By नीरज कुमार दुबे | Oct 23, 2026
फ्रांस इन दिनों गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के खिलाफ जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। महंगाई, बढ़ती ऊर्जा कीमतों, वेतन में ठहराव और बदहाल सार्वजनिक सेवाओं से नाराज श्रमिकों और छात्रों के आंदोलन ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले सप्ताह प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा, आगजनी और लूटपाट के बाद अब शनिवार को फिर बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन की आशंका है। हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि कारोबारियों, संग्रहालयों और कला आयोजनों तक को बंद रखने की तैयारी करनी पड़ रही है। मैक्रों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ हिंसा पर काबू पाना नहीं, बल्कि उस जनाक्रोश को थामना है, जो उनकी सरकार की नीतियों और नेतृत्व पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है।
मैक्रों ने छात्र प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल की है, लेकिन UNEF ने स्पष्ट किया है कि प्रदर्शन नहीं रोके जाएंगे। संगठन ने राष्ट्रपति पर विरोध के अधिकार को कुचलने और गणतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। यह टकराव बताता है कि सरकार के सामने केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि जनता के एक हिस्से का राजनीतिक विश्वास बनाए रखने की भी चुनौती है।
मैक्रों ने हिंसा के लिए अतिवामपंथी और उग्रवादी समूहों को जिम्मेदार ठहराया है, हालांकि वामपंथी दल फ्रांस अनबाउड ने इन आरोपों को खारिज किया है। राष्ट्रपति ने कुछ प्रदर्शनों को अवैध बताते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। साथ ही ट्रेड यूनियनों के वैध प्रदर्शनों को अनुमति देने, लेकिन उनके मार्ग बदलने की संभावना भी जताई गई है। इस बीच, फ्रांस के प्रमुख श्रमिक संगठन CFDT की महासचिव मैरीलीज लियोन ने चेताया है कि प्रतिबंधों से गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ सकता है। उनका तर्क है कि जनता की नाराजगी दूर करने के लिए ठोस प्रस्ताव चाहिए, न कि यह तय करने की कोशिश कि किसे विरोध करने का अधिकार है।
हम आपको याद दिला दें कि पिछले सप्ताह हुई हिंसा के बाद सरकार की चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि शांतिपूर्ण विरोध के साथ-साथ हिंसक घटनाएं पहले की तरह व्यापक रूप ना ले लें। फ्रांस में 17 अक्टूबर को पांच लाख से अधिक लोग विरोध प्रदर्शन करने सड़कों पर उतरे थे। हालांकि, शांतिपूर्ण तरीके से हुए इन ऐतिहासिक प्रदर्शनों की चर्चा लूटपाट की घटनाओं पर मीडिया के व्यापक कवरेज के कारण दबकर रह गई। फ्रांस के कानून मंत्री के अनुसार, शनिवार से अब तक लगभग 2,700 गिरफ्तारियां हुई हैं। पेरिस और अन्य शहरों में लगाए गए रात्रिकालीन कर्फ्यू के बाद कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन दोबारा हिंसा भड़कने की आशंका खत्म नहीं हुई है।
रिपोर्टों के मुताबिक मार्सेई और लियोन में शनिवार के लिए प्रस्तावित सभी प्रदर्शनों पर स्थानीय अधिकारियों ने प्रतिबंध लगाया है। मार्सेई के वाणिज्य मंडल ने कारोबारियों से दुकानें बंद रखने का आग्रह किया है। अंतरराष्ट्रीय कला मेला आर्ट बेसल पेरिस को भी सुरक्षा चिंताओं के कारण सप्ताहांत में बंद रखने की घोषणा की गई है। लौवर संग्रहालय और फोंडेशन लुई वितों के भी शनिवार को बंद रहने की योजना है। ये कदम बताते हैं कि अशांति का असर अब सड़कों से निकलकर पर्यटन, व्यापार और फ्रांस की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा तक पहुंच चुका है।
उधर, मध्य फ्रांस के ओरलियॉं में भी तनाव की आशंका है, जहां धुर दक्षिणपंथी नेशनल रैली की बैठक के विरोध में हजारों लोगों के जुटने की संभावना जताई गई है। इस प्रकार संकट केवल सरकार बनाम प्रदर्शनकारी का नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बीच आमने-सामने के टकराव का भी रूप ले सकता है।
देखा जाये तो इस उथल-पुथल की जड़ में गंभीर आर्थिक असंतोष है। बढ़ती ऊर्जा कीमतें, घरेलू बजट पर दबाव, वेतन को लेकर असंतोष और सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट ने श्रमिकों तथा युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक खर्च पर नियंत्रण जरूरी है, क्योंकि बढ़ता सरकारी कर्ज और उधारी की लागत राजकोषीय गुंजाइश सीमित कर रहे हैं।
दूसरी ओर, वित्तीय बाजार इस संकट को गंभीरता से ले रहे हैं। फ्रांस और जर्मनी के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरों के अंतर में वृद्धि निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाती है। 22 अक्टूबर को फ्रांस की 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड लगभग 5.14 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो जुलाई 2002 के बाद का उच्चतम स्तर बताया गया। यह संकेत है कि राजनीतिक अस्थिरता और बजट संबंधी चिंताओं का असर अब सरकारी उधारी पर भी पड़ रहा है। रेटिंग एजेंसी मूडीज की 23 अक्टूबर को फ्रांस की साख पर संभावित कार्रवाई भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। फ्रांस की रेटिंग में गिरावट या नकारात्मक दृष्टिकोण कायम रहने से निवेशकों की चिंता बढ़ सकती है।
साथ ही इस संकट का असर सिर्फ फ्रांस की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी आंच पूरी यूरोपीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था तक पहुंच सकती है। अगर मैक्रों सरकार जनता के गुस्से को शांत करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहती है, तो सरकार और लोगों के बीच अविश्वास और गहरा होगा। वहीं, बढ़ती उधारी और आर्थिक दबाव के कारण रक्षा, विकास और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च करना भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है। यूरोपीय संघ की प्रमुख शक्ति होने के कारण फ्रांस में लंबे समय तक जारी अस्थिरता का असर यूरोप के वित्तीय बाजारों और आर्थिक नीतियों पर भी पड़ेगा। दूसरी ओर, प्रदर्शनों पर सख्ती और प्रतिबंध आंदोलन को और भड़का सकते हैं, जबकि हिंसक समूहों पर नियंत्रण न होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। फ्रांस का येलो वेस्ट आंदोलन पहले भी दिखा चुका है कि जब जनता को लगता है कि उसकी आर्थिक परेशानियों की अनदेखी हो रही है और सत्ता उसकी आवाज नहीं सुन रही, तो असंतोष एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
बहरहाल, मैक्रों के सामने चुनौती सिर्फ शनिवार के प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की नहीं है। असली परीक्षा यह है कि क्या उनकी सरकार सुरक्षा व्यवस्था बहाल करते हुए महंगाई, वेतन, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े सवालों का विश्वसनीय समाधान दे सकती है। केवल प्रतिबंधों और गिरफ्तारी के सहारे व्यवस्था कायम करने की कोशिश विरोध को टाल सकती है, समाप्त नहीं कर सकती। फ्रांस की सड़कों पर उठता यह उबाल अब सरकार की राजनीतिक साख, देश की आर्थिक क्षमता और यूरोप की स्थिरता, तीनों की परीक्षा बन चुका है।
-नीरज कुमार दुबे