राजनीतिक क्षेत्र में दूर की कोड़ी है लैंगिक समानता

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Sep 26, 2026

विश्व आर्थिक मंच डब्बूईएफ द्वारा इसी 16 सितंबर, 2026 को जारी 20 वीं ग्लोबल जेंडर लैंगिक गैप रिपोर्ट 2026 से एक बात तो साफ हो गई है कि राजनीति में अभी तो सत्ता में महिलाओं की पुरुषों के समान भागीदार दूर की कोड़ी ही है। जेंडर गैप की हालिया रिपोर्ट में सबसे रौचक और चिंताजनक जानकारी यह सामने आई है कि संसद में भले ही महिलाओं की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत हो गई हो पर मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी केवल 5.9 प्रतिशत रह गई है। सबसे मजे की बात यह है कि 2019 की तुलना में मंत्रिमंडल में महिलाओं की उच्चतम स्तर 30 प्रतिशत की भागीदारी की तुलना में बहुत कम हो गई है। यह सब तो तब है जब केन्द्र सरकार 2023 में महिला आरक्षण बिल लेकर आई है। हांलाकि यह भी अभी तो राजनीति की भेंट ही चढ़ा हुआ है। यह इसलिए भी एलार्मिंग हो जाती है कि लैंगिक समानता की बात दुनिया के देशों द्वारा विभिन्न मंचों पर बढ़-चढ़ कर कितनी भी की जाएं परिणाम अभी तक अधिक सकारात्मक प्राप्त नहीं हुए हैं। आइसलैंड, फिनलैंड, नार्वें आदि अवश्य लैंगिक गैप को कम करने में कुछ हद तक सफल रहे हैं। निराश होने की बात इसलिए नहीं है कि शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में लैंगिक गैप में लगातार सुधार देखा जा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी में सुधार देखा जा रहा है।

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तस्वीर का सबसे निराशाजनक पहलू राजनीतिक भागीदारी को लेकर हैं। खासतौर से मंत्रीमण्डल में तो महिलाओं की हिस्सेदारी में बहुत अधिक कमी देखने को मिल रही है। यह सब तो तब है जब सरकार राजनीति में महिला आरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने की पक्षधर है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि पिछले कुछ सालों के चुनावों पर नजर ड़ाली जाएं चाहे वे विधानसभाओं के हो या लोकसभा के सभी में मतदान से लेकर सरकार बनवाने में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। कम से कम आंकड़े तो यही कह रहे हैं। हांलाकि फ्री बीज जैसी लुभावनी योजनाओं में महिलाओं को अपने पक्ष में करने के वादे सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में देखने को मिल जाएगा।

संतोष की बात यह है कि 145 देशों की समग्र ग्लोबल जेंडर गैप 2026 का जेंडर गैप पेरिटी स्कोर 69.2 प्रतिशत है जबकि भारत की 131 वीं रेंक होने के बावजूद इस रिपोर्ट में भारत का ग्लोबल जेंडर लैंगिक गैप पेरिटी स्कोर 64.5 प्रतिशत रहा है। रिपोर्ट के समग्र अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि भारत के सामने सबसे अधिक चुनौती राजनीतिक स्तर पर गैप को कम करना है तो आर्थिक मोर्चे पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना जरुरी हो गया है। देश में बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं जैसे अभियानों के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। पंचायतों, निकाओं आदि में महिलाओं के आरक्षण से राजनीति में जो भागीदारी देखी जा रही है वह संभव हो पाई हैं। निर्णय के स्तर पर भी महिलाएं अधिक स्वतंत्र हुई है और चुनाव नतीजे इस बात को पुष्ट भी करते हैं। अब महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग स्वविवेक से करने लगी है।

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में 93 प्रतिशत के स्कोर के साथ आइसलैंड भले ही शीर्ष पर हो पर दुनिया के अधिकांश इस दौड़ में अभी बहुत पीछे हैं। शत-प्रतिशत स्कोर की तो अभी कल्पना करना बेमानी ही होगा। पर सकारात्मक पक्ष यह है कि लैंगिक गैप में अब काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है। आर्थिक मोर्चों पर भी महिलाओं की भागीदारी भले ही कम हो पर शीर्ष स्तर पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी देखी जा सकती है। इसलिए चुनौती अवश्य है पर हालात सकारात्मकता की और संकेत कर रहे हैं।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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