Interview: दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलना सपना सच होने जैसा हैः वहीदा रहमान

By डॉ. रमेश ठाकुर | Oct 30, 2023

वहीदा रहमान गुजरे जमाने की बेहतरीन एक्ट्रेस हैं। उनकी ऊर्जा आज भी ऐसी है कि नई हीरोइनों को भी मात दे दें। वहीदा जी ने ठहरे और तेज दौड़ते सिनेमा को देखा है। सिनेमा को दिए उनके बेजोड़ योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उनको ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार दिया है जिसकी वो असल हकदार हैं। पिछले दिनों दिल्ली में उनको सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर द्वारा अवॉर्ड प्रदान किया गया। बदलते हिंदी सिनेमा और अवॉर्ड के पीछे के संघर्ष को लेकर पत्रकार डॉ0 रमेश ठाकुर ने उनसे विस्तृत बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश।

उत्तर- मैं अपनी नजरिए से अगर कहूं, तो इस सम्मान के लिए अहमियत शब्द भी बहुत छोटा पड़ेगा। देखिए, प्रत्येक आर्टिस्ट का सपना होता है कि उसे फिल्मों का सबसे बड़ा सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के’ मिले। मुझे मिला है, इसलिए मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं। पर, इतना जरूर कहूंगी, इंडस्ट्री में मुझसे से भी कहीं बेहतर और उम्दा कलाकार मौजूद हैं, वो भी ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ के काबिल हैं। खैर, सम्मान किसे मिलेगा और किसे नहीं? ये सरकार की ज्यूरी तय करती है। इसलिए इस विषय पर टीका-टिपण्णी मैं नहीं करूंगी।

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प्रश्नः उस क्षण को बताएं, जब पहली मर्तबा आपको अवॉर्ड मिलने की सूचना मिली?

उत्तर- सच कहूँ तो मुझे कतई अंदाजा नहीं था कि मुझे सरकार इस सम्मान के लायक समझेगी। शाम के करीब 6 बजे होंगे, मेरे एक जानने वाले का फोन आया और बोले बधाई हो, मैंने कहा किस बात की, तो बोले सूचना और प्रसारण मंत्री ने अपने ‘एक्स’ पर आपको ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार देने की घोषणा की है। तब मैंने सोचा कोई अफवाह होगी, लेकिन उसके बाद सभी न्यूज़ चैनलों पर खबरें चलने लगीं। लोगों के फोन आने शुरू हो गए। सच बताऊं तो मुझे एकाध घंटे तक कुछ पता ही नहीं चला, मुझे ऐसा लगा कि मैं सपना देख रही हूं।

  

प्रश्नः अवॉर्ड मिलने पर आपने देव आनंद साहब को याद किया?

उत्तर- बिल्कुल। सबसे पहले मेरे जेहन में उनका ही ख्याल आया। मैंने उस दिन भी मीडिया में कहा था कि अवॉर्ड की घोषणा होना मेरे लिए एक नहीं, बल्कि दोहरी खुशी जैसी है। क्योंकि उस दिन ‘देव साहब’ का जन्मदिन था। शायद ईश्वर ने मुझे उनके जन्मदिन के दिन ये तोहफ़ा देना मुकर्रर किया था। कुछ पल के लिए लगा कि ये सम्मान उनको ही दिया जा रहा है। देव साहब के योगदान को सिनेमा संसार कभी नहीं भूलेगा। 60-70 के दशक तक हमारा देश सादगी में जीता था। विदेशों में भारतीय स्टाइल को उन्होंने ही पहुंचाया था।

प्रश्नः आज के बदलते सिनेमा को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर- सबकुछ बदल चुका है। दोनों के मध्य एक दूसरे की तुलना कतई नहीं की जा सकती। दोनों का रंग-रूप और स्वरूप भिन्न हैं। सिनेमा का पुराना जमाना कैसा था, इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि पुरानी फिल्मों का जब रीमेक बनता है तो उसे बड़े चाव से दर्शक देखते हैं। गांव की संस्कृति, पुराना पहनावा, पुरानी भारतीयता अबकी फिल्मों में कही नहीं दिखती। अब जो फिल्में बनती हैं उनमे जब तक विदेशी लोकेशन न हो, दर्शकों को मजा नहीं आता। इसलिए इस बदलाव में सिनेमा से ज्यादा आधुनिक समाज ने अपनी भूमिका निभाई है।

प्रश्नः .....पर फिल्मों में जबरदस्ती की नग्नता और फूहड़ता को तो दर्शक भी पसंद नहीं करते?

उत्तर- इस बात की पक्षधर मैं भी नहीं हूं। इससे हमारी संस्कृति धूमिल होती है। ये पश्चिमी सभ्यता है जिसे हम कॉपी करते जा रहे हैं, सच बताऊं तो नहीं करना चाहिए, हमारे पास भी बताने और दर्शाने के लिए बहुत कुछ है। इन गंदे दृश्यों के वजह से ही दर्शकों का एक वर्ग आज सिनेमा से कट गया है। फिल्में साफ-सुथरी हों, पारिवारिक हों जिसे सभी मिल-बैठकर देखें। ‘नदिया पार’ ‘नगीना’ व राम लखन जैसी फिल्मों की अब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

-बातचीत में जैसा वहीदा जी ने डॉ. रमेश ठाकुर से कहा

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