By अभिनय आकाश | Oct 06, 2026
देश में व्यापार को आसान बनाने और टैक्सपेयर्स की सहूलियत के लिए सरकार GST 2.0 में बदलाव की तैयारी कर रही है। 8 अक्टूबर को होने वाली GST काउंसिल की बैठक में ई-वे बिल के नियमों को ढीला करने, गिरफ्तारी के डर को खत्म करने और सालों से फंसे हजारों करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को जारी करने जैसे बढ़े बढ़े प्रस्तावों पर मुहर लग सकती है। GST काउंसिल बुधवार को होने वाली अपनी बैठक में कई ऐसे प्रस्तावों पर विचार करेगी, जिनमें ई-वे बिल की ज़रूरतों से जुड़े नियमों को आसान बनाना और GST कानून के तहत गिरफ़्तार करने की शक्तियों को हटाना शामिल है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ET को बताया कि ये प्रस्ताव टैक्सपेयर से जुड़े सभी पहलुओं - जैसे रजिस्ट्रेशन, रिटर्न और रिफ़ंड से लेकर इनपुट टैक्स क्रेडिट और कानूनी विवाद - को कवर करते हैं। ये प्रस्ताव ज़्यादा कागज़ी कार्रवाई वाले अनुपालन (compliance) से हटकर ऑटोमेटेड, डेटा-आधारित और जोखिम-आधारित प्रशासन की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं।
पिछले सितंबर में जीएसटी दरों के व्यापक युक्तिकरण (rate rationalisation) के साथ इस बड़े सुधार की शुरुआत हुई थी, जिसने कारोबारियों और जीएसटी प्रणाली के बीच के तालमेल को पूरी तरह बदल दिया। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को आसान बनाने का है, जिससे कंपनियों की फंसी हुई पूंजी मुक्त होगी और उद्योग जगत को एक अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मिलेगा। जीएसटी काउंसिल प्लांट, मशीनरी और इनपुट सेवाओं पर चुकाए गए टैक्स को 5 वर्षों में मासिक किस्तों के रूप में वापस (रिफंड) करने पर विचार करेगी। वर्तमान में कंपनियां आईटीसी के तहत इस पूरी रकम की भरपाई नहीं कर पाती थीं। पहले जिन व्यावसायिक इनपुट पर क्रेडिट ब्लॉक था, अब उसका दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव है।
कर्मचारियों का स्वास्थ्य और जीवन बीमा।
आउटडोर कैटरिंग।
दूरसंचार (टेलीकॉम) टावर और कारखानों के बाहर बिछाई गई पाइपलाइन।
नष्ट किए जाने वाले एक्सपायर्ड उत्पाद और कुछ मुफ्त नमूने (free samples)।
13 सीटों तक के वाहन, उनका बीमा, रखरखाव और वाहनों की लीजिंग या हायरिंग।
5% टैक्स स्लैब में आने वाले कई उत्पाद (जैसे खाद्य पदार्थ, फार्मा, कपड़ा और इलेक्ट्रिक वाहन) इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (कच्चे माल पर ज्यादा टैक्स और तैयार माल पर कम टैक्स) का सामना कर रहे हैं। इसके कारण हजारों करोड़ रुपये का आईटीसी अटका हुआ है। इस पूंजी के जारी होने से उद्योग इसे फिर से पूंजीगत व्यय (Capex) के रूप में निवेश कर सकेंगे। टेलीकॉम टावरों और पाइपलाइनों पर क्रेडिट मिलने से दूरसंचार, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, गैस वितरण और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्रों के भारी खर्च में बड़ी राहत मिलेगी।
पहले यदि कोई सप्लायर टैक्स जमा नहीं करता था, तो उसका खामियाजा वास्तविक खरीदार (genuine buyer) को अपना क्रेडिट गंवाकर भुगतना पड़ता था। यह जीएसटी में विवादों का सबसे बड़ा कारण रहा है। अब यदि सौदा वैध (bona fide) है, तो खरीदार को आईटीसी रखने की अनुमति दी जाएगी और टैक्स वसूली सीधे डिफॉल्ट करने वाले सप्लायर से की जाएगी। चूंकि अब इनवॉइस-टू-इनवॉइस मिलान से खरीदार और विक्रेता का डेटा जुड़ा हुआ है, इसलिए सिस्टम फर्जी या बेमेल क्रेडिट को उसके स्रोत पर ही पकड़ सकता है।
ऑटोमेटेड और सरल रिफंड प्रक्रिया
अब टैक्सपेयर्स को अधिकारियों द्वारा मैन्युअल जांच के लिए अलग से दस्तावेज अपलोड करने की आवश्यकता नहीं होगी। कस्टम्स, आरबीआई (RBI) के एक्सपोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम और अन्य सरकारी प्रणालियों पर पहले से उपलब्ध डेटा को सीधे रिफंड प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा।
IT/ITeS सेक्टर को बड़ी राहत मिल सकती है; काउंसिल विदेशी ब्रांच ऑफिस को की गई सप्लाई को एक्सपोर्ट मानने पर विचार करेगी, जिससे ऐसे ट्रांज़ैक्शन ITC के लिए योग्य हो जाएंगे। विदेशी खरीदारों को बेचे गए लेकिन यहीं किसी स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) में डिलीवर किए गए सामान को भी एक्सपोर्ट माना जा सकता है, अगर पेमेंट विदेशी मुद्रा में किया जाए। GST नियमों को एक्सपोर्ट के पेमेंट मिलने से जुड़े RBI के नियमों के साथ भी मिलाने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित सुधारों का मकसद कम वैल्यू वाले मामलों में कंप्लायंस और कानूनी विवाद को कम करना भी है। सूत्रों ने बताया कि ₹10,000 से कम रकम वाले मामलों में कोई 'शो-कॉज़ नोटिस' जारी नहीं किया जाएगा और यह बदलाव पेंडिंग मामलों पर भी लागू होगा। उन्होंने बताया कि रिटर्न में अंतर के कारण हर साल लगभग 95,000 नोटिस जारी होते हैं, जबकि ऐसे नोटिस से होने वाली रिकवरी कुल रकम का सिर्फ़ 0.08% होती है। ₹5 करोड़ तक के टर्नओवर वाले और सिर्फ़ अनरजिस्टर्ड ग्राहकों को सप्लाई करने वाले छोटे बिज़नेस को सालाना रिटर्न फाइल करने और तिमाही टैक्स पेमेंट करने की इजाज़त दी जा सकती है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत ऑटोमेटेड रूट के लिए योग्य आवेदकों का रजिस्ट्रेशन तीन वर्किंग दिनों के भीतर हो जाएगा; इस प्रक्रिया में पहले से ही 61% रजिस्ट्रेशन शामिल हैं। ट्रेड नेम, डायरेक्टर या पार्टनर और अतिरिक्त बिज़नेस एड्रेस में बदलाव भी ऑटोमैटिक प्रोसेसिंग के दायरे में आ सकते हैं।
10,000 रुपये से कम के मामलो में कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। यह नया नियम पेंडिंग मामलों पर भी लागू करने का प्रस्ताव है। जिन छोटे कारोबारियों का सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपये तक है और वे सिर्फ बिना-रजिस्टर्ड ग्राहकों को ही सामान बेचते है, उन्हें अब सालाना रिटर्न भरने और हर तिमाही टैक्स जमा करने की छूट मिल सकती है। कारोबार का रजिस्ट्रेशन आसान करने का भी प्रस्ताव है। ट्रेड नेम में बदलाव, नए बिजनेस एड्रेस जोड़ने जैसे बदलाव ऑटोमैटिक मंजूर हो सकते हैं