अभारतीय शैली में खुशहाली (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 15, 2025

यह सचमुच हैरान करने वाली बात है। विश्वगुरुओं की अनुशासनयुक्त शैली में न रहने वाले लोग, पिछले कई सालों से दुनिया भर में सबसे खुशहाल माने जा रहे हैं। इस कहन को हम सीधे सीधे नकार सकते हैं, नहीं ये हो नहीं सकता क्यूंकि खुशहाली पर तो सिर्फ हमारा हक है। गलती दो या तीन बार हो सकती है लेकिन आठ बार नहीं हो सकती। अमज़ेदार यह भी है कि हमारे आंगन से पर्यटक पिट या लुट कर भी जाते हैं और वहां अब पर्यटकों को खुश रहने की कला सिखाई जा रही है। दुखी करने वाली दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल वहां पचास लाख पर्यटक गए और वहां की जनसंख्या पचपन लाख है। पता नहीं इतने पर्यटक कैसे संभाले होंगे  लेकिन इस छोटे से देश ने अपनी खुश शैली  से, ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स’ में पिछले आठ वर्षों से ‘नंबर वन’ की पायदान पर कब्ज़ा कर रखा है। 

परेशान करने वाली असली बात यह है कि वहां की जीवन शैली पूरी तरह अभारतीय है। यह भी सुनने में अविश्वसनीय लगता है कि वहां का चौहत्तर प्रतिशत हिस्सा जंगलों का है। सोचता हूं वहां के मंत्री, अफसर और ठेकेदार वृक्षों को बिना काटे समय कैसे काटते होंगे। वहां तीस लाख सॉना बाथ उपलब्ध हैं। जिन्हें वहां के निवासी नियमित इस्तेमाल करते हैं। वैसे इससे बेहतर स्थिति हमारे यहां है। हम नदियों में नहाते हुए अपना बेहद निजी कचरा भी वहीँ छोड़ने के लिए अधिकृत हैं। साथ में अपनी पुरानी गुस्ताखियां को भी उसी पानी में तिलांजलि दे सकते हैं। पता नहीं पाप वगैरा धोने का उनका क्या सिस्टम है।

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वहां के लोग कुदरत से संजीदा जुड़ाव रखते हैं लेकिन हमारे से ज़्यादा जुड़ाव तो नहीं होगा। हम तो इस मामले में सख्त कानून, योजनाएं, प्रतियोगिताएं, भाषण, विज्ञापन, दिखावा, जुलूस, नारे और प्लास्टिक से अथाह मुहब्बत करने के बावजूद प्रकृति प्रेम बरकरार रखते हैं। फिनलैंड वह देश है जिसके खुशहाली विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ज़िंदगी की खुशहाली छोटी छोटी चीज़ों में छिपी है। उनकी तो यह छोटी छोटी चीजें भी लगभग अभारतीय हैं। वहां यह सुझाव दिया जाता है कि वृक्षों के साथ अपनी चिंताएं साझा करने से मन हल्का हो जाता है। इस प्रवृति के चंद लोग तो हमारे यहां भी मिल सकते हैं।

वृक्ष को गले लगाकर उससे बतियाते हुए अभारतीय लग सकता है लेकिन यह सलाह हमारे एंटीसोशल मीडिया के खिलाड़ियों और मोबाइल महाप्रेमियों के लिए खुशखबर है। पहले उन्हें प्रकृति प्रेमी बनना पडेगा जोकि ज़्यादा मुश्किल काम है। फ़िनलैंड के लोग अपने घर में डिशवाशर या बहते पानी की सुविधा न होने पर गर्व महसूस करते हैं। जंगल में बेरियां चुनने और हाथ से काफी काम करने में खुश रहते हैं। वहां जाने वाले पर्यटक भी प्रेरित होकर ऐसा करने लगते हैं। हुई न अभारतीय शैली में खुशहाली।

- संतोष उत्सुक

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