राजस्थानी राजनीति के अपरिहार्य चेहरे हैं अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे

By उमेश चतुर्वेदी | Nov 29, 2023

संसदीय लोकतंत्र में सत्ता की कमान जिन्हें मिलती है, उनका सबसे बड़ा आधार राजनीतिक दल हैं। दिलचस्प यह है कि जिस लोकप्रतिनिधित्व कानून के जरिए देश में चुनाव होते हैं, उनमें राजनीतिक दल का जिक्र तो है, लेकिन राजनीतिक दलों की बात संविधान में कहीं नहीं है। संसदीय राजनीति के केंद्र बिंदु बने राजनीतिक दलों के लिए तय है कि उनमें अंदरूनी लोकतंत्र रहे और चुनाव होते रहें। लेकिन देश के तकरीबन सभी दलों में अंदरूनी लोकतंत्र की सिर्फ रस्म निभाई जाती है। अव्वल तो हर दल में अपना-अपना शक्तिशाली केंद्रीय नेतृत्व उभर चुका है। केंद्रीय नेतृत्व की ही मर्जी पर राज्यों के क्षत्रपों का नाम राजनीतिक दल तय करते हैं। केंद्रीय नेतृत्व की आंख से उतरा नहीं कि स्थानीय नेतृत्व किनारा हो जाता है।


लेकिन अपने देश में एक राज्य ऐसा भी है, जहां इस परिपाटी को चुनौती मिल रही है। इस राज्य में प्रमुख रूप से देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का ही दबदबा है। लेकिन दोनों ही दलों के पास इस राज्य में एक ऐसा स्थानीय नेतृत्व है, जो अपने-अपने दलों के शक्तिशाली केंद्रीय नेतृत्व को परोक्ष रूप से चुनौती दे रहा है। अव्वल तो दूसरा कोई होता तो दोनों ही दल अपने इन नेताओं को किनारे लगा चुके होते। लेकनि इनकी स्थानीय स्तर पर ताकत ऐसी है कि मौजूदा विधानसभा चुनावों में दोनों ही दलों को अपने स्थानीय ताकतवर नेतृत्व को नकार पाना संभव नहीं रहा।

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आपके मन में सवाल होगा कि आखिर वह कौन-सा राज्य है, जहां दोनों दलों में ऐसा स्थानीय नेतृत्व है, जिसे अपने केंद्रीय नेतृत्व की परवाह नहीं है। कुछ लोग अनुमान लगा भी रहे हैं। जी हां, आपने ठीक फरमाया, वह राज्य राजस्थान है। और यहां के दोनों दलों के स्थानीय क्षत्रप इतने ताकतवर हैं कि उनके बिना दोनों ही दल अपनी स्थानीय राजनीति की कल्पना नहीं कर सकते। एक तरफ हैं कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो दूसरी तरफ हैं भाजपा की नेता और दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे सिंधिया। दोनों नेताओं की अपने-अपने समर्थक आधार पर पकड़ ही है कि दोनों ही दल अपने इन नेताओं को नकारने

की हिम्मत नहीं दिखा सके। अशोक गहलोत से उनके पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस के सुपर आलाकमान राहुल गांधी की नाराजगी की खबरें दिल्ली से लेकर जयपुर तक के सियासी वायुमंडल में फैली हुई हैं। राजस्थान के चुनाव प्रचार में इसका असर दिखा भी। राज्य में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद राहुल गांधी महज चार घंटे के लिए राजस्थान पहुंचे और तीन जनसभाओं को संबोधित किया। राजस्थान में विधानसभा की दो सौ सीटें हैं, लेकिन राहुल गांधी की तीन जनसभाओं के केंद्र में महज डेढ़ दर्जन ही विधानसभा सीटें रहीं।


जिन्हें पता है कि कांग्रेस के सुपर आलाकमान इंदिरा परिवार की क्या ताकत होती है, वे जानते हैं कि अगर गहलोत की ताकत नहीं होती तो अब तक उन्हें आलाकमान घुटनों के बल ला चुका होता। लेकिन आलाकमान ऐसा नहीं कर पा रहा है। याद कीजिए, सचिन पायलट के विद्रोह को। उनके विद्रोह के वक्त कांग्रेस आलाकमान चाहता था कि अशोक इस्तीफा दें। आलाकमान का संदेश लेकर कांग्रेस के दो दूत मल्लिकार्जुन खरगे और अजय माकन जयपुर पहुंचे, लेकिन गहलोत ने ना सिर्फ इससे इनकार कर दिया, बल्कि शांति धारीवाल की अगुआई में विधायकों ने अशोक नहीं तो कोई नहीं जैसा समानांतर बगावत कर दी। अशोक गहलोत नहीं माने और अपने दम पर सचिन पायलट का विद्रोह थामने में कामयाब रहे।


