Yes Milord: जज ही बदल दिया! ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट में किसने बचाया?

By अभिनय आकाश | Sep 26, 2026

लोकतंत्र में भरोसा मांगा नहीं जाता। कमाया जाता है और भरोसा केवल फैसले से नहीं फैसले लेने की प्रक्रिया से भी बनता है। आज की कहानी में सुप्रीम कोर्ट है। एक पिता हैं और एक बेटी हैं। पिता देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। बेटी नोएडा के जिलाधिकारी मेधा रूपम। एसआईआर पर हुए खुलासे और विपक्ष के तीखे सवालों के बीच मेधा रूपम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की कुछ टिप्पणियों और मुआवजे के आदेश पर तो रोक लगा दी। लेकिन अब वकीलों का एक संगठन पूछ रहा है कि यह मामला तय रोस्टर से अलग। दूसरी बेंच के सामने कैसे पहुंचा? सुनवाई के दौरान ऑडियो क्यों म्यूट हुआ? इस विशेष लिस्टिंग का कारण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया है? टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि क्या जज के परिवार से जुड़े लोगों की सरकारी नियुक्तियों का इस मामले से कोई संबंध है? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी और गौतम बुद्ध नगर की जिलाधारी मेधा रूपम इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। उस दिन सुनवाई हुई थी। सुनवाई के बीच में कोर्ट का माइक बंद कर दिया गया वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग वाला और कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया। वही आदेश जिसमें छात्रा आकृति चौधरी को ₹5 लाख का मुआवजा सैलरी देने से सैलरी से देने की बात कही गई थी। ध्यान रहे कि हाईकोर्ट के उस आदेश पर कोई स्टे नहीं है जिसमें आकृति चौधरी के एनएसए के तहत डिटेंशन को रद्द किया गया था। लेकिन फैसले के एक दिन बाद कुछ और अपडेट्स सामने आए। जैसे कुछ वकीलों ने चिट्ठी लिखी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के नाम। साथ ही चिट्ठी में कुछ रोचक सवाल भी उठाए गए। वकीलों के संगठन का नाम है लॉयरर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन। उन्होंने मेधा रूपम के केस में रोस्टर बदले जाने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चिट्ठी में लिखा है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट में उस समय लागू रोस्टर के अनुसार इस मामले की सुनवाई उस जज या बेंच को नहीं करनी थी जहां इस मैटर को लिस्ट किया गया था। वकीलों के संगठन ने यह भी कहा कि देखने में लगता है कि यह मामला किसी खास बेंच को सौंपा गया था। इसके बाद संगठन ने लिखा कि मामला इसलिए भी जरूरी है क्योंकि याचिकाकर्ता एक सरकारी अधिकारी होने के साथ-साथ भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी भी हैं। मामले को तय क्रम से हटकर जल्दी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करना विशेष व्यवहार जैसा दिखाई देता है और इससे भविष्य के लिए गलत मिसाल कायम हो सकती है। ध्यान दें कि इस चिट्ठी में कहा जा रहा है कि मैटर किसी और बेंच के सामने लिस्ट होना चाहिए था। लेकिन लिस्टिंग का क्रम चेंज किया गया और किसी दूसरे बेंच के सामने मैटर को लिस्ट किया गया। यह बात भी अंडरलाइन की जा रही है कि मेधा रूपम सीईसी ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। लेकिन बातें और भी तो हैं। 

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क्या है पूरा मामला


कहानी शुरू होती है नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के प्रदर्शन से। इस प्रदर्शन से जुड़े मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी कि एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और 2 सितंबर को हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने हिरासत की प्रक्रिया को लेकर अधिकारियों पर कड़ी टिप्पणियां भी की और यहीं से नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की भूमिका सवालों में आई। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया और इसकी वसूली संबंधित अधिकारियों के वेतन से करने की बात कही। इसके बाद मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 23 सितंबर को मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुनवाई जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एम कोटेश्वर सिंह की बेंच ने की। शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की दलीलें सुनी गई। लेकिन इसके बाद एक असामान्य घटनाक्रम हुआ। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का ऑडियो फीड म्यूट कर दी गई। इसका मतलब था कि कोर्ट रिपोर्टर्स आगे की कारवाही सुन नहीं पा रहे थे और यहीं से पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे। 


जज क्यों बदल गए?


