हिमाचल में सामूहिक भोजन को कहते हैं ''धाम'', बनाने वाले कहलाते हैं ''बोटी''

By संतोष उत्सुक | Jul 18, 2018

बढ़ती संपन्नता और व्यवसायिक बुद्धि के कारण वैवाहिक आयोजन नए सांचों में ढल रहे हैं। खाने पीने की मेज़ पर दुनिया भर के स्वाद चखे जा रहे हैं। व्यंजनों की विविधता जितनी फैल रही है, खाना उतना ही बर्बाद होते भी देखा गया है। इधर दिलचस्पियों की धरती हिमाचल में वैवाहिक खानपान आज भी पारम्परिक एवं वैविध्यपूर्ण है। मैदान से पहाड़ चढ़े बदलावों ने पंजाब, उत्तराखंड या हरियाणा की सीमाओं से लगते हिमाचल में आयोजित हो रहे उत्सवों में अपना रंग जमा लिया है। पहाड़ों में अंदरूनी क्षेत्रों में अभी भी हिमाचली धाम संस्कृति आबाद है। 

एक हज़ार साल से ज़्यादा पुरानी इस परंपरा को राजाओं ने शुरू किया जिसमें शासक व शासित साथ बैठकर खाते थे। दो दर्जन से ज्यादा व्यंजन पकाए जाते थे जिसे राजाजी की धाम कहा जाता था। धाम में मुख्यत: चावल व दालें ही पकाई जाती रही हैं लेकिन संपन्नता ने धाम में नए व्यंजन पकवाए हैं। अब आम तौर पर आठ से दस डिशेज़ बनती हैं जिन्हें कुछ परिवार बढ़ा देते हैं। पूरे गांव को भी धाम दी जाती है। दोपहर बाद शुरू होने वाली धाम में हज़ारों लोग कुछ घंटों में ही खाना खा लेते हैं क्यूंकि बांटने वाले अनुभवी होते हैं। वे बार बार आते हैं और खाने वाले को उसकी भूख के अनुसार संयमित ढंग से परोसते हैं। बैठे बैठे लोग गपशप भी कर लेते हैं और इस तरह खाना व्यर्थ भी नहीं जाता। लोग दूर दूर से आते हैं इसलिए खाना गरम रखा जाता है, रात को भी पहुंचो तो भी गरम धाम हाज़िर। खाना आमतौर पत्तल पर ही परोसा जाता है और हाथ से खाया जाता है ताकि उंगलियां पूरा स्वाद मुंह तक पहुंचाएं।   

      

आज भी आम आदमी से लेकर, सभी मंत्री संतरी यहां तक कि मुख्य मंत्री व प्रदेश में पधारे अन्य ‘विशिष्ट’ जन भी ज़मीन पर बिछी पंकत पर एक साथ बैठ कर सामूहिक भोज का लुत्फ उठाते हैं। आपसी सद्भाव व मेलजोल की प्रतीक धाम, धार्मिक सहनशीलता के लिए अच्छा सबक है। इसे एकता का मेला कह सकते हैं।  

धाम में हालांकि सभी पकवान एक निश्चित क्रम से आने चाहिए मगर समय के साथ थोड़ा बहुत बदलाव कई जगह आ चुका है। पहले बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखते थे। पकाने व परोसने का कार्य बोटी ही करते थे। खाने वाले एक पंकत से उठ कर दूसरी पंकत में नहीं बैठ सकते थे। खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे। पहले बोटियों के समूह द्वारा धोती पहन कर खाना परोसा जाता था मगर कुछ क्षेत्रों में यह परंपरा छूट रही है। अब चूंकि जंगल कम हो रहे हैं साथ में मेहनती हाथों से पत्तों की प्लेट बनाने वाले भी इसलिए प्लास्टिक की घुसपैठ होना स्वाभाविक है। कड़छी से डाला जाने वाला देसी घी अब छूने के लिए भी उपलब्ध नहीं है। जीवन की हड़बड़ाहट व बिगड़ते अनुशासन ने बदलाव तो लाना ही था। पहले जूते उतार कर खाना खाते थे अब लोग जूतों समेत बैठ जाते हैं। शहरी क्षेत्रों में बफे भी लगाया जाता है मगर ग्रामीण अंचल में पारंपरिक संस्कृति से पलायन अभी शुरू नहीं हुआ है। 

यह सच है कि हिमाचली धाम कम खर्च में ज्यादा लोगों को खिलाती है। बदलाव की महफिल में जहां हमने अपनी कितनी ही सांस्कृतिक परम्पराओं को अंधेरा कोना दिखा दिया है वहीं हिमाचली खानपान की समृद्ध परम्परा बिगड़ते छूटते भी काफी हद तक बरकरार है। यह वाकई प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी। हिमाचल में आकर आवारगी करने वाले पर्यटक चाहें तो इन स्वादिष्ट व स्वास्थ्य रक्षक स्वादों का मज़ा ले सकते हैं।

-संतोष उत्सुक

प्रमुख खबरें

2 Trillion से 4 Trillion Economy तक का सफर, Hardeep Singh Puri बोले- Sports Ecosystem में आ रही बड़ी क्रांति

Nepal Floods: Mansarovar Yatra पर गए तमिलनाडु के 106 तीर्थयात्री फंसे, बचाव कार्य जारी

पनीर रबर जैसा क्यों हो जाता है? बस ये गलतियां सुधार लें, हर बार बनेगा नरम पनीर

Explained - क्या भारत हमेशा के लिए मुफ़्त UPI का खर्च उठा सकता है?