माननीयों के अच्छे दाग (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 03, 2021

यह सुप्रीम निर्णय है कि दागी माननीयों पर चल रहे मुकद्दमे वापिस लेने के लिए अदालत की स्वीकृति ज़रूरी है। माननीयों पर मुकद्दमा तो क्या एफ़आईआर भी किसी न किसी की स्वीकृति के बगैर नहीं हो सकती। वैसे ऐसा या वैसा करवाना उनके लिए ज़्यादा मुश्किल नहीं होता। वास्तव में दाग तो माननीयों का आभूषण होते हैं। उनसे उनके व्यक्तित्व का आभामंडल निरंतर विकसित होता है। उनके खिलाफ जितने खतरनाक मामले लंबित होते जाते हैं उनका कद बढ़ता जाता है। दागी माननीय हो सकता है और माननीय को दागी कहना आसान होता है लेकिन दागी घोषित करना बहुत ज़्यादा मुश्किल और समयखपाऊ होता है।

इनके दागी प्रयासों के सामने तो बेहद संजीदा आरोप भी हिम्मत हार जाते हैं। आरोप पत्रों को तो यह अदालत के प्राइमरी स्कूल में भी दाखिला लेने नहीं देते। उनका दाग बनना तो बहुत दूर की कौड़ी हो जाता है।  ज्यादा भद्दे दागों को सुंदर माने जाने के प्रयास किए जाते हैं और उन्हें सुंदर मनवा दिया जाता है। दाग लगने के बाद भी माननीय बनना हर किसी के भाग्य में कहां होता है। कई दाग जो एक माननीय को पसंद नहीं आते उनका तबादला दूसरे माननीय के क्षेत्र में कर दिया जाता है। माननीयों के दाग धोने और अदृश्य करने के लिए बेहतर, महंगा, स्वास्थ्य को नुकसान न पहुँचाने वाला सुकर्म किया जाता है और दाग पवित्र हो जाते हैं।  वैसे भी उन्हें जनसेवा से कहां फुर्सत मिलती है तभी तो सब जानते और मानते हैं कि ऐसे दाग तो अच्छे होते हैं। यही उनकी असली गहन पढ़ाई लिखाई का आधार माने जाते हैं। माननीय बनना आसान काम नहीं होता। एक बार माननीय हो जाने के बाद वे ‘मुजरिमों’ के खिलाफ सख्त कारवाई करने के उपदेश दे सकते हैं, देते हैं। उन्हें सख्त सज़ा दिलवाते हैं।

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आम आदमी की पुरानी टीशर्ट पर दाग लग जाए तो वह परेशान हो जाता है ज़ोर से गाने लगता है, कहीं और दाग न लग जाए, कहीं दाग न लग जाए। लेकिन माननीयों के दाग अच्छे किस्म के दाग होते हैं तभी तो ज़्यादा दाग वाले माननीय समाज, धर्म और राजनीति में ऊंचा ओहदा पाते हैं और मन ही मन गुनगुनाते रहते हैं एक दाग बढ़िया सा लग जाए तो अच्छा।  

- संतोष उत्सुक

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