किसानों की समस्याएँ हल करने की बातें ही होती हैं...आखिर ऐसा कब तक चलेगा?

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jul 18, 2020

हम अनाज तो हर दिन पका कर खाते हैं। क्या कभी मुट्ठी भर अनाज सूँघने का प्रयास किया है ? फुर्सत मिले तो एक बार ही सही उसकी गंध सूँघने का प्रयास अवश्य करें। किसान के अनाज में दशाब्दियों से छल-कपट का शिकार हो रहे उनके पसीने की गंध आएगी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे पिछड़ेपन की गंध बस्साएगी। पोषक तत्त्वों की गिनती करते समय कड़ी धूप में कमरतोड़ मेहनत करने वाले किसान की एकबारगी की याद दिल दहला देगी। असंख्य लीटर पसीना बहाकर खेतों की सिंचाई करने वाले भोले-भाले किसान की चमड़ी धूप में जलकर काली पड़ जाती है। विज्ञान की पुस्तकों में लिखा होता है कि ओजोन की परत पराबैंगनी किरणों से बचाती हैं, किंतु वहीं ये पुस्तकें पाठ्यक्रम-दर-पाठ्यक्रम नदारद हो रहे कृषि संबंधी यह बात बताना भूल जाती हैं कि किसानों की झुर्राई-मुरझाई काली चमड़ी से ढकी इस दुनिया को भूखों मरने से बचाती है।

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नब्बे के दशक में वैश्वीकरण के दौर के बाद किसानों को राजनीतिक एजेंडे में तो फंसाकर रखा गया, लेकिन विकास के एजेंडे से उन्हें बाहर कर दिया गया। बार-बार कृषकों के हितों की दुहाई दी गईं। उनके नाम पर समितियों का गठन हुआ। उन्हें सब्सिडी दी गईं। उनके कर्ज़ माफ़ किए गए, लेकिन किसान की आय कैसे बढ़ाई जाए, यह सुनिश्चित नहीं किया गया! बल्कि शासन-प्रशासन ने अन्नदाताओं की इकलौती निधि ‘आत्मसम्मान’ को रौंद कर उन्हें जान देने के लिए मजबूर कर दिया। ये आत्महत्याएँ नहीं बल्कि संस्थागत हत्याएँ हैं। इनके लिए राज्य और उसके विभिन्न निकाय जिम्मेदार हैं। एक कहावत है– “उत्तम करे कृषि, मध्यम करे व्यापार और सबसे छोटे करे नौकरी” ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि कृषि करने वाले लोग प्रकृति के सबसे करीब होते हैं और जो प्रकृति के करीब हो वह तो ईश्वर के करीब होता है। किंतु अब यह कथन उलटता जा रहा है। समय की दरकार है कि हम किसान को आश्वस्त करें। उन्हें भरोसा दिलाए कि अभी भी भारत गाँवों का देश है। स्मार्ट सिटी जब बनेंगे तब बनेंगे पहले यह देश सबका पेट भरने वाले को यह बताए कि सूखा, ऋण, बाढ़ के समय में उनके साथ खड़ा है। बैंकों में चक्कर लगाने पर भी लोन न मिलने की स्थिति में जिन साहूकारों से कर्ज लेते हैं, उनके चंगुल से बचाने की जिम्मेदारी हमारी है। उन्हें यह भरोसा दिलाना होगा कि फसल बीमा केवल चुनिंदा लोगों को नहीं मिलता, बल्कि सभी लोगों को मिलता है। उन्हें यह जताना होगा कि आज भी यह देश नाम के नहीं काम के किसान के साथ खड़ा है। नीतियों के बांझपन से मिट्टी की उर्वरा समाप्त करने की साजिशों को मुंहतोड़ जवाब देना होगा। यह देश पहले भी सोना-चाँदी पैदा करता था, पैदा करता है और पैदा करता रहेगा। किसान की हथेलियों ने हल, खुरपी, हँसिए पकड़कर अपनी रेखाएँ गंवाई अवश्य हैं, किंतु देश की हथेली की रेखाओं को कभी मिटने नहीं दिया। यही वह जज्बा है जिसके आगे देश नतमस्तक रहता है। किसान बेसहारा, मजबूर, बेबस, गरीब, लाचार का सूचक नहीं हमारे देश की शान है। इस शान के लिए जिस तरह सेना के जवानों के साथ हम व्यवहार करते हैं, ठीक उसी तरह से उनके साथ व्यवहार करने की आवश्यकता है। यह जिस दिन होगा उसी दिन जय जवान जय किसान का नारा सफल होगा।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'

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