चोरों की महिमा अनंत (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Sep 09, 2025

एक शहर का किस्सा है। वहीं की एक स्कूल टीचर ने अपनी नवीं क्लास के बच्चों को होमवर्क दिया—"कल चोरी पर निबंध लिखकर लाना।" अब बच्चे सोच में पड़ गए। कोई सोच रहा था "चोरी पाप है", कोई "चोरी से समाज मिटता है" लिखने वाला था। लेकिन क्लास का एक लड़का था—वो चालाक भी था और जरा-सा परसाई जी का ‘प्रश्नों का उत्तर अपने हिसाब से देना’ वाला वायरस भी उसमें घुसा था। उसने कलम उठायी और तय कर लिया—“सब तो चोरी को गाली देंगे, मैं चोरी की आरती गाऊँगा।”

उसने शुरू किया: “चोर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। चोर अगर न हों तो देश का आधा उद्योग बंद पड़ जाए।” मैडम का मुँह खुला का खुला रह गया। बच्चों ने सोचा ये तो फँस गया—मैडम ज़बरदस्त डाँट लगाएंगी। मगर लड़के ने आगे जो तर्क दिए, सुनकर सबकी हँसी छूट गई। “सोचिए मैडम, अगर चोर न होते, तो ताले कौन बनाता? तिजोरियाँ किसके लिए बनतीं? गरीब लोहार भूख से मर जाते। गोडरेज जैसा ब्रांड तो पैदा ही नहीं होता।” क्लास तालियाँ पीटने लगी।

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वो रुका नहीं। बोला—“और मकान निर्माण उद्योग देखिए। चोरों ने ही मज़दूरों को रोजगार दिया है। वर्ना कौन इतनी ऊँची-ऊँची दीवारें बनवाता? कौन अपने घर की खिड़कियों पर लोहे की सलाखें लगवाता? काँटेदार तार की फैक्ट्री चल रही है तो चोरों का ही आशीर्वाद है। चोर ही असली ‘रोजगार मेला’ आयोजित करते रहते हैं।”

मैडम अब हँसते-हँसते सोच रही थीं—"ये बच्चा निबंध नहीं, अर्थशास्त्र का नया पाठ पढ़ा रहा है।" बच्चा और धारदार हुआ। बोला—“मैडम, चौकीदार और पुलिस वालों की नौकरी भी चोरों पर ही टिकी है। अगर चोरी बंद हो जाए तो चौकीदार कहेगा—भाड़ में जाओ, मैं क्यों रात भर ‘जागते रहो’ चिल्लाऊँ? पुलिसवाले पूरे दिन थाने में ऊंघते रहेंगे, और उनकी साइड इनकम भी छिन जाएगी। दरअसल, चोर ही हैं जिनके कारण पुलिस की डंडी अब तक सीधी खड़ी है।”

क्लास फिर हँस पड़ी। कुछ बच्चों ने तो नारा लगा दिया—"चोरों की जय!"

मैडम ने आँखें तरेरीं—“चुप रहो, पढ़ने दो।” लड़का बोला—“अब देखिए तकनीक। चोर अगर न हों तो सीसीटीवी कैमरे कौन लगाए? मेटल डिटेक्टर कौन खरीदे? बर्गलर अलार्म कौन बजाए? सारा सिक्योरिटी इंडस्ट्री चोरों की कृपा पर पल रहा है। पिछले साल हमारे मोहल्ले में चोरी हुई थी, नतीजा ये निकला कि पच्चीस घरों ने सीसीटीवी लगवा लिया। इसने करोड़ों का बिज़नेस खड़ा कर दिया। मतलब साफ है—भारत में टेक्नोलॉजी मिशन असल में चोरों के बिना चल ही नहीं सकता।”

मैडम अपना माथा पीटने लगीं, पर हँसी रोक भी नहीं पा रही थीं। अब बारी थी हथियार उद्योग की। लड़का बोला—“मैडम, पहले आदमी हल पकड़े खेत जोतता था। अब उसी हल चलाने वाले किसान के पास लाइसेंस वाली बंदूक है। क्यों? क्योंकि पास वाले गाँव में चोरी हुई थी। गन-बुलेट का बिज़नेस भी चोर ही चला रहे हैं। उनके बिना तो ये कंपनियाँ बंद हो जातीं। चोर दरअसल सुरक्षा-उद्योग के लिए वही हैं जो गाय दूध उद्योग के लिए है—लगातार सप्लाई...”

क्लास बेतहाशा हँसने लगी। मैडम ने चिलाते हुए कहा—“बैठो चुपचाप।” मगर उनके होंठ भी मुस्करा रहे थे। लड़का हठी था। बोला—“मैडम, न्यायालय तो चोरों की कृपा पर पल रहे हैं। अरे अगर चोर न हों तो जज लोग किसे सज़ा देंगे? वकील किसके लिए बहस करेंगे? कोर्ट-चपरासी किसकी फाइल उठाएगा? चोरी पर आधा-कानून विभाग टिका हुआ है। और चैनल वालों को देखिए—एक चोर पकड़ा जाओ तो ब्रेकिंग न्यूज़ दो दिन चलेगी। फिर वही चोर भाग जाए तो फिर दो दिन। यही टीवी की टीआरपी का असली मंत्र है। चोर असल में लोकतंत्र के भी न्यूज़-मेकर हैं।”

अब पूरी क्लास लोट-पोट हो रही थी। मैडम बोलीं—“तुम तो पूरे पत्रकार लगते हो।” आखिरी वार करते हुए उसने कहा—“मैडम, सेकंड-हैंड मार्केट भी चोरों की देन है। चोरी हुए मोबाइल, लैपटॉप, साइकिल—यही तो नया व्यापार चलाते हैं। इंश्योरेंस कंपनियों की तो दाल रोटी चोर ही पकाते हैं। यानी, अर्थव्यवस्था के हर पायदान पर चोर खड़े हैं। बिना चोरों के देश की जीडीपी गिरकर ज़मीन में धँस जाए। इस नजर से देखें तो चोर असल में राष्ट्र निर्माता हैं। हमें तो इन्हें ‘पद्म भूषण’ देना चाहिए।”

पूरा क्लास तालियाँ ठोक रहा था। मैडम दुविधा में थीं—"मार्क्स दूँ या इस बच्चे की कॉपी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय भेज दूँ।" टीचर ने कॉपी बंद कर दी और बोलीं—“बेटा, तेरे निबंध में व्यंग्य का स्वाद है। तू सच्चाई को घुमा-फिराकर कहता है, लेकिन काटता गहरा है। तू झूठ सच में, और सच झूठ की शक्ल में दिखाता है। यही असली साहित्य है। जा, पूरे सौ में सौ नंबर।” और पूरी क्लास चिल्ला उठी—

“चोरों की जय हो, अर्थव्यवस्था अमर रहे!”

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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