हिंदी पत्रकारिता के प्रति विद्यार्थी जी की सेवा और समर्पण आजीवन रही बेमिसाल

By श्याम सुंदर भाटिया | Mar 25, 2022

गणेश युगीन पत्रकारिता हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल माना जाता है। हिंदी पत्रकारिता के पितामह गणेश शंकर विद्यार्थी के बताए या दिखाए रास्ते पर चलकर ही पत्रकारों ने देश और समाज की सेवा की अलख जगाई है। प्रताप के पहले ही अंक में उन्होंने ‘प्रताप की नीति’ नामक लेख में राष्ट्रीय पत्रकारिता की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे आज भी आदर्श पत्रकारिता के घोषणा पत्र के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने लिखा- समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है। हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। हम अपने भाइयों और बहनों को उनके कर्तव्य और अधिकार समझाने का यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। राजा और प्रजा में, एक जाति और दूसरी जाति में, एक संस्था और दूसरी संस्था में बैर और विरोध, अशांति और असंतोष न होने देना हम अपना परम कर्तव्य समझेंगे। 

हिंदी पत्रकारिता के प्रति विद्यार्थी जी का संकल्प, सेवा और समर्पण बेमिसाल रहा है। सत्याग्रह, जुलूस और सभाओं से लेकर दलीय चुनावी राजनीति में नेतृत्व संभाला, पर अपनी पत्रकारिता को दलीय राजनीति का मोहरा कभी नहीं बनने दिया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से डटकर लोहा लिया। लेखनी के माध्यम से जनजागरण का उद्घोष किया। विद्यार्थी जी पत्रकारिता कर्म में सदा एक मोमबत्ती की मानिंद जलते रहे। जन आंदोलन को आगे बढ़ाने के पुरस्कार स्वरूप बार-बार कारावास तक भोगा। उन्होंने अपने जीवन में पांच जेल यात्राएं की। इनमें तीन पत्रकारिता और दो राजनीतिक भाषणों के चलते हुईं। पत्रकारिता में अपने उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा- किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने सुमार्ग से विचलित न कर सकेगी। सत्य और न्याय हमारे भीतरी पथ प्रदर्शक होंगे। सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से ‘प्रताप’ सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। प्रताप का जन्म किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षण या विरोध के लिए नहीं हुआ है, किन्तु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा। हम जानते हैं कि हमें इस काम में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इसके लिए बड़े भारी साहस और आत्मबल की आवश्यकता है। हमें यह भी अच्छी तरह मालूम है कि हमारा जन्म निर्बलता, पराधीनता और अल्प सत्ता के वायुमंडल में हुआ है। बावजूद इसके हमारे हृदय में सत्य की सेवा करने के लिए आगे बढ़ने की इच्छा है। पत्रकारिता के जरिए वह किसके साथ खड़े होंगे, इसका भी बाकायदा उल्लेख किया- इस यात्रा में माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, कृष्णदत्त पालीवाल, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, सुरेश चंद्र भट्टाचार्य और युगल किशोर सिंह शास्त्री जैसे ख्यातिलब्ध सरीखे पत्रकार विद्यार्थी जी के सहयोगी रहे हैं। 

साप्ताहिक की तरह दैनिक ‘प्रताप’ भी राष्ट्रवादी था। अत्याचारी शासकों का घोर विरोधी था। उसकी यही नीति उसका सबसे बड़ा ‘अपराध’ थी। इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। सरकार के अलावा देसी रियासतों ने भी उस पर शिकंजा कसने का प्रयास किया। सात-आठ रियासतों ने अपने राज्य में ‘प्रताप’ का जाना बंद कर दिया। महात्मा गांधी की ओर से संचालित असहयोग आंदोलन के पक्ष में अपनी आहुति देने के बाद दैनिक ‘प्रताप’ का प्रकाशन 6 जुलाई, 1921 को बंद हो गया लेकिन साप्ताहिक ‘प्रताप’ अपनी क्रांतिकारिता एवं स्पष्ट राजनीतिक विचारों के कारण उत्तर भारत का प्रमुख पत्र बन गया था। जमानत, चेतावनी और सरकारी धमकियों का वार उस पर होता रहता था। विद्यार्थी जी इस बात पर भी निगाह रखते थे कि ‘प्रताप’ का दुरुपयोग उनके अनावश्यक प्रचार के लिए न होने पाए। उनके अधिकांश लेख भी वास्तविक नाम के बजाए हरि, दिवाकर, गजेंद्र, लंबोदर, वक्रतुंड, श्रीकांत, एक भारतीय युवक आदि कल्पित नामों से प्रकाशित होते थे। उनका मानना था कि पत्र या पत्रिका के पूरे अंक में संपादक के नाम का उल्लेख एक बार से अधिक नहीं होना चाहिए। गणेश शंकर विद्यार्थी राजनीति में गांधीजी से प्रभावित थे तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के बेहद निकट थे। यह कैसी पत्रकारिता है? महात्मा गांधी के अहिंसक नेतृत्व और भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों के बीच खड़े विद्यार्थीजी ने ‘युवकों का विद्रोह’ नामक लेख भी लिखा। क्रांतिकारियों से उनके कैसे ताल्लुकात थे, इसकी मिसाल रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा का प्रकाशन है। बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पहले जेल में आत्मकथा लिखी थी, जिसे विद्यार्थीजी ने ‘प्रताप’ प्रेस से छापा था।

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विद्यार्थी जी हर तरह की सांप्रदायिकता के विरोधी थे। विद्यार्थी जी अपनी अंतिम जेल यात्रा से 9 मार्च, 1931 को लौटे थे, उस समय देश सांप्रदायिक आग में झुलस रहा था। कानपुर में ‘हिंदू-मुस्लिम दंगा’ हो गया। ऐसी स्थिति में कानपुर में रहना उचित समझा। उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार इस भयावह स्थिति में पूरी तरह मौन है। इसे देखते हुए वह सांप्रदायिकता की आग बुझाने के लिए मैदान में कूद पड़े। इसी बीच 23 मार्च 1931 को लाहौर सेन्ट्रल जेल में फांसी दे दी गई थी। फांसी देने का समाचार सुनकर देश भर में जबर्दस्त आक्रोश फैल गया। हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान हिंसक भीड़ ने 25 मार्च, 1931 को विद्यार्थी जी की हत्या कर दी। आज अखबार ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा, हमें रुलाई अपनी असहायता पर आ रही है कि देश को इस तरह आत्महत्या करते देखकर भी हम उसे रोकने में असमर्थ हैं। हमें रुलाई उन लोगों की बुद्धि पर आती है जो समझते हैं कि ऐसे रक्तपात के बिना हम अपनी रक्षा न कर सकेंगे। हमें रुलाई आती है भारत माता का खिन्न मुखमंडल देखकर। ’गांधीजी ने ‘प्रताप’ के संयुक्त संपादक को तार भेजा था, जिसमें बापू ने लिखा, ‘कलेजा फट रहा है तो भी गणेश शंकर की इतनी शानदार मृत्यु के लिए शोक संदेश नहीं दूंगा। उनका परिवार शोक संदेश का नहीं, बधाई का पात्र है। इसकी मिसाल अनुकरणीय सिद्ध हो।’ ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी एवम् हम सभी के प्रेरणापुंज गणेश शंकर विद्यार्थी जी को हमारा शत-शत नमन।  

श्याम सुंदर भाटिया 

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्च स्कॉलर हैं।)

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