असली विवाद सिर्फ ऑडियो का नहीं है। मामले की लिस्टिंग को लेकर भी सवाल उठाए गए। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक 13 जुलाई 2026 से लागू सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में हैवियएस्ट कॉपस और प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी निवारक हिरासत से जुड़े मामले शुरुआती चार बेंचों को सौंपे गए हैं। इनमें सीजीआई सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएस सुंदरेश की अगुवाई वाली बेंच शामिल है। लेकिन मेधा रूपम और यूपी सरकार की याचिकाएं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच के सामने लिस्टेड हुई और खास बात यह कि नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कुछ दूसरे मामले पहले से जस्टिस बीवी नागत्ना की बेंच के सामने लंबित बताए गए हैं। यानी सवाल यह उठा इस मामले की सुनवाई इसी बेंच के सामने कैसे पहुंची? 


प्रशांत भूषण, महुआ मोइत्रा ने उठाए सवाल


पूरे मामले महुआ मोहित्रा की एंट्री होती है। टीएमसी सांसद महुआ मोहित्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर जस्टिस शर्मा को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे चार प्रमुख सरकारी पैनलों में शामिल हैं। महुआ ने इसी दावे को मेधा रूपम के मामले में हुई सुनवाई से जोड़ते हुए सवाल उठाया। उन्होंने ऑडियो म्यूटो ने हाई कोर्ट के 5 लाख वाले निर्देश पर रोक और सीसी की नियुक्ति से जुड़े एक अलग मामले में जस्टिस शर्मा की राय का भी हवाला दिया। सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने लाइव लॉ की रिपोर्ट शेयर करते हुए जज सतीश शर्मा पर सवाल उठाते हुए लिखा-'मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस शर्मा के बेटे भारत के चुनाव आयोग (ECI) के स्टैंडिंग काउंसिल हैं। वे सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं। उन्होंने 2017 में एनरोलमेंट कराया था। कॉकरोच जनता पार्टी के सह संयोजन सौरभ दास ने एक्स पर सुप्रीम कोर्ट के जज सतीश चंद्र शर्मा के बारे में लिखा-'अहम सवाल यह है कि अगर किसी जज के परिवार के सदस्य सरकार की मर्जी पर नौकरी कर रहे हों, तो उनसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण फैसला करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

अब सीईसी नियुक्ति वाला मामला क्यों जोड़ा जा रहा है? 


महुआ मोहित्रा ने अपने पोस्ट में जस्टिस शर्मा की उस न्यायिक राय का भी जिक्र किया जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाले मामले में जजों के बीच मतभेद सामने आया था। इस मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की अलग-अलग राय थी कि मामला संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए या नहीं। यही वजह है कि महुआ ने दोनों घटनाक्रमों को अपने आरोपों में एक साथ जोड़ा और सबसे बड़ा क्लेरिफिकेशन सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती आदेश के बाद एक और महत्वपूर्ण बदलाव के साथ हुआ। बाद में कोर्ट ने अपने आदेश को स्पष्ट किया। आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है। रोक हाईकोर्ट के उन हिस्सों पर है जिनमें मेधा रूपम के खिलाफ टिप्पणियां और 5 लाख मुआवजे खर्च की वसूली से जुड़े निर्देश थे। यानी आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने का फैसला अपनी जगह कायम है। लेकिन मेधा रूपम के खिलाफ की गई टिप्पणियां और 5 लाख की वसूली फिलहाल रुकी हुई है। 
 

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