उसके बाद कांग्रेस आलाकमान ने अशोक गहलोत को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उनकी जगह पर वे खड़गे अध्यक्ष बनाए गए, जो कभी उनके खिलाफ हुई बगावत को थामने के लिए आलाकमान के दूत बनकर जयपुर पहुंचे थे। कांग्रेस आलाकमान शांति धारीवाल को टिकट नहीं देना चाहता था, लेकिन गहलोत उन्हें टिकट दिलाने में कामयाब रहे। आलाकमान रोक नहीं पाया। जिन्हें सोनिया गांधी की राजनीति पता है, उन्हें पता है कि अपने विरोधियों को वे माफ नहीं करतीं। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उस दौर में एक घोटाले को लेकर संसद में केरल के नेता केपी उन्नीकृष्णन ने सवाल उठाया था। उस दौर में उनके नाम से मिलते-जुलते नाम वाले एक और नेता थे, पी उपेंद्र। पी उपेंद्र बाद में वीपी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बने। उपेंद्र तेलुगू देशम के सांसद थे। सोनिया घोटाला उठाने को लेकर केपी उन्नीकृष्णन से खफा थीं, लेकिन वह उपेंद्र और उन्नीकृष्णन में फर्क नहीं कर पाईं। आंध्र के एक दौरे से पति राजीव के साथ लौटते वक्त उन्हें उपेंद्र दिख गए और उन्हें उन्होंने सार्वजनिक रूप से हड़का दिया था। शांति धारीवाल ने बगावत के दिनों में प्रेस से यहां तक कह दिया था कि कौन हैं सोनिया गांधी। माना जा रहा था कि शांति धारीवाल के राजनीति के दिन लद गए, लेकिन अपने इस वफादार को अशोक

गहलोत टिकट दिलाने में कामयाब रहे या दूसरे शब्दों में कहें तो टिकट उन्होंने दिया, यह जानते हुए भी उनका सुपर आलाकमान उनसे नाराज है।


अब बात करते हैं वसुंधरा की। राजस्थान में वसुंधरा खुद को बीजेपी की सर्वोच्च नेता मानती रही हैं। वे सिर्फ अटल और आडवाणी के सामने झुकती रही हैं। अन्यथा वे किसी के सामने नहीं झुकतीं। याद कीजिए 16 मई 2014 की तारीख को, जब भाजपा इतिहास बनाने जा रही थी। पहली बार केंद्र में अपने दम पर सरकार बना रही भाजपा की क्षत्रप वसुंधरा नाराज होकर राजस्थान की सभी 25 सीटों से जीते भाजपा सांसदों को लेकर दिल्ली के राजस्थान हाउस चली गई थीं। इसके पहले केंद्रीय नेतृत्व के आदेश के बावजूद उन्होंने नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। राजस्थान में इस बार माना जा रहा था कि वसुंधरा पहले की तुलना में कमजोर हुई हैं, इसलिए वे अपनी उपेक्षा से बगावत कर सकती हैं। लेकिन वसुंधरा ने खुलकर तेवर नहीं दिखाए। लेकिन पर्दे के पीछे वे सक्रिय रहीं।


राजस्थान में कहा जा रहा है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को लगा कि अगर वसुंधरा को नहीं साधा गया और वे कुछ ऐसा-वैसा कदम उठा लेंगी तो राजस्थान में उसकी सत्ता की उम्मीदें धूमिल पड़ जाएंगीं। इसलिए उन्हें मनाने की कोशिशें पर्दे के पीछे से चलीं। वसुंधरा ने तेवर नहीं दिखाए। कहा जा रहा है कि पार्टी उन्हें राजस्थान के लिए अपरिहार्य मानने को मजबूर हुई। राजस्थान में तो यहां तक कहा जा रहा है कि पार्टी ने करीब तीस फीसद टिकट उनके ही समर्थकों को दिए हैं। वैसे उनके कई समर्थक बागी बनकर मैदान में ना सिर्फ डटे रहे, बल्कि भाजपा के लिए परेशानी का सबब बनते रहे।


चाहे बात अशोक की हो या वसुंधरा की, दोनों ने साबित किया है कि वे अपनी-अपनी पार्टियों के लिए राजस्थान में अपरिहार्य हैं। अशोक गहलोत वैसे तो बेहद विनम्र हैं, लिहाजा उनके तेवर में भी विनम्रता रहती है। राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति में वे तेवर में हैं। लेकिन उन्होंने विनम्रता नहीं खोई है। इसलिए उनके तेवर को सामान्य नजरों से नहीं देखा जा रहा है। लेकिन असलियत में वे अपने आलाकमान के खिलाफ तेवर में ही हैं। वसुंधरा का स्वभाव तेवर वाला रहा है, लेकिन इस बार उन्होंने तेवर ना दिखाकर विनम्रता का दामन थाम लिया है। हालांकि उनके कदमों से उनके तेवर की छाप दिखती रही है। राजस्थान में कहा जाता है कि अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे भले ही दो विपरीत वैचारिक धाराओं वाली पार्टी के अगुआ हों, लेकिन दोनों में अंदरखाने में दोस्ती है। दोनों एक-दूसरे का लिहाज करते हैं। जिस तरह अपनी-अपनी पार्टियों में ये अपरिहार्य बने हैं और तेवर दिखा रहे हैं, उससे क्या यह मान लिया जाए कि उनकी रणनीति में उनकी दोस्ती भी दिख रही है? इस सवाल का जवाब हमें वक्त पर छोड़ देना चाहिए।


-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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