Consumer Rights पर सरकार सख्त, Storia-English Oven के Misleading Ads पर बैन और जुर्माना

By Ankit Jaiswal | Jun 21, 2026

खाद्य उत्पादों पर किए जाने वाले बड़े-बड़े दावों को लेकर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। इस बार कार्रवाई दो प्रमुख खाद्य कंपनियों पर हुई है, जिन पर अपने उत्पादों की वास्तविक संरचना से अलग तस्वीर पेश करने का आरोप लगा है।

बताया गया है कि यह कार्रवाई उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 तथा भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम संबंधी दिशा-निर्देश 2022 के तहत की गई है। प्राधिकरण का मानना है कि जब किसी उत्पाद पर “100 प्रतिशत” जैसा दावा किया जाता है तो एक सामान्य उपभोक्ता उसका सीधा अर्थ पूरी तरह शुद्ध या संपूर्ण रूप से उसी सामग्री से बना हुआ उत्पाद समझता है।

गौरतलब है कि स्टोरिया फूड्स अपने कुछ उत्पादों को “100 प्रतिशत नारियल पानी” और “100 प्रतिशत फलों का रस” बताकर प्रचारित कर रही थी। जांच के दौरान पाया गया कि कंपनी के प्रमुख नारियल पानी उत्पाद में नारियल पानी का सघन घोल इस्तेमाल किया गया था, जिसे बाद में तैयार कर मूल नारियल पानी के बराबर बताया गया था। हालांकि यह जानकारी उत्पाद के मुख्य दावे के साथ स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी।

प्राधिकरण ने यह भी पाया कि उत्पाद में संरक्षक पदार्थ आईएनएस-202 का उपयोग किया गया था। ऐसे में उसी उत्पाद को “100 प्रतिशत प्राकृतिक” बताना उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाला माना गया है।

वहीं दूसरी ओर इंग्लिश ओवन ब्रेड के विज्ञापनों में “100 प्रतिशत आटा ब्रेड”, “100 प्रतिशत गेहूं की ब्रेड” और “संपूर्ण गेहूं के आटे से भरपूर” जैसे दावे किए गए थे। यह प्रचार समाचार पत्रों, पैकेजिंग और विभिन्न डिजिटल मंचों पर चलाया गया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन प्रचार अभियानों को लाखों लोगों ने देखा था।

जांच और सुनवाई के दौरान कंपनी ने स्वयं स्वीकार किया कि उसके उत्पादों में गेहूं के आटे की मात्रा लगभग 87 प्रतिशत थी। इसके बावजूद उत्पादों पर “100 प्रतिशत” का दावा किया जा रहा था। प्राधिकरण ने इसे वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाने वाला बताया है।

सीसीपीए ने यह भी कहा कि पैकेट पर एक साथ “100 प्रतिशत गेहूं” और “शून्य मैदा” जैसे दावों का इस्तेमाल उपभोक्ताओं के मन में यह धारणा बना सकता है कि उत्पाद पूरी तरह केवल गेहूं के आटे से तैयार किया गया है। प्राधिकरण ने कंपनियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उनका आशय कुछ और था।

प्राधिकरण का स्पष्ट कहना है कि किसी विज्ञापन का मूल्यांकन एक सामान्य उपभोक्ता की समझ के आधार पर किया जाएगा। बाद में दी गई तकनीकी व्याख्याएं या कंपनियों की मंशा उस प्रभाव को नहीं बदल सकतीं जो विज्ञापन उपभोक्ताओं के मन में पैदा करता है।

बता दें कि हाल के वर्षों में खाद्य उत्पादों के विज्ञापनों को लेकर निगरानी बढ़ी है। उपभोक्ताओं को सही और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराना नियामक संस्थाओं की प्राथमिकता बन गया है। इसी कड़ी में सीसीपीए ने दोहराया है कि किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता, संरचना, पोषण मूल्य या स्वास्थ्य संबंधी दावे पूरी तरह सत्य, प्रमाणित और भ्रामकता से मुक्त होने चाहिए। यदि भविष्य में भी उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले दावे सामने आते हैं तो ऐसी कंपनियों के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

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