By नीरज कुमार दुबे | Jun 27, 2026
गाजा पट्टी और पश्चिमी किनारे में जारी संघर्ष को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र जांच समिति की ताजा रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इजरायली सुरक्षा बलों ने फिलिस्तीनी बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया और कई मामलों में उन्हें अभ्यास के लक्ष्य यानि टार्गेट प्रेक्टिस की तरह इस्तेमाल किया गया। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चिंता और तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गाजा में लगातार हो रही बमबारी, स्नाइपर हमले और घनी आबादी वाले इलाकों पर सैन्य कार्रवाई का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ा है। अस्पतालों और राहत शिविरों तक को सुरक्षित नहीं माना जा रहा। कई चिकित्सकों और मानवाधिकार संगठनों ने दावा किया है कि बच्चों के सिर और सीने पर गोली लगने के अनेक मामले सामने आए हैं, जिससे यह संदेह और मजबूत हुआ है कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि गाजा में हालात लगातार भयावह होते जा रहे हैं। हजारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं, जबकि बड़ी संख्या में बच्चे स्थायी रूप से विकलांग हुए हैं। राहत एजेंसियों के अनुसार कई इलाकों में भोजन, दवा और साफ पानी की भारी कमी है। कुपोषण और बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। सेव द चिल्ड्रेन संस्था ने कहा है कि लगभग तेइस महीनों के संघर्ष में औसतन हर घंटे एक फिलिस्तीनी बच्चे की मौत हुई है।
संयुक्त राष्ट्र समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने रिपोर्ट में कहा है कि बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा केवल आकस्मिक नहीं मानी जा सकती। जांच में मिले साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि कई हमलों में नागरिक आबादी और खासकर बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया। समिति ने यह भी कहा कि युद्ध के नियमों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन हुआ है।
रिपोर्ट में पश्चिमी किनारे के हालात का भी उल्लेख किया गया है। वहां भी फिलिस्तीनी नाबालिगों की गिरफ्तारी, मारपीट और कथित यातना के आरोप लगाए गए हैं। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने पहले भी दावा किया था कि इजरायली सैन्य हिरासत में बच्चों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता है। कुछ मामलों में बच्चों को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
हालांकि इजरायल लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है। इजरायली पक्ष का कहना है कि उसकी सेना केवल हमास और अन्य सशस्त्र संगठनों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है और नागरिकों को नुकसान से बचाने की पूरी कोशिश की जाती है। इजरायल का यह भी दावा है कि हमास नागरिक इलाकों, स्कूलों और अस्पतालों का इस्तेमाल अपने सैन्य ठिकानों के रूप में करता है, जिससे आम लोगों की जान खतरे में पड़ती है।
दूसरी ओर, दुनिया भर के कई देशों, मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने तत्काल युद्धविराम की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी इस संघर्ष को लेकर सुनवाई चल रही है, जहां जनसंहार से जुड़े आरोपों पर विचार किया जा रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो पूरी एक पीढ़ी मानसिक और शारीरिक रूप से तबाह हो सकती है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस संघर्ष ने केवल गाजा ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और जनमत को प्रभावित किया है। सोशल मीडिया और वैश्विक मीडिया में इस मुद्दे पर तीखा ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि अलग अलग देशों का मीडिया इस संघर्ष को अलग नजरिए से प्रस्तुत कर रहा है, जिससे लोगों की राय भी प्रभावित हो रही है।
बहरहाल, गाजा में बच्चों की मौत और तबाही के ताजा आंकड़े मानवता के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर रहे हैं। क्या आधुनिक युद्धों में भी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन आरोपों पर क्या कदम उठाता है और क्या गाजा के मासूम बच्चों को आगे और हिंसा से बचाया जा सकेगा।