By अनन्या मिश्रा | Sep 22, 2026
सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के पहले गुरु, गुरु नानक देव का 22 सितंबर को निधन हो गया था। इस दौरान गुरुद्वारों में गुरुवाणी का पाठ किया जाता है और जगह-जगह पर लंगर का आयोजन होता है। गुरुनानक देव जी ने करतारपुर में अंतिम सांस ली थी। वह एक दार्शनिक थे, जिन्होंने यह भांप लिया था कि समाज में फैली कुरीतियां समाज को खोखला कर रही हैं और इससे व्यक्ति पतन की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने समाज को नई दिशा दिखाने का कार्य किया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिख गुरु, गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
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माना जाता है कि गुरु नानक देव बचपन से ही चिंतनशील और शांत प्रवृत्ति के थे। जब नानक देव के साथी खेलकूद में व्यस्त रहते थे, तब वह साधना और ध्यान में लीन रहते थे। उनकी इस धार्मिक प्रवृत्ति की वजह से उनके माता-पिता परेशान रहते थे। ऐसे में नानक देव को बचपन में पढ़ने के लिए गुरुकुल भेजा गया था। लेकिन नानक देव के सवालों के आगे गुरु निरुत्तर हो गए। यहां तक कि जब उनको शिक्षा के लिए मौलवी के पास भेजा गया था, तब भी उनकी जिज्ञासा का कोई जवाब नहीं दे सका। सभी लोगों ने माना कि उनको ईश्वर ने स्वयं ज्ञाव देकर पृथ्वी पर भेजा है।
बाद में गुरु नानक देव घर-बार त्याग कर भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब देशों की यात्राओं पर निकल गए। वह जहां भी गए, उन्होंने समानता, प्रेम और ईश्वर के प्रति भक्ति का संदेश दिया। नानक देव ने पंजाब में करीब की निर्गुण उपासना का प्रचार किया था और समाज को एकता का संदेश दिया। इसी वजह से नानक देव सिखों के पहले गुरु के रूप में जाने गए।
बता दें कि गुरु नानक देव जी ने अपने शिष्य मरदाना के साथ करीब 28 सालों में 2 उपमहाद्वीपों में 5 प्रमुख यात्राएं पैदल की थीं। जिनको उदासी कहा जाता है। इन 28 हजार किमी लंबी यात्राओं में गुरु नानक देव ने करीब 60 सालों का भ्रमण किया था। अपनी चौथी उदासी में नानक देव ने मक्का की यात्रा की। नानक देव ने हाजी का भेष रखा और अपने शिष्यों के साथ मक्का गए। कई हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थलों की यात्रा की और फिर मक्का की यात्रा की।
अपनी यात्राओं के दौरान गुरु नानक देव ने कई जगहों पर अपना डेरा जमाया और समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया। नानक देव जी ने मूर्ति पूजा को निर्थक माना और रुढ़िवादी सोच का भी विरोध किया।
वहीं 22 सितंबर 1539 को पाकिस्तान के करतारपुर में गुरु नानक देव ने आखिरी सांस ली।