FIR कराना हो जाएगा आसान, जब जानेंगे 2026 के कानून

By जे. पी. शुक्ला | Jun 11, 2026

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत FIR 2023 में लागू हुई और यह भारत के क्रिमिनल प्रोसीजर कानूनों में एक बड़ा बदलाव है। यह FIR दर्ज करने का एक साफ और व्यवस्थित तरीका पेश करता है और इसका मकसद कानून लागू करने को तेज़ और ज़्यादा ट्रांसपेरेंट बनाना है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत FIR के नियमों में सेक्शन 173 और 174 में बड़े बदलाव किए गए हैं, जो इस बात पर फोकस करते हैं कि कोर्ट कानूनों को कैसे समझते हैं और सिस्टम गलत इस्तेमाल से कैसे बचाता है। नए एक्ट में ये अपडेट पहले के कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) को भी बेहतर बनाते हैं। 

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FIR क्या है?

FIR (First Information Report) एक फॉर्मल डॉक्यूमेंट है जिसे पुलिस किसी कॉग्निजेबल या नॉन-कॉग्निजेबल अपराध के होने की जानकारी मिलने पर तैयार करती है। यह क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन का पहला स्टेप है और यह देखता है कि लॉ एनफोर्समेंट अथॉरिटी रिपोर्ट किए गए अपराधों पर तुरंत एक्शन लेती हैं या नहीं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत, FIR रजिस्ट्रेशन को आसान बनाने के लिए ज़ीरो FIR, E-FIR और शुरुआती पूछताछ को शामिल करके नए प्रोविज़न लाए गए हैं।

1. ई-एफआईआर (e-FIR): थाने जाने की मजबूरी खत्म

नए कानून की धारा 173 (BNSS) के तहत अब कोई भी नागरिक इलेक्ट्रॉनिक संचार (E-mail या आधिकारिक पोर्टल) के माध्यम से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की शिकायत दर्ज करा सकता है।

प्रक्रिया: आपको पुलिस स्टेशन जाने की आवश्यकता नहीं है। आप संबंधित राज्य की पुलिस वेबसाइट या ऐप पर जाकर अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं।

अनिवार्य शर्त: इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत भेजने के बाद शिकायतकर्ता को 3 दिन के भीतर संबंधित थाने जाकर उस पर हस्ताक्षर करने होंगे। हस्ताक्षर होने के बाद ही इसे आधिकारिक तौर पर एफआईआर के रूप में पंजीकृत किया जाएगा। यह व्यवस्था विशेषकर चोरी, मोबाइल गुम होने या संपत्ति से जुड़े मामलों में आम नागरिकों के लिए वरदान साबित हो रही है।

2. जीरो एफआईआर (Zero FIR) को मिला कानूनी दर्जा

अक्सर देखा जाता था कि जब कोई पीड़ित किसी थाने में शिकायत लेकर जाता था तो पुलिस 'क्षेत्राधिकार' (Jurisdiction) का बहाना बनाकर उसे उस इलाके के थाने में जाने को कहती थी जहाँ अपराध हुआ है। इससे कीमती समय बर्बाद होता था और अपराधियों को भागने का मौका मिलता था।

नया नियम: अब कोई भी व्यक्ति भारत के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज करा सकता है, चाहे अपराध उस थाने के अधिकार क्षेत्र में हुआ हो या नहीं।

आगे की कार्रवाई: पुलिस तुरंत 'जीरो एफआईआर' दर्ज करेगी और प्रारंभिक जांच शुरू कर देगी। इसके बाद, उस एफआईआर को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया जाएगा।

3. प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) के लिए सख्त समय सीमा

झूठे मुकदमों पर लगाम लगाने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए नए कानून में एक विशेष प्रावधान किया गया है। जिन अपराधों में सजा 3 से 7 वर्ष के बीच है, वहाँ पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज करने के बजाय प्राथमिक जांच कर सकती है।

समय सीमा: पुलिस अधिकारी को ऐसी जांच 14 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।

निर्णय: जांच में प्रथम दृष्टया अपराध पाए जाने पर ही एफआईआर दर्ज की जाएगी, जिससे बेकसूर लोगों को प्रताड़ना से बचाया जा सके।

4. पीड़ितों के लिए डिजिटल अधिकार और पारदर्शिता

नए कानून केवल शिकायत दर्ज करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जांच की प्रगति में भी पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं:

मुफ्त प्रति का अधिकार: एफआईआर दर्ज होने के बाद उसकी एक प्रति (Copy) शिकायतकर्ता या पीड़ित को तुरंत और पूरी तरह मुफ्त (Free of Cost) दी जाएगी।

90 दिनों में प्रोग्रेस अपडेट: अब पुलिस के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वह एफआईआर दर्ज होने के 90 दिनों के भीतर पीड़ित को जांच की प्रगति (Progress Report) की जानकारी दे। इसे एसएमएस या ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी साझा किया जा सकता है।

यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो क्या करें?

यदि कोई थाना प्रभारी (SHO) आपकी वैध शिकायत पर भी एफआईआर दर्ज करने से इनकार करता है तो नए कानून के तहत आपके पास निम्नलिखित वैधानिक विकल्प हैं:

पुलिस अधीक्षक (SP) को आवेदन: आप अपनी शिकायत लिखित रूप में या डाक द्वारा संबंधित जिले के एसपी (Superintendent of Police) को भेज सकते हैं। यदि वे संतुष्ट होते हैं तो खुद जांच करेंगे या संबंधित थाने को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देंगे।

न्यायिक मजिस्ट्रेट का रुख: यदि वहाँ से भी राहत नहीं मिलती तो आप धारा 175 (BNSS) के तहत सीधे इलाका मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकते हैं। मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश देने का पूर्ण अधिकार है।

नया कानूनी ढांचा पूरी तरह से नागरिक-केंद्रित (Citizen-centric) है। तकनीक के समावेश और जवाबदेही तय होने से अब पुलिस के लिए किसी पीड़ित को टालना आसान नहीं होगा। एक जागरूक नागरिक के रूप में इन नियमों को जानना और समझना ही आपके अधिकारों की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

- जे. पी. शुक्ला

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