गहलोत को जिम्मेदारी तो मिल गई पर क्या जेटली जैसा प्रदर्शन कर पाएंगे?

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jun 12, 2019

अरुण जेटली के अस्वस्थ होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि मोदी सरकार पार्ट-2 में वित्त मंत्री कौन होगा। उसका जवाब मोदी के शपथ ग्रहण के अगले दिन ही मिल गया और पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को यह जिम्मेदारी दे दी गई। इसके अलावा सरकार के लिए अरुण जेटली राज्यसभा में नेता सदन को तौर पर हमेशा संकटमोचक की तरह रहे। कहने के लिए यह आसान हो सकता है कि उनकी जगह किसी और को नेता सदन बना दिया जाएगा पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए यह एक मुश्किल काम था। मोदी-शाह को एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी जैसै नेताओं को तार्किक चुनौती दे सके। यह काम जेटली की अनुपस्थिति में रविशंकर प्रसाद किया करते थे पर उनके लोकसभा में चले जाने से राज्यसभा में नेता सदन का चुनाव करना और कठिन हो गया था। यह समस्या और भी बड़ी इसलिए भी थी क्योंकि पार्टी का कोई भी कद्दावर नेता ऊपरी सदन का सदस्य नहीं था। 

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वह पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण के बाद पार्टी में सबसे बड़े दलित चेहरे हैं। इनको नेता सदन के तौर पर आगे कर भाजपा ने अपनी दलित राजनीति को भी मजबूत कर लिया है। फिलहाल मोदी सरकार-2 में भी वह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे हैं। वह भाजपा की संसदीय समिति और चुनाव समिति के सदस्य हैं। हालांकि इनके नाम पर भाजपा में असहमति कम ही देखने को मिलती है। गहलोत का जन्म महाकाल के शहर उज्जैन में 18 मई 1948 को हुआ था। विक्रम विश्‍वविद्यालय, उज्‍जैन से इन्होंने बी.ए. तक की पढ़ाई की है। छात्र जीवन से ही वह RSS से जुड़ गए और उसके बाद उन्होंने संघ के लिए कई अहम जिम्मेदारियां भी निभाईं। राजनीति से प्रभावित होकर वह पहले भारतीय जनसंघ में आए और फिर भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़े। मजदूर आंदोलन के सिलसिले में कई बार हिरासत में लिए गए और करीब दस महीने तक रतलाम जेल में बंद रहें। आपातकाल के दौरान भी कांग्रेस की नीतियों का गहलोत ने जमकर विरोध किया और जेल भी गए। 

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अब सवाल यह उठता है कि आखिर राज्यसभा में नेता सदन को तौर गहलोत के ही नाम पर मोहर क्यों लगी। इसका जवाब हम दो तरिके से ले सकते हैं। सबसे पहले अगर हम व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखें तो इनकी पहचान सरल और संवेदनशील नेता के तौर पर रही है। इसके अलावा वह सादगी प्रिय इंसान हैं जिसके व्यवहारिक रिश्ते पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ सही है। इनकी छवि भी एक गंभीर नेता की है। वहीं राजनीतिक दृष्टिकोण से देखे तो सत्ता पक्ष की तरफ से वह राज्यसभा में सबसे वरिष्ठ नेता हैं जिन्हें संगठन का लंबा अनुभव होने के साथ साथ संसदीय राजनीति का भी लंबा अनुभव है। इनकी पकड़ संघ और पार्टी दोनों में ही अच्छी है। और इनके लिए जो सबसे सबसे बड़ी बात कही जाती है वह यह है कि गहलोत मोदी और शाह दोनों के ही बेहद करीबी है। हालांकि वह प्रखर वक्ता तो नहीं हैं पर तार्किक पक्ष को रखने में माहिर हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्यसभा में पार्टी का पक्ष यह कैसे रख पाते हैं क्योंकि ऊपरी सदन में पार्टी को बहुमत नहीं है और ऐसे में विपक्ष ज्यादा हमलावर हो सकता है। 

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