऊपर उठकर मध्यम श्रेणी परिवार की श्रेणी में शामिल हो गए हैं एवं देश के आर्थिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। कोरोना महामारी के खंडकाल में मंहगाई एवं बेरोजगारी के दौर में देश के नागरिकों को आजीविका की गारंटी देना आवश्यक था। जब तक देश के समस्त परिवार आत्मनिर्भर नहीं जो जाते तब तक इसे एक “ट्रैंजीशनल सिक्यूरिटी नेट” माना जा सकता है। हां, आगे आने वाले 3-5 वर्षों के दौरान इस योजना के अंतर्गत शामिल नागरिकों की संख्या को कम जरूर किया जाना चाहिए क्योंकि जो परिवार अब गरीबी रेखा से ऊपर उठकर मध्यम श्रेणी परिवार की श्रेणी में शामिल हो गए है, ऐसे परिवारों को उक्त योजना का लाभ अब बंद किया जाना चाहिए।        

- प्रहलाद सबनानी 

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक 

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर - 474 009

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