सरकार और विपक्ष (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jan 17, 2026

अपनी पार्टी की सरकार दोबारा न बने तो पक्ष के नेताओं को विपक्ष में बैठना पड़ता है। उनका तो वर्ग ही बदल कर  शासक वर्ग से विपक्ष वर्ग हो जाता है। पता नहीं होता, पांच साल के बाद दोबारा पॉवर में आएंगे या नहीं इसलिए विपक्ष के नेताओं को राजनीतिक बीमारियां होती रहती हैं। कई नेताओं को कुछ दिन तक चक्कर आते रहते हैं, कई महीने तक गुस्सा आता रहता है कि हमारी सरकार कैसे चली गई।  फिर जब एहसास हो जाता  है कि अब हमारी सरकार नहीं है तो असली दुःख होने लगता है ।


विपक्ष वालों को पांच साल का शासन कम लगता है।  कुछ नेताओं को लगता है कि एक मुश्त दस साल तक राज करने को मिलता तो वह अपनी और अपनी पार्टी की निजी कल्याण, पारिवारिक कल्याण, पार्टी कल्याण, राज्य कल्याण और  लोक कल्याण योजनाओं को अच्छे से लागू कर पाते। नेता, अफसर और ठेकेदारों की तिकड़ी अपने ज़रूरी प्रोजेक्ट पूरे कर पाती । कोई नाली, गली, सड़क, पार्क, पुल, सुरंग वगैरा अधूरा न छोड़ते।  इससे समाज के साथ उन तीनों का फायदा होता लेकिन  सिस्टम ही ऐसा है कि चुनाव पांच साल के बाद होते हैं। फिर  ऐसे ऐसे लोगों से वोट मांगने जाना पड़ता है जिनकी शक्ल पसंद नहीं होती ।  सभी की तारीफ़ करनी पड़ती है । हंसने, मुस्कुराने, सादा और सरल होने का दिखावा करना पड़ता है।  

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अक्सर लोक लुभावनी स्थापित योजनाओं के कारण सरकार दोबारा चुन ली जाती है।  मुख्यमंत्री भी वही पुराना घिसा पिटा नेता रहता है लेकिन कई बार राजनीतिक तिकड़म, जाति असंतुलन, क्षेत्र असंतुलन पटाने  या अमुक तरह के सामंजस्य बिठाने के लिए नए चेहरे को बिना मेकअप के मुखिया बनाना पड़ता है। राजनीतिक घोड़ों का पारम्परिक व्यवसाय पुन जान पकड़ते पकड़ते रह जाता है लेकिन सिर्फ अपनी पार्टी की सरकार बनाने के लिए घोड़ों का व्यापार कई बार राजनीतिक बाज़ार की शान हो जाता है। चाहे चार छ दिन के लिए राजनीतिक स्टॉक एक्सचेंज दसवें आसमान को छूता है।   


इस दौरान नए अंदाज़ दिखते हैं। राजनीति नए शब्द पकाती है। दिलचस्प आकर्षक जुमले उगते हैं। ठहाके लगते हैं। हैरानी मचती है, फिर कुछ दिन बाद सब शांत हो जाता है। सरकार चल रही होती है।  बीच बीच में विपक्ष के नेता कहते रहते हैं वर्तमान सरकार की नीतियों की वजह से विकास तीस साल पीछे चला गया है।  सरकार की कई तरकीबें साज़िश की तरह हैं।  बड़ी लकीर नहीं खींच सकते तो हमारी खींची हुई लकीरों को छोटा न करें।  इन लोगों ने वितीय स्थिति को वेंटीलेटर तक पहुंचाने में कोई कमी नहीं रखी । कर्मचारियों को धोखा दिया जा रहा है।  सरकार हर मोर्चे पर फिसड्डी है।  जन सरोकारों के प्रति असंवेदनशील है।  अपने ही जुमलों के पीछे छिपती है। कर्ज लेकर काम चला रही है।  खर्चों पर लगाम नहीं लगा पा रही।  सरकार फर्जी आंकड़े पेश करती है।  इनके शासन में समान काम समान वेतन सपना है।  न्यायालय के फैसलों पर अमल नहीं करती। 


सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वालों, जुलूस निकालने वालों का साथ देने के लिए विपक्ष हमेशा तैयार रहता है।  उन्हें उग्र आंदोलन, आर पार की कड़ाई के लिए उकसाता है। विपक्ष के नेता मानते हैं कि उनकी सरकार होती तो बेहतर काम करती लेकिन उन्हें सरकार बनाने के लिए चुनाव का इंतज़ार करना पड़ता है ।  


- संतोष उत्सुक 

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