By प्रवीण गुगनानी | Jan 20, 2025
कश्मीर के सर्वाधिक नए जन सांख्यिकीय आंकड़ों पर नजर डाले तो स्वतंत्रता के समय वहां घाटी में 15% कश्मीरी पंडितों की आबादी थी जो आज 1% से नीचे होकर 0% की ओर बढ़ गई है। हाल ही के इतिहास में कश्मीर के ज.स. सांख्यिकी में यदि परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक खोजें तो वह एक दिन, यानि 19 जनवरी 1990 के नाम से जाना जाता है। कश्मीरी पंडितों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ देनें की इस घटना की यह भीषण और वीभत्स कथा 1989 में आकार लेनें लगी थी। पाकिस्तान प्रेरित और प्रायोजित आतंकवादी और अलगाववादी यहाँ अपनी जड़ें बैठा चुके थे। भारत सरकार आतंकवाद की समाप्ति में लगी हुई थी तब के दौर में वहां रह रहे ये कश्मीरी पंडित भारत सरकार के मित्र और इन आतंकियों और अलगाववादियों के दुश्मन और खबरी सिद्ध हो रहे थे। इस दौर में कश्मीर में अलगाववादी समाज और आतंकवादियों ने इस शांतिप्रिय हिन्दू पंडित समाज के विरुद्ध चल रहे अपनें धीमे और छदम संघर्ष को घोषित संघर्ष में बदल दिया। इस भयानक नरसंहार पर फारुक अब्दुल्ला की रहस्यमयी चुप्पी और कश्मीरी पंडित विरोधी मानसिकता केवल इस घटना के समय ही सामने नहीं आई थी। तब के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला अपने पिता शेख अब्दुल्ला के क़दमों पर चलते हुए अपना कश्मीरी पंडित विरोधी आचरण कई बार सार्वजनिक कर चुके थे। 19 जनवरी 1990 के मध्ययुगीन, भीषण और पाशविक दिन के पूर्व जमात-ए-इस्लामी द्वारा कश्मीर में अलगाववाद को समर्थन करने और कश्मीर को हिन्दू विहीन करनें के उद्देश्य से हिज्बुल मुजाहिदीन की स्थापना हो गई थी। इस हिजबुल मुजाहिदीन नें 4 जनवरी 1990 को कश्मीर के स्थानीय समाचार पत्र में एक एक विज्ञप्ति प्रकाशित कराई जिसमें स्पष्टतः सभी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने की धमकी दी गई थी। इस क्रम में उधर पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री बेनजीर नें भी टीवी पर कश्मीरियों को भारत से मुक्ति पानें का एक भड़काऊ भाषण दे दिया। घाटी में खुले आम भारत विरोधी नारे लगनें लगे। घाटी की मस्जिदों में अजान के स्थान पर हिन्दुओं के लिए धमकियां और हिन्दुओं को खदेड़ने या मार-काट देने के जहरीले आव्हान बजनें लगे। एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र अल-सफा ने भी इस विज्ञप्ति का
अलगाववादियों को कश्मीर प्रशासन का ऐसा वरद हस्त प्राप्त रहा कि बाद में उन्होंने कश्मीरी पंडित और श्रीनगर के न्यायाधीश एन. गंजू की भी ह्त्या की और प्रतिक्रया होनें पर 320 कश्मीरी स्त्रियों, बच्चों और पुरुषों की ह्त्या कर दी थी। ऐसी कितनी ही हृदय विदारक, अत्याचारी और बर्बर घटनाएं कश्मीरी पंडितों के साथ घटती चली गई और दिल्ली सरकार लाचार देखती भर रही और उधर श्रीनगर की सरकार तो जैसे खुलकर इन आतताइयों के पक्ष में आ गई थी। इस पृष्ठभूमि में हिजबुल और जेकेएलएफ़ का दुस्साहस बढ़ना स्वाभाविक ही था और वह निर्णायक तौर पर कश्मीरी पंडितों की दुकानों-घरों पर 24 घंटे में घाटी छोड़ देनें या मार दिए जानें की धमकी के नोटिस चस्पां करनें की हद तक बढ़ गया। इसके बाद जो हुआ वह एक दुखद, क्षोभजनक, वीभत्स, दर्दनाक और इतिहास को दहला देनें वाले काले अध्याय के रूप में सामनें आया।
अन्ततोगत्वा वही हुआ जो वहां के अलगाववादी, आतंकवादी हिजबुल और जेकेएलऍफ़ चाहते थे। कश्मीरी पंडित पूर्व की घटनाओं, घरों पर नोटिस चिपकाए जानें और बेहिसाब कत्लेआम से घबराकर 19 जन. 1990 को हिम्मत हार गए। फारुख अब्दुल्ला के कुशासन में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर आकर विजयी हुआ और इस दिन साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडित अपनें घरों, दुकानों, खेतों, बागो और संपत्तियों को छोड़कर विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खानें को मजबूर हो गए। कई कश्मीरी पंडित अपनों को खोकर गए, अनेकों अपनों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए, और हजारों तो यहाँ से निकल ही नहीं पाए और मार-काट डाले गए। विस्थापन के बाद का जो दौर आया वह भी किसी प्रकार से आतताइयों द्वारा दिए गए कष्टों से कम नहीं रहा कश्मीरी पंडितों के लिए। वे सरकारी शिविरों में नारकीय जीवन जीनें को विवश हुए। हजारों कश्मीरी पंडित दिल्ली, मेरठ, लखनऊ जैसे नगरों में सनस्ट्रोक से इसलिए मृत्यु को प्राप्त हो गए क्योंकि उन्हें गर्म मौसम में रहनें का अभ्यास नहीं था।
40 वर्ष पूर्ण हुए किन्तु कश्मीरी पंडितों के घरों पर हिजबुल द्वारा नोटिस चिपकाए जानें से लेकर विस्थापन तक और विस्थापन से लेकर आज तक के समय में मानवाधिकार, मीडिया, सेमीनार, तथाकथित बुद्धिजीवी, मोमबत्ती बाज और संयुक्त राष्ट्र संघ सभी इस विषय में कमोबेश बोले या नहीं यह तो नहीं पता किन्तु इन कश्मीरी पंडितों की समस्या का कोई ठोस हल अब तक नहीं निकला यह समूचे विश्व को पता है ये सच से मूंह मोड़ने और शुतुरमुर्ग होनें का ही परिणाम है कि कश्मीरियों के साथ हुई इस घटना को शर्मनाक ढंग से स्वेक्च्छा से पलायन बताया गया! इस घटना को राष्ट्रीय मनावाधिकार आयोग ने सामूहिक नर संहार माननें से भी इंकार किया; ये घोर अन्याय और तथ्यों की असंवेदी अनदेखी है!! नरेन्द्र मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास हेतु प्रतिबद्ध है और वह इस प्रतिबद्धता को दोहराती रही है।
- प्रवीण गुगनानी
विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार, राजभाषा