By अभिनय आकाश | Sep 29, 2026
मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक ऐसी कूटनीतिक हलचल हुई है जिसने पूरी दुनिया के शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। अबू धाबी में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान के बीच हुई यह आमने-सामने की बैठक महज एक औपचारिक मुलाक़ात नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। यह हाई-प्रोफ़ाइल बैठक ठीक ऐसे समय में हुई है जब पूरा मध्य पूर्व बारूद के ढेर पर बैठा है। जहाँ एक तरफ ईरान की बढ़ती आक्रामकता और हूथी विद्रोहियों के हमले हैं, तो दूसरी तरफ गाज़ा संकट और क्षेत्र में बनते नए सैन्य गठबंधन। इन भारी दबावों और तनावों के बीच, इज़राइल और यूएई का सार्वजनिक मंच पर अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मज़बूत करना यह साफ़ संदेश देता है कि पुरानी कूटनीतिक दीवारें अब नए सुरक्षा समझौतों में तब्दील हो चुकी हैं। तेज़ी से करवट लेती यह क्षेत्रीय सुरक्षा सिर्फ़ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर भारत के सामरिक और आर्थिक हितों पर भी पड़ने जा रहा है। आख़िर मध्य पूर्व के इस बिसात पर कौन सा नया खेल शुरू हो चुका है, और अबू धाबी में बंद कमरों के भीतर क्या तय हुआ? आइए इस वीडियो में समझते हैं इस ऐतिहासिक मुलाक़ात की पूरी इनसाइड स्टोरी।
कई संदेशों वाली एक बैठक
इस बैठक का महत्व इस बात में है कि इज़राइल और UAE अब अपने रणनीतिक सहयोग को लोगों की नज़रों से छिपाकर नहीं रख रहे हैं। 2020 में UAE के अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से दोनों देशों के बीच व्यापार, टेक्नोलॉजी, टूरिज़्म, इंटेलिजेंस और रक्षा-संबंधी सहयोग बढ़ा है। हालाँकि, नेतन्याहू का अबू धाबी का दौरा, खासकर इलाके में अस्थिर माहौल के बीच, एक मज़बूत राजनीतिक और सुरक्षा संदेश देता है। पहला संदेश ईरान के लिए है। खाड़ी के प्रमुख आर्थिक और कमर्शियल हब में से एक होने के बावजूद, UAE को हाल के वर्षों में सुरक्षा खतरों का सामना करना पड़ा है, जिसमें यमन में ईरान-समर्थित हूती आंदोलन द्वारा किए गए हमले भी शामिल हैं। इज़राइल के साथ सहयोग का सार्वजनिक प्रदर्शन यह बताता है कि अबू धाबी अलग-थलग नहीं है और उसे इलाके की सबसे सक्षम सैन्य और इंटेलिजेंस ताकतों में से एक के साथ सुरक्षा साझेदारी हासिल है। दूसरा संदेश उन दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए है जो मध्य पूर्व में नए गुट और गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह बैठक UAE को एक स्वतंत्र रणनीतिक खिलाड़ी के तौर पर दिखाती है। एक ऐसा देश जो अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय रुतबे को बनाए रखते हुए इज़राइल के साथ खुलकर काम करने को तैयार है।
बैठक का समय अहम है क्योंकि इससे इज़राइली और अमीराती नेतृत्व के बीच तनाव की अटकलों को खारिज किया जा सकता है। इज़राइल में राजनीतिक बहस से जुड़ी ऐसी खबरें और संकेत थे कि दोनों के बीच मतभेद हैं, लेकिन इस बैठक से ऐसे दावों को दरकिनार किया जा सकता है। नेतन्याहू और MBZ का शीर्ष स्तर पर बातचीत करना इस बात को पुख्ता करता है कि इज़राइल-UAE चैनल सक्रिय और महत्वपूर्ण बना हुआ है।
इस बैठक का मुख्य मकसद क्षेत्रीय सुरक्षा है। ईरान के सहयोगी हथियारबंद समूहों का नेटवर्क जिसमें लेबनान का हिज़्बुल्लाह और यमन के हूथी शामिल हैं—इज़राइल, खाड़ी देशों और अमेरिका के लिए चिंता का एक बड़ा विषय बन गया है। हूती के मिसाइल और ड्रोन हमलों के पिछले अनुभवों को देखते हुए, UAE के लिए एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी साझा करने और खतरे की पहले से चेतावनी देने की क्षमताएं बहुत अहम हो गई हैं। इज़राइल के पास ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और हवा से होने वाले अन्य खतरों का मुकाबला करने का बेहतर अनुभव है। आने वाले खतरों की पहचान करने और उन पर नज़र रखने में इज़राइल की खुफिया और रडार क्षमताएं UAE के लिए बहुत काम की साबित हो सकती हैं। इसलिए, नेतन्याहू की इस यात्रा का मकसद शायद अपनी ताकत का अहसास कराना है न सिर्फ़ हूतियों के खिलाफ़, बल्कि खाड़ी देशों पर दबाव बनाने की ईरान की किसी भी बड़ी कोशिश के खिलाफ़ भी।