भावुकता के साथ रस और आनंद भी दिखाई देता है हरिवंशराय जी कविताओं में

By देवेन्द्रराज सुथार | Jan 18, 2022

हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक एवं मूर्धन्य कवि हरिवंशराय बच्चन उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हाला, प्याला और मधुशाला के प्रतीकों से जो बात इन्होंने कही है, वह हिंदी की सबसे अधिक लोकप्रिय कविताएं स्थापित हुईं। दरअसल उनका वास्तविक नाम हरिवंश श्रीवास्तव था। इनको बाल्यकाल में बच्चन कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ बच्चा या संतान होता है। बाद में वे इसी नाम से मशहूर हुए। बच्चन ने सीधी, सरल भाषा मे साहित्यिक रचना की। 'आत्म परिचय' व 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' में उन्होंने मानव जीवन की नश्वरता को स्पष्ट करते हुए दर्शन तत्व को उद्घाटित करने का सार्थक प्रयास किया है। बच्चन मुख्यतः मानव भावना, अनुभूति, प्राणों की ज्वाला तथा जीवन संघर्ष के आत्मनिष्ट कवि हैं। उनकी कविताओं में भावुकता के साथ ही रस और आनंद भी दिखाई देता है। उनके गीतों में बौद्धिक संवेदन के साथ ही गहन अनुभूति भी है। साहित्य शिल्पी बच्चन की कविता सुनकर श्रोता झूमने लगते थे। वे कहा करते थे सच्चा पाठक वही है जो सहृदय हो। विषय और शैली की दृष्टि से स्वाभाविकता बच्चन की कविताओं की विशेषता है। उनकी कविताओं में रूमानियत और कसक है। वहीं गेयता, सरलता, सरसता के कारण इनके काव्य संग्रहों को काफी पसंद किया गया। बच्चन ने सन 1935 से 1940 के बीच व्यापक निराशा के दौर में मध्यम वर्ग के विक्षुब्ध और वेदनाग्रस्त मन को वाणी दी।

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नि:संदेह हिंदी में कवि सम्मेलन परंपरा को सुदृढ़, गरिमापूर्ण, जनप्रिय तथा प्रेरक बनाने में बच्चन का असाधारण योगदान रहा है। उनकी कृति 'दो चट्टानें' को 1968 में हिंदी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान हुआ। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी नवाजा गया। आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' के लिए उन्हें बिड़ला फाउंडेशन ने सरस्वती सम्मान प्रदान किया। सन 1976 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में 'पद्मभूषण' से नवाजा गया। बच्चन की कविता के साहित्यिक महत्व के बारे में अनेक मत हो सकते हैं और हैं, किंतु उनके काव्य की विलक्षण लोकप्रियता को सभी स्वीकारते हैं। वे हिन्दी के लोकप्रिय कवि रहे हैं और उनकी कृति 'मधुशाला' ने लोकप्रियता के सभी रिकॉर्ड तोड़े हैं। इसका कारण है कि बच्चन ने अपनी कविता के लिए तब जमीन तलाश की, जब पाठक छायावाद की अतीन्द्रिय और अतिवैयक्तिक सूक्ष्मता से उकता रहे थे। उन्होंने सर्वग्राह्य, गेय शैली में संवेदनसिक्त अभिधा के माध्यम से अपनी बात कही तो हिंदी का काव्य रसिक सहसा चौंक पड़ा। उन्होंने सयत्न ऐसा किया हो, ऐसा नहीं है, वे अनायास ही इस राह पर निकल पड़े। उन्होंने काव्य सृजन के लिए अनुभूति से प्रेरणा प्राप्त की तथा अनुभूति को ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति देना अपना ध्येय बनाया। उनकी प्रसिद्ध रचना अग्निपथ में वह लिखते हैं- वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हो बड़े, एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। छायावाद के कवि डॉ. बच्चन के व्यक्तित्व व कृतित्व को साधारण लेखक लेखनी में नहीं बांध सकता। कवि ने जीवन के उल्लास में मृत्यु के पार की कल्पना करते हुए भी खूब लिखा- इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ! हरिवंशराय बच्चन का देहांत 18 जनवरी 2003 में सांस की बीमारी के वजह से मुंबई में हुआ था। 

- देवेन्द्रराज सुथार

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