सबकुछ दिलाता है 16 दिवसीय महालक्ष्मी पूजन

By शुभा दुबे | Nov 01, 2017

महालक्ष्मी के पूजन का यह सोलह दिवसीय अनुष्ठान भाद्रपद शुक्ला अष्टमी से प्रारम्भ होकर आश्विन कृष्णा अष्टमी को पूर्ण होता है। धनधान्य की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु सोलह दिन तक लगातार व्रत और उनकी पूजा तो की ही जाती है सोलह धागों से बना हुआ सोलह गांठयुक्त एक धागा भी हाथ में बांधा जाता है। 

'आमोती−दमोती रानी, पोला−परपाटन गांव, मगरसेन राजा, बंभन बरूआ, कहे कहानी, सुनो हे महालक्ष्मी देवी रानी, हम कहते तुमसे, सुनते सोलह बोल की कहानी।' इसी प्रकार आश्विन कृष्णा अष्टमी तक सोलह दिन व्रत और पूजा की जाती है। आश्विन कृष्णा अष्टमी अर्थात् क्वार के प्रथम पक्ष की आठे को एक मंडप बनाकर उसमें लक्ष्मी जी की मूर्ति, डोरा और एक मिट्टी का हाथी रखकर पूजा की जाती है और फिर सोलह बार उपरोक्त कहानी कहकर अक्षत छोड़ती हैं। पूजा के लिए सोलह प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं और पूरे धूमधाम से पूजा की जाती है। सोलह ब्राह्मणियों को भोजन कराकर पूजा की सभी वस्तुएं उन्हें दे दी जाती हैं और डोरे को सिरा दिया जाता है। पूजा के बाद प्रतिदिन यह कथा भी कही और सुनी जाती है−

कथा− एक राजा की दो रानियां थी। बड़ी रानी का एक पुत्र था और छोटी के अनेक। महालक्ष्मी पूजन के दिन छोटी रानी के बेटों ने मिलकर मिट्टी का हाथी बनाया तो बहुत बड़ा हाथी बन गया। छोटी रानी ने उसकी पूजा की। बड़ी रानी सिर झुकाये चुपचाप बैठी थी। बेटे के पूछने पर उसकी मां ने कहा कि तुम थोड़ी सी मिट्टी लाओ। मैं उसका हाथी बनाकर पूजा करूंगी। तुम्हारे भाइयों ने पूजा के लिए बहुत बड़ा हाथी बनाया है। बेटा बोला, मां तुम पूजा की तैयारी करो, मैं तुम्हारी पूजा के लिए जीवित हाथी ले आता हूं। लड़का इन्द्र के यहां गया और वहां से अपनी माता के पूजन के लिये इन्द्र से उनका ऐरावत हाथी ले आया। माता ने श्रद्धापूर्वक पूजा पूर्ण की और कहा− क्या करें किसी के सौ पचास। मेरा एक पुत्र पुजावे आस।

शुभा दुबे

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