By संतोष कुमार पाठक | Feb 18, 2026
20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 60 मंत्री और 500 के लगभग वैश्विक एआई अग्रणी भारत की राजधानी दिल्ली में अपनी तरह के पहले वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर अपनी नई भूमिका की तलाश कर रहा भारत, दुनिया के सबसे बड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इवेंट 'इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026' की मेजबानी कर रहा है। यह पहली बार है जब एआई पर इस स्तर का वैश्विक सम्मेलन ग्लोबल साउथ में आयोजित किया जा रहा है। सरकार ने इसे लेकर दावा भी किया है कि इस शिखर सम्मेलन में राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख, मंत्रीगण, वैश्विक प्रौद्योगिकी अग्रणी, प्रख्यात शोधकर्ता, बहुपक्षीय संस्थान और उद्योग जगत के हितधारक एक साथ आएंगे और समावेशी विकास को बढ़ावा देने, सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करने और सतत विकास को सक्षम बनाने में एआई की भूमिका पर विचार-विमर्श करेंगे।
राजधानी दिल्ली स्थित भारत मंडपम में अभूतपूर्व वैश्विक भागीदारी के साथ चल रहा इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 अपने आप में यह बताता नजर आ रहा है कि भारत आज की तारीख में वैश्विक एआई संवाद का नेतृत्व कर रहा है और आने वाले दिनों में कोई भी देश भारत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकता। क्योंकि इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 वैश्विक एआई एजेंडा को आकार देने के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में भारत की भूमिका को मजबूत करता है।
दुनियाभर के दिग्गजों के साथ-साथ इस समिट में भारत के भी कई विश्विद्यालय, कॉलेज और स्टार्टअप्स शामिल हो रहे हैं। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने तो एआई को 5वीं औद्योगिक क्रांति की संज्ञा देते हुए यहां तक दावा किया कि, 3 लाख से ज़्यादा छात्रों और रिसर्चर्स ने रजिस्ट्रेशन किया है। देशभर के कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और स्टार्टअप ने समिट में एआई मॉडल्स की प्रदर्शनी भी लगाई गई है। जाहिर सी बात है कि इस समिट के जरिए जहां चर्चा भारत के युवाओं की बौद्धिक क्षमता और टैलेंट की होनी चाहिए थी, वहीं गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने पूरी दुनिया के सामने भारत को शर्मसार कर दिया है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन में बने रोबोट को अपना इनोवेशन बताकर दिल्ली एआई समिट में पेश कर दिया। मीडिया से बात करते हुए एक प्रोफेसर ने बड़े ही गर्व के साथ चार पैरों वाले इस रोबोडॉग की खासियत भी कैमरे पर बताई। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की इस प्रतिनिधि के हाव-भाव देखने लायक है।इसका नाम 'ओरियन' बताते हुए उन्होंने दावा किया कि इसे यूनिवर्सिटी के 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' ने तैयार किया है। सरकारी चैनल सहित देश के कई मीडिया संस्थानों ने इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर जोर-शोर से चलाया और छापा भी। लेकिन चीन की तरफ से बयान आते ही पूरा मामला पलट गया। इसके बाद यह पता लगा कि वास्तव में यह गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा नहीं बल्कि चीन की एक कंपनी द्वारा बनाया गया एआई-पावर्ड रोबोटिक डॉग है, जो अपनी फुर्ती और एडवांस सेंसर्स के लिए दुनियाभर में मशहूर है।
विवाद बढ़ने और सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल होने के बाद गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने भी अपने झूठ को स्वीकार कर लिया। यूनिवर्सिटी ने एक लंबा चौड़ा बयान जारी कर यह स्वीकार किया कि यह रोबोडॉग उन्होंने नहीं बनाया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक बार फिर से झूठ का सहारा लेते हुए यह भी कह दिया कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इसे बनाने का दावा नहीं किया। जबकि उनके प्रोफेसर का वायरल वीडियो ही उनके झूठ का पर्दाफाश कर रहा है।
ऐसे में एक बार फिर से सरकार के विजन, नीति और फंड की व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार प्राइवेट विश्विद्यालय और कॉलेजों के सहारे देश में नई, बड़ी और स्पेशल रिसर्च नहीं करवा सकती क्योंकि इनकी भूमिका और इनके कामकाज का पूरा ढांचा ही संदिग्ध है। एडमिशन से लेकर क्लास और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी कई बार गहरे सवाल खड़े हो चुके हैं। भारत सरकार रिसर्च, इनोवेशन और पेटेंट फाइल करने के नाम पर निजी विभविद्यालयों को जो मोटा फंड देती है, उसकी न्यायिक जांच करवाने का भी समय आ गया है।
दरअसल, यह बिल्कुल सही समय आ गया है कि सरकार पहले की तरह सरकारी स्कूल, कॉलेज और विश्विद्यालयों में शिक्षा हासिल कर रही प्रतिभाओं को हर तरह से उभारने में मदद करें। इन संस्थानों में फीस और लालफीताशाही दोनों कम होनी चाहिए, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और करप्शन पर हर हाल में लगाम होनी चाहिए।
- संतोष कुमार पाठक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं