By राकेश सैन | May 22, 2024
क्षेत्रवाद व उपराष्ट्रवाद की जिस मानसिकता से भारत सदियों तक विदेशी संत्रास झेलता आया है उसके रोगाणु आज भी देश की राजनीति में देखने को मिल रहे हैं। पंजाब का यह रोग दोबारा उबरता दिख रहा है और त्रासदी यह है कि क्षेत्रीय दल शिरोमणि अकाली दल बादल के साथ-साथ राष्ट्रीय दल कांग्रेस भी इस कीचड़ में सनी नजर आ रही है। संगरूर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक सुखपाल सिंह खैहरा ने कहा है कि पंजाब में बाहरी राज्यों से आए लोगों को मतदान का अधिकार नहीं होना चाहिए। तो अकाली दल बादल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने अपने दल के घोषणापत्र में बाहरी राज्यों के लोगों से जमीन खरीदने का अधिकार छीनने का वायदा किया है। यह वही पंजाब है जो संकीर्ण क्षेत्रीय राजनीति के चलते 1 नवंबर, 1966 में भाषाई आधार पर विभाजित हुआ और इस विभाजन से उपजी चण्डीगढ़ के अधिकार और सतलुज यमुना सम्पर्क नहर की समस्या से आज तक निपट नहीं पाया है। सिख गुरुओं के ‘मानस की जाति सबै एके पहिचानबो’ के मानवतावादी संदेश के विपरीत पंजाब में एक विकृत सोच है जो दूसरे राज्यों से आए श्रमिकों को ‘भईया’, ‘भईया रानी’ के नाम से अपमानजनक सम्बोधन करती है। यहां के राजनेताओं द्वारा अकसर कहा जाता है कि जब पंजाब का कोई व्यक्ति हिमाचल प्रदेश में जमीन नहीं खरीद सकता तो दूसरे राज्य के लोग पंजाब में कैसे संपतियां बना रहे हैं? असल में यह एक ऐसा राष्ट्र विभाजक विमर्श है जो राजनेताओं व कुछ धार्मिक नेताओं की अज्ञानता के चलते स्थापित होता जा रहा है। इससे यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि देश में पंजाब के लोगों से भेदभाव हो रहा है, जबकि इसका कारण पूरी तरह से संवैधानिक है।
हिमाचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम, 1972 के तहत यहां के लोगों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष प्रावधान किया गया है। इसकी धारा 118 के तहत हिमाचल प्रदेश का कोई भी जमीन मालिक किसी भी गैर कृषक को किसी भी माध्यम (सेल डीड, गिफ्ट, लीज, ट्रांसफर, गिरवी) से जमीन नहीं दे सकता। भूमि सुधार अधिनियम 1972 की धारा 2(2) के मुताबिक जमीन का मालिकाना हक उसका होगा जो हिमाचल में अपनी जमीन पर खेती करता होगा। जमीन के क्रय-विक्रय पर सरकार की कड़ी नजर रहती है। फरवरी 2023 में एक मामले की सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत ने भी अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘हिमाचल प्रदेश में केवल किसान ही जमीन खरीद सकते हैं।’ 1972 के भूमि सुधार अधिनियम का हवाला देते हुए न्यायाधीश पीएस सिम्हा और सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि ‘इसका उद्देश्य गरीबों की छोटी कृषि भूमि को बचाने के साथ-साथ कृषि योग्य भूमि को गैरकृषि उद्देश्यों के लिए बदलने की जांच करना भी है।’ पंजाब में अनुसूचित जाति तो है परन्तु अनुसूचित जनजाति नहीं, तो यहां पर इस तरह का कानून लागू नहीं हो सकता।
उक्त तथ्यों से प्रमाणित होता है कि किन्हीं राज्यों में वहां के आदिवासी समाज के हितों को बचाने के लिए संविधान में ही यह व्यवस्था की गई है। यह किसी अन्य राज्य या लोगों से कोई अन्याय नहीं। पंजाब के नेताओं को समाज में भ्रम व गलत धारणा पैदा करने से बचना चाहिए। उक्त व्यवस्था उसी संविधान के अन्र्तगत है जिसकी शपथ वे संसद व विधानसभाओं में लेते हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस दुष्प्रचार की आड़ ले खालिस्तानियों व नक्सलियों जैसे देशविरोधी शक्तियां देश व समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश करती हैं।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्म कालोनी,
ग्राम एवं डाकखाना लिदड़ा,
जालन्धर