केजी से पीजी तक फ्री एजुकेशन और मुफ्त इलाज- कब साकार होगा यह सपना ?

By संतोष पाठक | Jan 22, 2025

भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर 21 जनवरी 2025 को जारी किए गए अपने दूसरे संकल्प पत्र में यह वादा किया है कि दिल्ली की सत्ता में आने पर पार्टी जरूरतमंद छात्रों को केजी से पीजी तक फ्री शिक्षा देगी। इस पर पलटवार करते हुए आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि दिल्ली की सत्ता में आने पर भाजपा मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज बंद कर देगी। 

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर देखा जाए तो फ्री एजुकेशन का यह मसला अपने आप में बहुत ही गंभीर मसला है और दुर्भाग्य से इस परिस्थिति के लिए इस देश के सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार है। आज कोई भी राष्ट्रीय या बड़ा क्षेत्रीय दल सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली के लिए अपने आपको जिम्मेदार से मुक्त नहीं बता सकता है क्योंकि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने कभी न कभी सत्ता का सुख जरूर भोगा है। गठबंधन राजनीति के दौर में, देश की राजनीति में सक्रिय ज्यादातर राजनीतिक दल या तो केंद्र की सत्ता में भागीदार रहे हैं या किसी ना किसी राज्य में सरकार चला चुके हैं या वर्तमान में भी चला रहे हैं। 

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वास्तविकता तो यह है कि भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज जैसे बेसिक दायित्वों से लगभग सभी सरकारों ने पल्ला झाड़ लिया है। मुफ्त शिक्षा में कई तरह की शर्तें लगा दी गईं हैं। सरकारी स्कूलों की हालत हर गुजरते दिन के साथ खराब होती जा रही है। देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में जब साइंस और मैथ्स जैसे विषयों के अध्यापकों की भारी कमी है तो देश के अन्य राज्यों के स्कूलों का अंदाजा आप लगा सकते हैं। देशभर के सरकारी स्कूलों में मिलने वाली ड्रेस की गुणवत्ता और किताबों पर लगातार सवाल उठते रहते हैं। एनसीईआरटी तो समय पर किताब छपवाना ही भूल गई है। मिड डे मील ने तो स्कूलों में पढ़ाई की हालत और ज्यादा खराब कर दी है लेकिन इसके विकल्प की भी कोई तलाश नहीं की जा रही है। 

सरकारी अस्पतालों की हालत भी कितनी दयनीय हो चुकी है, यह सब जानते हैं। दिल्ली के एम्स जैसे अस्पताल में भी ऑपरेशन की डेट कई-कई साल बाद मिलने की खबरें लगातार आती हैं। एम्स और सफदरजंग जैसे अस्पतालों के इर्द-गिर्द खुल चुके सैकडों प्राइवेट लैब्स यह बताने के लिए काफी है कि इन दोनों सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की आस में आने वाले लोगों को हजारों रुपए खर्च कर बाहर से ही जांच करवाना पड़ता है। सरकारी अस्पताल में पूरी दवाई मिल जाए, इसकी उम्मीद तो अब लोग वर्षों पहले ही छोड़ चुके हैं लेकिन अब उचित जांच और उचित इलाज की उम्मीद भी दम तोड़ती नजर आ रही है। जब दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की हालत इतनी खराब है तो आप देश के अन्य राज्यों के सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा का अंदाजा बखूबी लगा सकते हैं। 

विडंबना देखिए कि, सरकारों ने इस बारे में अब सोचना तक छोड़ दिया है, कार्रवाई के बारे में तो भूल ही जाइए। आंकड़े बताते हैं कि देश में डॉक्टरों की बड़े पैमाने पर कमी है लेकिन एमबीबीएस जैसे बेसिक डॉक्टरी की पढ़ाई पर भी सरकार का फोकस नहीं है , जिससे इस कमी को दूर किया जा सकता है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल 13 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने नीट परीक्षा को क्वॉलिफाई किया था लेकिन देश में एमबीबीएस की सीटें एक लाख 8 हजार के लगभग ही है। इसमें से भी सरकारी सीटें सिर्फ 56 हजार के लगभग ही है। प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एक साल की फीस एक से डेढ़ करोड़ के बीच है यानी एमबीबीएस की चार सालों की पढ़ाई के लिए प्राइवेट कॉलेजों में 4 करोड़ से लेकर 6 करोड़ तक सिर्फ फीस ही देनी होगी। अब इसमें बाकी खर्चों को भी जोड़ लीजिए। सोचिए, इस हालत में भला मिडिल क्लास का कौन सा परिवार अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के बारे में सोच सकता है ? 

सरकारों ने लोगों को मुफ्त और उचित इलाज नहीं दे पाने की अपनी नाकामी को छिपाने के लिए बीमा योजनाओं का सहारा लेना शुरू कर दिया है। जिन योजनाओं का फायदा आम लोगों से ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों को ही हो रहा है। 

फ्री, फ्री और रेवड़ियों के इस दौर में सरकारों ने अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है। यह अपने आप में सबसे बड़ी चिंता का विषय है। लेकिन कभी न कभी तो इस देश के बड़े तबके खासतौर से लाभार्थी वर्ग के लोगों को आगे बढ़कर सरकारों से और राजनीतिक दलों से यह कहना ही होगा कि, "आप हमें बेवकूफ बनाना बंद कीजिए। सरकारी स्कूलों एवं कॉलेजों की हालत ठीक कीजिए, सरकारी अस्पतालों की हालत ठीक कीजिए, अध्यापकों और डॉक्टरों की कमी को दूर कीजिए, बिना किसी भेदभाव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और सरकारी अस्पतालों में जाने वाले सभी लोगों के लिए मुफ्त इलाज की व्यवस्था को हर कीमत पर और हर हाल में सुनिश्चित कीजिए।" 

- संतोष पाठक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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