By अनन्या मिश्रा | Apr 02, 2026
असम में विधानसभा चुनावों की तारीख का ऐलान हो चुका है। 126 सीटों वाली विधानसभा के लिए 09 अप्रैल को वोटिंग होगी। वहीं 04 मई को नतीजे जारी किए जाएंगे। इस चुनाव में जीत के लिए सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और विपक्षी दल अपनी रणनीति के साथ एक्टिव हो गए हैं। बता दें कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ाया है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा राज्य में अपनी जड़ों को मजबूत रख पाती है।
साल 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार असम राज्य में जीत का स्वाद चखा था। इस दौरान भाजपा 10 सीटों पर जीत पाने में सफल रही थी। लेकिन यह जीत भाजपा को राम मंदिर आंदोलन के दौर में मिली थी। हालांकि भाजपा सरकार नहीं बना सकी थी। वहीं साल 1996 के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए खास नहीं रहा, क्योंकि इस समय तक राम मंदिर आंदोलन ठंडे बस्ते में जा चुका था और पार्टी को सिर्फ 4 सीटें मिली थीं।
असम राज्य में साल 2001 में 8, 2006 में 10 और 2011 में 5 सीटों को जीतकर भारतीय जनता पार्टी अपने अच्छे दिनों का इंतजार करती रही। फिर साल 2016 में असम में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोट जाने की एक वजह 84 फीसदी टर्नआउट रहा। इस टर्नआउट को भाजपा के खाते में लाने में हेमंत बिस्वा सरमा की भूमिका अहम रही। इस समय पार्टी ने 60 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। इस दौरान पार्टी ने क्षेत्रीय प्रतीकों, स्थानीय पहचान और मुखर हिंदुत्व की जगह 'क्षेत्रीय हिंदुत्व' के अनूठे मिश्रण से राज्य में पहली बार सरकार बनाई।
इसके बाद साल 2016 से 2021 तक सर्वानंद सोनोवाल और फिर हेमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने घुसपैठ और विकास के मुद्दों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। वहीं साल 2021 में हिमंत बिस्वा सरमा ने नेतृत्व में एक बार फिर बीजेपी ने जीत हासिल की थी। इस दौरान बुनियादी ढांचे के विकास और कड़े प्रशासनिक फैसलों पर जोर दिया गया था। ऐसे में एक बार फिर भाजपा साल 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस चुकी है।
हालांकि माना जा रहा है कि इस बार एनडीए को सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन पार्टी के पास कई ऐसी चीजें हैं, जिनका फायदा वह अपने पक्ष में उठा सकती है। इनमें से सबसे प्रमुख बात यह है कि सत्ता दल को बिखरे हुए विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है। वहीं राज्य सरकार मतदाताओं की पसंद को और कल्याणकारी योजनाओं को सत्ताधारी दल के पक्ष में मोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है।